फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

वन्य जीव: बाघ संरक्षण में बड़ी उपलब्धि, लेकिन टला नहीं है खतरा

हरेंद्र सिंह बरगली
Updated Thu, 03 Aug 2023 07:25 AM IST

सार

उत्तराखंड बाघ संरक्षण में सफल रहा है, लेकिन मानवीय हस्तक्षेप के कारण कई बदलावों के चलते जंगली जानवरों का परस्पर आवागमन खतरे में है।
विज्ञापन
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया


उत्तराखंड में स्थित तराई आर्क भूभाग बाघ संरक्षण में सफल रहा है, लेकिन मानवीय हस्तक्षेप के कारण इस भूभाग में विगत वर्षों में हुए कई बदलावों के चलते महत्वपूर्ण बाघ आवासों के बीच जंगली जानवरों का परस्पर आवागमन खतरे में है। पिछले कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण जंगलों को मानवजनित दबाव का सामना करना पड़ा है। कृषि क्षेत्रों का विस्तार, बढ़ती आबादी, शहरीकरण, उपजाऊ खेतों का मानव बस्तियों में बदलना, रेत खनन और बुनियादी ढांचा परियोजनाएं इस भूभाग के भीतर वन्यजीवों के निवास स्थान के नुकसान का कारण बनी हैं।


कॉर्बेट बाघ अभयारण्य बाघों की महत्वपूर्ण आबादी (2022 के आकलन में 260 बाघ) के लिए जाना जाता है, जहां बाघों का आबादी-घनत्व उच्चतम है। जैव-विविधता से भरपूर कॉर्बेट में बाघों के अलावा 1,200 से अधिक हाथियों, चार प्रकार की हिरण प्रजातियों, भालू की दो प्रजातियों, अन्य वन्य जीव प्रजातियों सहित सैकड़ों पक्षी प्रजातियां भी पाई जाती हैं। बाघों के दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए कॉर्बेट और अन्य वन प्रभागों के बीच जानवरों के आवगमन हेतु जंगलों का आपस में जुड़ा होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। कॉर्बेट बाघों को पड़ोसी वन प्रभागों में फैलाने के लिए एक स्रोत के रूप में कार्य करता है।


उत्तराखंड में पश्चिमी तराई आर्क भूभाग के भीतर स्थित लगभग 1,150 वर्ग किलोमीटर में फैला राजाजी बाघ अभयारण्य दूसरा महत्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्र है।  क्षमता के विपरीत यह अभयारण्य अभी तक विभिन्न कारणों से बाघ संरक्षण में उतना प्रभावी योगदान नहीं दे पाया है, क्योंकि महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारे अत्यधिक दबाव में आ गए हैं और मानवीय गतिविधियों, बुनियादी ढांचे के विकास और आसपास के परिदृश्य में तेजी से बदलाव के कारण जंगलों की निरंतरता में और अधिक विखंडन का खतरा है।


वर्ष 2022 में आयोजित बाघ गणना में राजाजी में 54 बाघों का अनुमान लगाया गया है। यह संरक्षण की तत्काल पहल की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। कॉर्बेट से पश्चिमी राजाजी टीआर में बाघों को स्थानांतरित करने का सरकार का निर्णय वास्तव में बाघ संरक्षण प्रयासों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


वर्तमान में केवल दो छोटे और खंडित गलियारे हैं, जो राजाजी और कॉर्बेट को जोड़ते हैं। एक गलियारा लैंसडाउन वन प्रभाग में शिवालिक पहाड़ियों से होकर गुजरता है, जबकि दूसरा हरिद्वार और बिजनौर वन प्रभाग के शिवालिक तलहटी के जंगलों से होकर गुजरता है। दुर्भाग्य से, बाद वाला गलियारा गंभीर दबाव में है, क्योंकि यह कृषि और मानव बस्तियों वाले क्षेत्रों से होकर गुजरता है। इसके अलावा, शहरीकरण और सड़क निर्माण वन्यजीवों की आवाजाही के लिए चुनौतियां खड़ी करते हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग 309 पर यातायात की अनियमित गति तथा स्पीड ब्रेकरों को हटाने के कारण वन्यजीवों को कोसी नदी में पीने के पानी तक पहुंचने और रामनगर वन प्रभाग में प्रवेश करने में बाधा उत्पन्न होती है। कॉर्बेट के पास के गांव पर्यटन केंद्रों में परिवर्तित हो रहे हैं और वहां कई रिसॉर्ट और होटल बनाए जा रहे हैं।


अन्य महत्वपूर्ण बाघ आवास भी विखंडन और गलियारों के नुकसान के कारण गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। बाघ संरक्षण प्रयासों के अगले चरण में वन्यजीवों के आवासों की कनेक्टिविटी को संरक्षित और बहाल करना प्राथमिकता में होना चाहिए। पश्चिमी तराई आर्क भूभाग के भीतर बाघ, हाथी तथा अन्य प्रजातियों के दीर्घकालिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए भूभाग-स्तरीय संरक्षण नीति को अपनाना और संरक्षण उपायों को, जो वन्यजीवों के आवास स्थानों के बीच कनेक्टिविटी, मानव-वन्यजीव संघर्ष के उचित प्रबंध और अवैध शिकार से इन क्षेत्रों को सुरक्षा प्रदान करते हों, लागू करना अत्यंत आवश्यक है।
विज्ञापन

-लेखक द कॉर्बेट फाउंडेशन के डिप्टी डायरेक्टर हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next