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कोरोना काल में बच्चे भी सुरक्षित नहीं, शोषण की अंतहीन कहानी

के. सी. त्यागी Published by: के. सी. त्यागी Updated Wed, 04 Nov 2020 07:06 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने एक बार पुनः समूचे विश्व को चिंतित कर दिया है कि उनके द्वारा बाल श्रम और वेश्यावृत्ति में धकेले गए हजारों बच्चों को मुक्त कराने का प्रयास निरर्थक साबित हो सकता है, यदि कोरोना काल के दौरान पुनः बढ़ती इस प्रवृत्ति पर तुरंत विराम नहीं लगता है। इस दौरान करोड़ों परिवार गरीबी की सीमा रेखा के नीचे आ गए हैं। इसके कारण घर-परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों की पूर्ति हेतु बच्चों को श्रम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। 



यूनिसेफ ने स्वीकार किया है कि बाल श्रमिकों की संख्या में यद्यपि गिरावट आ रही है। इसके बावजूद भारत में इनकी संख्या अभी एक करोड़ से अधिक आंकी गई है। सत्यार्थी को आशंका है कि इस संक्रमण काल में बाल श्रम में फंसी बच्चियां वेश्यावृत्ति के जाल में फंस सकती हैं। इस दौर में बाल सहायता केंद्र में आने वाले फोन कॉल के आंकड़ों में जबर्दस्त वृद्धि देखने को मिली है। सरकार द्वारा उपलब्ध सहायता केंद्र के हेल्पलाइन नंबर 1098 पर 27 लाख कॉल किए जाने का आंकड़ा चौंकाने वाला है। भारत सरकार के महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के अधिकारी स्वयं इस संख्या को खतरनाक ट्रेंड मानते हैं। 


लगभग सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर सहायता बूथ स्थापित हैं, क्योंकि बाल तस्करी के लिए रेल यात्रा को अति सुविधाजनक माना जाता है। सभी स्कूल इस दौर में बंद होने के कारण बाल श्रम के नाम पर उपलब्ध बच्चों, बच्चियों पर यौन शोषण के लिए दबाव बनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र की चिंता सहारा मुल्कों के साथ दक्षिण एशियाई देशों को लेकर भी है, जिसमें भारत भी प्रमुख है। भारत में इस समय बाल श्रमिकों की संख्या 3.50 करोड़ के आसपास आंकी गई है। वेश्यावृत्ति के जाल में फंसने वालों की संख्या में भी निरंतर बढ़ोतरी हो रही है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अनुसार भारत में प्रति वर्ष लगभग 40 हजार बच्चों का अपहरण होता है। सरकारी प्रयासों के बावजूद एक तिहाई बच्चे बरामद नहीं हो पाते हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी का गठन तक किया है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने इस पर विस्तार से जांच के बाद पाया कि वेश्यावृत्ति में धकेले जाने के मुख्य कारणों में जबरन शादी, बाल श्रम, बाल विवाह, घरेलू कर्मचारी आदि शामिल हैं।


संसद द्वारा पारित कानून काफी सख्त है, फिर भी संगठित गिरोह का जाल निरंतर फैलता जा रहा है। पॉक्सो ऐक्ट जैसा सख्त कानून ऐसे ही अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए बना है, जिसमें अपराध साबित होने पर 10 से 20 वर्ष तक कारावास का प्रावधान है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा सहित कुछ राज्यों में मौत की सजा जैसा कठोर कानून भी अस्तित्व में है। संसद के पिछले सत्र में बाल श्रम विधेयक में काफी सख्त प्रावधानों की अपेक्षा निर्मूल साबित हुई। बड़े उद्योग संगठन एवं बड़े रसूखदार उद्यमियों की जबरदस्त लॉबिंग के कारण शोषण के कई सूक्ष्म छेद अब भी विद्यमान हैं। जैसे सभी प्रकार के उद्योगों में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे रोजगार नहीं कर सकेंगे, पर अपने पारिवारिक

कारोबार में मदद कर सकेंगे। 


अंतरराष्ट्रीय श्रम आयोग के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में पांच से 17 वर्ष की आयु के 15.2 करोड़ कामकाजी बच्चे हैं, जिसमें अकेले भारत में 80 लाख बच्चे हैं। इसमें यौन अपराधों में फंसी बच्चियां भी शामिल हैं। हर दिन 109 बच्चे यौन शोषण का शिकार हो रहे हैं। इनमें तीस फीसदी मामले शेल्टर होम के हैं, जहां उन्हें सुरक्षित बचपन के नाम पर रखा जाता है। इंटरनेट युग के आने से पहले भी बाल यौन शोषण होता था, पर इस ऑनलाइन सुविधा ने इसे और बढ़ा दिया है। आश्चर्यजनक है कि यह तकनीक बच्चों को आसानी से उपलब्ध है। एक जानकारी के मुताबिक पांच से 12 वर्ष के बच्चे यूट्यूब, इंस्टाग्राम, टि्वटर, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर अपना अधिकांश वक्त गुजार रहे हैं। स्थिति की गंभीरता को सरकार एवं समाज दोनों को समझना होगा। कानून के जरिये इस रोग का उन्मूलन संभव नहीं है। पूरे समाज को समझना पड़ेगा कि अगर एक भी बच्चा विधि विवादित होता है, तो इसका दंश पूरे समाज को झेलना पड़ेगा। 


(- लेखक, पूर्व सांसद तथा जद(यू) के प्रधान महासचिव हैं।) 

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