यह जीवन असह्य है और दूसरा अप्राप्य। लोग मरने की इच्छा रखने पर अब शर्मिंदा नहीं होते, लोग इस नापसंद कैद से निकलकर दूसरी कैद में चले जाना चाहते हैं, जिसे आगे चलकर वे पुनः नापसंद करने लगेंगे। इन सबके बीच यह आस्था भी शेष है कि कहीं तो मालिक आएगा, कॉरिडोर में पंक्तिबद्ध कैदियों को देखेगा और एक कैदी की ओर इशारा करके कहेगा : इसे अब कैद में मत डालो, इसे मेरे पास भेज दो।
जरूरी चीज़ यह है कि जब तलवार तुम्हारी आत्मा के टुकड़े करे, मन को शांत बनाए रखा जाए, रक्तस्राव नहीं होने दिया जाए। तलवार की ठंडक को पत्थर की-सी शीतलता से स्वीकार किया जाए। इस तरह के प्रहार से, प्रहार के बाद तुम अक्षर बन जाओगे।
आस्थावान होने का मतलब अपने भीतर के अक्षय तत्व को स्वतंत्र करना है, और स्पष्ट शब्दों में कहें तो खुद को स्वतंत्र करना है या और स्पष्ट कहें तो खुद अक्षय होना है या और और स्पष्ट शब्दों में कहें तो ‘होना’ है। पहली स्थिति में मनुष्य अच्छाई को धोखा देता है, उसे अपने लिए बहुत आसानी से प्राप्य बनाकर, और शैतान को भी उसके ऊपर युद्ध छेड़ने की असंभव कोशिश करके। दूसरी स्थिति में, मनुष्य अच्छाई को धोखा देता है, सामान्य स्थितियों में भी उसे पाने की इच्छा न रखकर।
तीसरी स्थिति में, मनुष्य अच्छाई से अधिकतम दूरी बनाकर उसे धोखा देता है और शैतान को अधिकतम पाने की लालसा में खुद को शक्तिहीन बना लेता है। इसलिए इन तीनों में से दूसरी स्थिति अधिक इच्छित होनी चाहिए, क्योंकि अच्छाई तो हमेशा ही धोखा खाती है, लेकिन इस स्थिति में, कम से कम सतही भाषा में ही शैतान के साथ कोई धोखा नहीं होता। खुद को मनुष्यता की कसौटी पर कसो, यह अनास्थावान को अनास्था और आस्थावान को आस्था की ओर अग्रसर करता है।
-मशहूर जर्मन साहित्यकार