साहित्य हर भाषा, हर देश, हर युग में सीमित व्यक्तियों की चीज रही है, क्योंकि जो कलात्मकता होती है, उसको पकड़ पाने का बूता सबमें नहीं होता है। हर रचना को पाठक विस्तार देता है। साहित्य को उस ढंग से लोकप्रिय नहीं बनाया जा सकता, जिस ढंग से सिनेमा है। यदि वैसा ही किया गया, तो साहित्य का स्तर भी सिनेमा की तरह गिरता चला जाएगा।
साहित्य अपनी विशिष्टता, प्रयोगधर्मिता और बारीकीयत के कारण सीमित दायरे की चीज है। आप इसे उसकी सीमा भी कह सकते हैं। साहित्य में आम जनता और उसकी जिंदगी को केंद्र बनाकर कथाएं लिखी जा सकती हैं, लेकिन वह साहित्य लेखक की संवेदना के बल पर ही होगा, सिर्फ जानकारी के अंबार से साहित्य नहीं बनता।
सिर्फ जनवाद या प्रगतिवाद के नाम पर संवेदना से कटी कहानियों का कोई साहित्यिक मूल्य नहीं हो सकता। मैं मानता हूं कि साहित्य व्यक्ति के अंदर बदलाव लाता है। इसका प्रभाव आंतरिक और बहुत गहरा होता है। लेकिन साहित्य के कारण सामाजिक स्तर पर बदलाव होता है या साहित्य परिवर्तन का एक औजार है- यह मैं नहीं मानता।
प्रेमचंद ने सामाजिक बुराइयों पर कितना लिखा, लेकिन कहां दहेज खत्म हुआ, कहां जातिवाद खत्म हुआ और कहां सूदखोरी गई? शोषण आज भी कई रूपों में जारी है। सामाजिक शक्तियां ही बदलाव लाती हैं। जैसे उदाहरण दूं कि आपको नारी की स्थिति में बदलाव दिखता होगा, सही है। लेकिन वह लेखन के कारण नहीं है।
समय और उसके दबाव ने उसकी स्थिति को बदला है। समय बदला तो समाज का ढांचा बदला, परिवार का स्वरूप बदला। परिवार की जरूरतें और आकांक्षाएं बढ़ीं। स्त्री शिक्षित होने लगी। शिक्षित हो गई, तो नौकरी और कामकाज से जुड़ी, वह आर्थिक रूप से सक्षम हो गई। सक्षम हो गई तो उसकी पुरानी स्थिति बदल गई, वह थोड़ा स्वतंत्र हुई।
(लेखक वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार हैं)