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जातिगत सर्वे: मंडल पार्ट-2 का सियासी रास्ता, आरक्षण कोटे में फेरबदल साबित हो सकता है गेम चेंजर

विजय विद्रोही
Updated Fri, 04 Aug 2023 07:20 AM IST

सार

बेरोजगारी, महंगाई के दौर में आरक्षण का मुद्दा बेहद संवेदनशील है। ऐसे में आरक्षण के कोटे में जरा-सा भी फेरबदल गेम चेंजर साबित हो सकता है।
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Caste Based Survey - फोटो : सोशल मीडिया


रोहिणी आयोग का गठन दिल्ली हाईकोर्ट की रिटायर्ड जज जस्टिस जी रोहिणी की अध्यक्षता में 2017 में किया गया था। अब तक 13 बार इसके कार्यकाल को आगे बढ़ाया गया है। ऐसा कहा जा रहा था कि मोदी सरकार इसे और लंबा खींचना चाहती थी, पर अचानक ही आयोग ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप दी। आयोग का कहना है कि देश की 2,633 ओबीसी जातियों-उपजातियों में से 983 जातियों को ओबीसी आरक्षण का शून्य लाभ मिला है, बात चाहे नौकरी की हो या पढ़ाई की। इसी तरह 994 जातियों की हिस्सेदारी नौकरी और पढ़ाई में मात्र 2.68 फीसदी की रही है।


तो क्या, मोदी सरकार इन पिछड़ी 1,977 जातियों के साथ सामाजिक न्याय करने और बदले में वोट हासिल करने की चुनावी चाल चलेगी? मोदी सरकार ऐसा करती है, तो उसे पिछड़ी ओबीसी जातियों के वोट से अपने वोट बैंक का विस्तार करने में मदद मिलेगी। इस समय एनडीए के पास 25 करोड़ वोटर हैं और करीब इतने ही 2019 के लोकसभा चुनाव के हिसाब से 'इंडिया' के पास हैं। अब सवाल उठता है कि इसके लिए मोदी सरकार को क्या करना होगा।


बताया जाता है कि रोहिणी आयोग 2,633 ओबीसी जातियों की चार श्रेणियां बनाने के पक्ष में है। इस समय कुल आरक्षण 27 फीसदी है। इसमें से पहली श्रेणी को 10 फीसदी आरक्षण देने की बात है। दूसरी श्रेणी को नौ फीसदी, तीसरी श्रेणी को छह फीसदी और चौथी श्रेणी को दो फीसदी आरक्षण देने की बात है। सबसे नीचे की श्रेणी में सबसे पिछड़ी 1,674 जातियां रखी गई हैं, जो अब तक आरक्षण के लाभ से लगभग वंचित रही हैं।


जानकारों का कहना है कि अगर वास्तव में आयोग ने ऐसी सिफारिशें की हैं, तो मोदी सरकार ओबीसी के बड़े वर्ग को अपने साथ ले सकती है, पर यहां दो पेच हैं- एक, पिछड़ों में अगड़े-जाट और यादव नाराज हो जाएंगे, क्योंकि उनका कोटा 27 फीसदी की जगह 10 फीसदी ही रह जाएगा। दूसरा, महा पिछड़ी जातियों को भले ही अभी न के बराबर लाभ मिल रहा हो, पर उन्हें दो फीसदी आरक्षण देने का फैसला ज्यादा खुश करने वाला नहीं होगा। अगर इन महा पिछड़ों को मोदी समझाने में कामयाब हुए, तो खेल बदल सकते हैं।


उधर 'इंडिया' को लगता है कि बिहार के ओबीसी गणना के साथ ही उनकी ओबीसी राजनीति मोदी पर भारी पड़ सकती है। मंडल आयोग ने 1911 की जनगणना के हिसाब से देश में 52 फीसदी ओबीसी होना माना था और 27 फीसदी आरक्षण दिया गया था। देश में कितने ओबीसी हैं, यह संख्या किसी को पता नहीं है। एक अध्ययन के अनुसार, देश में ओबीसी आबादी करीब 45 फीसदी है, तमिलनाडु में 71, कर्नाटक में 62, बिहार में 61, उत्तर प्रदेश में 54, हरियाणा में 47, तो राजस्थान में 48 फीसदी है। ऐसे में, यदि ओबीसी आबादी 45 फीसदी निकलती है, तो मोदी सरकार पर ओबीसी आरक्षण 27 फीसदी से बढ़ाकर 45 फीसदी करने का दबाव डाला जाएगा।


वहीं कुछ लोगों का कहना है कि बेरोजगारी, महंगाई के दौर में आरक्षण का मुद्दा बेहद संवेदनशील है, जो बड़ी आबादी को प्रभावित करता है। ऐसे में आरक्षण के कोटे में जरा-सा भी फेरबदल कुछ के लिए खुशी लाएगा और कुछ के लिए संकट। बीच का रास्ता कोई है नहीं। इसलिए केंद्र सरकार जातीय जनगणना करवाना नहीं चाहती। इस हिसाब से रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट फिलहाल ठंडे बस्ते में डाली जा सकती है। हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि अगर बीजेपी को लगा कि 2024 का आम चुनाव जीतना मुश्किल होगा, तो जनवरी में कमंडल यानी राम मंदिर के उद्घाटन के साथ ही मंडल-2 (वर्गीकरण) को लागू करने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

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