पंद्रह अगस्त और रक्षाबंधन एक ही दिन पड़ जाने से आजादी और भाईचारा, दोनों को एक साथ मनाने का मौका मिल गया। संयोग से मैं उस दिन तामिलनाडु में थी। 16 अगस्त को, मैं तंजावुर जिले के सेरागुड़ी गांव गई थी। वहां पता चला कि छुआछूत की पीड़ा से मौत के बाद भी छुटकारा नहीं मिल पाता है। इस गांव में अनुसूचित जाति को अपनों की लाश को ‘आम’ रास्ते से ले जाने पर मनाही है।
इसे लेकर प्रशासन से कई बार शिकायत की गई है। कुछ माह पूर्व प्रशासन ने अनुसूचित जाति और गैर अनुसूचित जाति के लोगों (वानियर, जो एक पिछड़ी जाति है) के साथ बातचीत कर यह फैसला कर दिया कि अब अनुसूचित जाति की लाशों को ‘आम’ रास्तों से ले जाने पर आपत्ति नहीं की जाएगी।