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किस दिशा में जाएगा बांग्लादेश

Tue, 05 Nov 2013 07:48 PM IST
महेंद्र वेद
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बांग्लादेश राजनीतिक उथल-पुथल के लिए जाना जाता है। ढाका मुस्लिम लीग का जन्मस्थान रहा, जिसने इसे पाकिस्तान का हिस्सा बनने का रास्ता बनाया और फिर 24 साल बाद एक हिंसक आंदोलन के जरिये अलग राष्ट्र का जन्म हुआ। आजादी के बाद बांग्लादेश ने लोकतंत्र और सैन्य शासन के विभिन्न रूप देखे और इस दौरान इसके दो राष्ट्रपति मारे भी गए।
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बांग्लादेश के अस्तित्व के डेढ़ दशक बाद वर्ष 1991 में जब वहां सैन्य तानाशाही का खात्मा हुआ, तो ऐसा लगा कि उसकी समस्या सुलझ जाएगी। पर ऐसा नहीं हुआ। इसके बजाय यह मुल्क दो विरोधी राजनीतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करने वाले दो परिवारों का अखाड़ा बन गया। इसकी अगुवाई दो महिलाएं कर रही हैं। एक बांग्लादेश के संस्थापक पिता शेख मुजीबुर रहमान की बेटी शेख हसीना हैं और दूसरी पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान की बेवा बेगम खालिदा जिया हैं। शेख हसीना और खालिदा जिया बारी-बारी से सत्ता में आती हैं। ये दोनों एक-दूसरे के साथ बिल्कुल सहयोग नहीं करतीं, कभी एक-दूसरे से सहमत नहीं होतीं, यहां तक कि वे एक-दूसरे से बात भी नहीं करतीं। दुनिया भर में वे दोनों बांग्लादेश की झगड़ालू बेगमों के रूप में मशहूर हैं।

यह सब 1991 से चलता आ रहा है। एक सत्ता में आती हैं, तो दूसरी गलियों में मोर्चेबंदी करती हैं। कानून पारित होते जाते हैं, पर बहस केवल सत्ता पक्ष की तरफ से होती है, विपक्ष संसद का बहिष्कार करता रहता है। ये दोनों गुट बहुत मजबूत हैं। दोनों महिलाओं के साथ उनके सहयोगी हैं। हसीना के साथ चौदह, तो खालिदा के साथ अट्ठारह दल हैं। दोनों गुटों के सहयोगियों की ताकत नगण्य है, क्योंकि बांग्लादेशी मतदाता आम तौर पर एकतरफा मतदान करता है। अब चूंकि जल्दी ही बांग्लादेश में चुनाव होने जा रहे हैं, ऐसे में अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) के बीच गतिरोध चरम पर पहुंच गया है।
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बीएनपी और जमात दोनों ने हड़ताल कर रखी है, जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त है। समस्या की जड़ विपक्षी दलों की उस मांग में निहित है, जिसमें वे चुनावी प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक निष्पक्ष कार्यवाहक सरकार के गठन की मांग कर रहे हैं। प्रधानमंत्री द्वारा इसे खारिज कर देने से विपक्ष की उस सोच को बल मिला है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं होंगे और सत्ताधारी दल को ही फायदा पहुंचाएंगे।

विद्रूप देखिए कि वर्ष 1996 में शेख हसीना ही चुनाव के दौरान कार्यवाहक सरकार का प्रावधान लेकर आई थीं और उन्हें चुनाव में विजय हासिल हुई थी। उसके ठीक एक दशक बाद खालिदा जिया ने कार्यवाहक सरकार को अपने पक्ष में करने की हरसंभव चालें चलीं, ताकि चुनाव जीत सकें, जिससे शेख हसीना को चुनाव का बहिष्कार करने को विवश होना पड़ा। नतीजा यह हुआ कि जिस कार्यवाहक सरकार को संविधान के अनुसार 90 दिन के भीतर चुनाव संपन्न करवाना था, उसने सेना की मदद से तकरीबन दो साल तक शासन किया। सत्ता में आने पर हसीना ने कार्यवाहक सरकार के प्रावधान को खत्म करने के लिए संविधान में 15 संशोधन किए, लेकिन खालिदा जिया इस प्रावधान को वापस लाना चाहती हैं।

जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगने या फिर कम से कम चुनाव अभियान के दौरान उसे निष्क्रिय कर दिए जाने के डर से मौजूदा हालात ज्यादा गंभीर हो गए हैं। बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में कई वरिष्ठ नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जमात ने सितंबर में हड़ताल बुलाई थी। पाकिस्तान की जमात-ए-इस्लामी से नजदीकी संबंध रखने वाली बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी के नेताओं पर मुक्ति युद्ध के दौरान ढाका और कई अन्य शहरों में अनेक बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, नेताओं और विद्यार्थियों की हत्या के आरोप हैं।

शेख हसीना इस समय अपनी पार्टी की लोकप्रियता बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने अनेक मुद्दों को सुलझाने की कोशिश की है, जिनमें म्यांमार और भारत के साथ सीमा पर सुरक्षा से जुड़े मसले भी शामिल हैं। लेकिन ये प्रयास तभी सफल हो सकते हैं, जब राजनीतिक स्थिरता की कुछ गारंटी हो। स्थिरता को लेकर सवाल उठना इसलिए भी लाजिमी है, क्योंकि विपक्षी गठबंधन शेख हसीना सरकार के साथ सहयोग के लिए तैयार नहीं दिखता। कई साल बाद हसीना ने पिछले दिनों खालिदा के साथ फोन पर बात करने की पहल की, लेकिन उन्होंने सकारात्मक जवाब नहीं दिया।

बांग्लादेश के मामले में भारत वैसे तो आधिकारिक रूप से खुद को तटस्थ बताता है, लेकिन हसीना सरकार से उसकी नजदीकी जग जाहिर है। अवामी लीग को भारत का समर्थन मिलने के ऐतिहासिक कारण हैं और इसके लिए शेख हसीना भारत की कृतज्ञ रहती हैं। जबकि खालिदा के साथ भारत के रिश्तों में वह गर्मजोशी नहीं रहती।

पूर्वोत्तर के उग्रवादियों के प्रत्यर्पण के मामले में हसीना ने भारत की पूरी मदद की है, लेकिन दिल्ली ने उस तरह से जवाब नहीं दिया है। वैसे तो भारत ने बांग्लादेश को एक अरब डॉलर की मदद दी है और व्यापार संबंधी छूट भी मुहैया कराई है, लेकिन पड़ोस में एक अनुकूल सरकार का पूरा फायदा उठाने में वह नाकाम रहा है। बांग्लादेश के विपक्षी दल हसीना सरकार पर भारत के प्रति नरमी का आरोप लगाते हैं, पर सीमा पर और समुद्री क्षेत्र में सुरक्षा का मसला दोनों देशों के लिए अहम है। उदासीन भारत के पास तो अब इतना वक्त भी नहीं है कि वह ऐसे कुछ सकारात्मक कदम उठाए, जिससे हसीना की जीत की संभावना बढ़े।
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