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अंतर्ध्वनि: डूबते सूरज की सिंदूरी छांह में मैं जैसे नहाकर ताजा हो उठा था

Fri, 17 May 2019 05:00 PM IST
पंखुड़ी सिंह धर्मवीर भारती, दिवंगत हिंदी साहित्यकार
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- फोटो : social media
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जब आप जिंदगी के भीड़-भाड़ वाले राजमार्ग पर थके-हारे, भीड़ की लहरों में धक्के खाते हुए, विवश आगे ढकेलते जा रहे हों और आपको अकस्मात एक छोटी पगडंडी रास्ते से फूटती दिखाई दे, जो परिचित हरीतिमा को गुदगुदाती हुई किसी अपरिचित ठिकाने को जा रही हो, तो मैं आपसे आग्रह करता हूं कि बिना कुछ भी सोचे-समझे, जल्दी से, तमाम जरूरी काम छोड़कर उस पगडंडी पर मुड़ जाइए। 

 

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कभी-कभी थोड़ा पलायन बहुत स्वस्थ होता है। इसका अहसास मुझे तब हुआ, जब मैंने अपने को भटकते-भटकते उस चर्च के अहाते में पाया, जब सूरज डूब रहा था। और अकस्मात मीनार पर घंटे बजने लगे और हम दोनों मरियम की मूर्ति के सामने खड़े थे। बड़ी शीतलता थी। नीचे नम धरती पर एक खास तरह की घास जमाई गई थी। और तुम बेहद उदास थीं और मैं चुप और अंदर से भरा-भरा। और बिना कुछ बोले जैसे मैं तुम्हारे मन को टटोल रहा था, और बिना कुछ बोले तुम अपरिचित ममता से मुझे कण-कण भरे दे रही थीं। 

 
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लगता था जैसे वहां हम मिल रहे हों, एक दूसरे में घुल रहे हों और डूबते सूरज की हलकी सिंदूरी छांह में मैं जैसे नहाकर ताजा हो उठा था। सच तो यह है कि यह जो कम्बख्त साहित्य की जिंदगी है, यह इतनी कृत्रिम है, इतनी बनावटी है, इतनी अस्वाभाविक है कि मन घुटने लगता है। धीरे-धीरे वे क्षण बिल्कुल दुर्लभ हो जाते हैं, जब हम जीवन जीते हैं, गहराई में जीते हैं। अब मैंने सोचा है कि साहित्य की इस सार्वजनिक हलचल को जरा श्रद्धापूर्वक प्रणाम करूंगा। और अपनी जिंदगी फिर पहले जैसी बनाऊंगा...फूल, प्यार और सुख-दुख के गहरे हिलकोरों वाली। खुशनुमा, उज्ज्वल, पवित्र और रंगारंग। पावस की शाम को बादलों में हजारों रंग की फुलझड़ियां खिल आती हैं न...बिल्कुल वैसी ही।
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