हिमालय भारत की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संपत्ति है। इसके बिना यह देश नहीं बचेगा। इसके विशाल पहाड़ आक्रमणकारियों को रोकते हैं, हमारी महान नदियों के स्रोत हैं, जैव विविधता का समृद्ध भंडार और हमारे पवित्रतम मंदिरों का घर हैं। पारिस्थितिकी, आर्थिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक रूप से हिमालय एक राष्ट्र के रूप में भारत के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।
हिमालय का सम्मान करने के दावे के साथ शासन करने वाले राजनीतिकों की नाक के नीचे ये पहाड़ उन पर हो रहे हमले के गवाह बन रहे हैं। यह हमला गलत तरीके से अपनाए जा रहे प्रोजेक्ट चार धाम परियोजना के रूप में हो रहा है। 12,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से तैयार हो रही इस योजना का लक्ष्य चार पवित्र धामों यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ तथा बदरीनाथ तक शीघ्र पहुंच के लिए 900 किलोमीटर लंबी सड़कों का चौड़ीकरण है। इस योजना पर घनघोर लापरवाही के साथ अमल हो रहा है और इसमें पर्यावरण तथा मानव सुरक्षा की जरा भी चिंता शामिल नहीं है। लोगों के विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट को विशेषज्ञों की एक समिति का गठन करना पड़ा है, जिसने हाल ही में इस परियोजना के कारण अब तक हो चुके नुकसान को लेकर आठ सौ पेज की रिपोर्ट प्रस्तुत की है।
इस रिपोर्ट को पढ़ना रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुभव से गुजरना है। लेकिन सबसे पहले हमें खुद को हिमालय से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों का स्मरण कराना चाहिए। हालांकि इन्हें देखना अद्भुत लगता है, लेकिन पारिस्थितिकी के लिहाज से ये पहाड़ अत्यंत नाजुक हैं और खासतौर से इन्हें भूकंप तथा बाढ़ का खतरा है। इसके बावजूद एक के बाद एक आने वाली सरकार ने हिमालय तथा उसके लोगों पर चार तरह से हमले किए हैं। वाणिज्यिक वानिकी, ओपन कास्ट माइनिंग, बड़ी पनबिजली परियोजनाओं को बढ़ावा तथा अनियंत्रित पर्यटन ने मिलकर भारी पैमाने पर जहरीले कचरे के संचय, वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी, वनों तथा जैवविविधता में कमी, जल स्रोतों का क्षरण किया है और भूस्खलन तथा बाढ़ में वृद्धि की है। और अब इस भारी-भरकम सड़क निर्माण परियोजना के रूप में पांचवां हमला किया जा रहा है, जिससे पहले ही बर्बाद हो चुके इस भूभाग को और नुकसान हो सकता है।
अमूमन चार धाम जैसी विशाल परियोजना के लिए प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले ही पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) संबंधी विस्तृत रिपोर्ट देना अनिवार्य होता है। यहां यह जिम्मेदारी क्रूर हाथों में थी। चूंकि सौ किलोमीटर से अधिक लंबी सड़क परियोजना के लिए विस्तृत ईआईए जरूरी होती है; इसलिए 880 किलोमीटर की एकीकृत परियोजना को कागज पर छोटे छोटे अनेक टुकड़ों में इस तरह बांट दिया गया, ताकि किसी भी खंड के लिए ईआईए की जरूरत न पड़े।
इस परियोजना की आधारशिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर, 2016 के आखिरी हफ्ते में रखी थी। उसके बाद से इसकी वजह से हुए नुकसान की झलक सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष डॉ. रवि चोपड़ा द्वारा तैयार रिपोर्ट में दिखती हैः 'हमारा सामना कई भूस्खलन से हुआ और हमारी गाड़ियां अक्सर जाम में फंस जाती थीं। मलबे सीधे जंगलों, नदी के तल और जलस्रोतों में जा रहे थे। पहले ही हजारों पेड़ गिर चुके हैं और अप्रत्याशित ढलानों के ध्वस्त होने से और अधिक पेड़ गिरेंगे। कमजोर सुरक्षात्मक ऊंची दीवारों को सीधी ढलान पर उनकी नियति पर छोड़ दिया गया है। रात ठहरने पर सड़क के काम से सीधे प्रभावित होने वाले लोगों ने हमसे मुलाकात की और अपनी तकलीफें तथा सुझाव बताए।'
इस तबाही का कारण है पहाड़ों के अनुकूल बनी मौजूदा सड़कों के नेटवर्क को 12 मीटर चौड़े हाई-वे में बदलना, जो कि मैदानी इलाकों के अनुकूल होते हैं। वैज्ञानिक विशेषज्ञों ने सलाह दी थी कि कमजोर पहाड़ियों में 5.5 मीटर चौड़ी सड़कें कारगर होंगी; इन विशेषज्ञों को अनसुना कर दिया गया। कम चौड़ी सड़कें परिवहन को नियंत्रित करतीं और पर्यावरण तथा सामाजिक नुकसान को कम करतीं।
जैसा कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट कहती हैः 'पहाड़ी की कटाई की लंबाई और चौड़ाई के अनुसार पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ जाती है। जितना अधिक मलबा निकाला जाएगा, कटाई भी उतनी गहरी होगी।' उल्लेखनीय है कि इन मार्गों में 60 या 70 डिग्री को झुकी ढलानें हैं और इनकी वजह से पहले ही जंगल का क्षरण हो रहा है। चार धाम परियोजना के एक हिस्से में समिति ने पाया कि 174 ताजा कटी ढलानों में से 102 में भूस्खलन के अनुकूल हो गई हैं। हर जगह अचानक खत्म होने वाली ढलानें आम हैं।
उल्लेखनीय है कि मई से सितंबर के दौरान ही कुछ महीनों में चार धाम के तीर्थयात्रियों का ट्रैफिक बढ़ जाता है। इसके अलावा ये कोई व्यावसायिक यात्री नहीं हैं, जिनके लिए हर मिनट कीमती हो। आखिर किसी आध्यात्मिक व्यक्ति को किसी पवित्र स्थल में पहुंचने में कुछ घंटे या कुछ दिन अधिक लगने में परेशानी क्यों होनी चाहिए? पुराने दिनों में तीर्थयात्री पैदल यात्रा करते थे। हिमालय में सड़क निर्माण के दौरान उसकी अनूठी पारिस्थितिकी और उसे पहुंचने वाले नुकसान को भी ध्यान में रखना चाहिए। मैदानी इलाकों में शहरों के भीतर के लिए उपयुक्त मॉडल की नकल पूरी तरह से गलत है और यह बहुत महंगा भी साबित होगा।
'हिमालयन ब्लंडर' शीर्षक से लिखी टिप्पणी में चार वैज्ञानिक सदस्यों ने चार धाम परियोजना को उस महान तथा नाजुक पहाड़ी शृंखला के प्रति 'गैरजिम्मेदाराना तथा हिमालय का अपमान'करने वाला ऐसा काम करार दिया, जिसकी सेहत देश के सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिकी भविष्य के लिए अहम है। रिपोर्ट में ऐसी सैकड़ों तस्वीरें शामिल हैं, जो लापरवाही के साथ सड़क को चौड़ा किए जाने के कारण हुई बर्बादी को दिखाती हैं, जिसमें पूरी पर्वत शृंखला नदी की ओर गिरती नजर आती हैं। स्थिति अब भी सुधर सकती है, यदि 12 मीटर चौड़ाई की जगह इसे 5.5 मीटर की संवेदनशील चौड़ाई तक सीमित रखा जाए और विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया जाए।
समिति ने नए और कम विनाशकारी संरेखण, स्थानीय प्रजातियों के साथ क्षरण वाले क्षेत्र में पुनः वनस्पतीयन, बर्फबारी वाले ऊपरी हिस्से की सड़क के लिए विशेष उपाय अपनाने संबंधी संवेदनशील सुझाव दिए हैं। ये विस्तृत सुझाव भूगर्भ, पारिस्थितिकी के साथ ही इंजीनियरिंग की विशेषज्ञता के साथ तैयार किए गए हैं। ये सुझाव वैज्ञानिक विशेषज्ञों ने दिए हैं, जिन्होंने हिमालय में रहते हुए और काम करते हुए लंबा वक्त बिताया है। हम बेसब्री से यही उम्मीद कर सकते हैं कि उन्हें सुना जाएगा और अमल में लाया जाएगा।
यह स्तंभकार उत्तराखंड में ही पैदा हुआ और बड़ा हुआ है। उसकी पहली किताब हिमालय के जंगलों के सामाजिक इतिहास पर केंद्रित थी। इसलिए एक नागरिक और अध्येता के रूप में मैं पाठकों (और अदालत) से सरकार पर समझदारी दिखाने के लिए दबाव बनाने के महत्व को रेखांकित कर रहा हूं। हिमालय ने पहले ही काफी कुछ सहा है। मौजूदा स्वरूप में यह सड़क परियोजना पहाड़ों को ऐसा नुकसान पहुंचाएगी, जिसकी कभी भरपाई नहीं हो सकेगी। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई यह रिपोर्ट कहती है, 'आज दुनिया भर में स्पष्ट हो गया है कि पारिस्थितिकी की ईमानदार और बिना शर्त की जाने वाली चिंता से रहित कोई भी विकास अदूरदर्शी साबित होगा; और अनिवार्य रूप से दीर्घकाल में तबाही और आपदा लाएगा।'