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तीस हजार किसानों को मोटे अनाज की खेती से जोड़ा - शीलू फ्रांसिस

Fri, 17 May 2019 01:58 PM IST
दीपाली अग्रवाल अमर उजाला साहित्य डेस्क, नई दिल्ली
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- फोटो : .
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मैं तमिलनाडु में रहती हूं और कृषि और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करती हूं। मैंने यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से जेंडर प्लानिंग फॉर डेवलपमेंट में डिप्लोमा किया है। तमिलनाडु में खेती की स्थिति  बहुत खराब है। गन्ने और धान जैसी नकदी फसल के कारण तमिलनाडु में भूमिगत जलस्तर बहुत नीचे चला गया है। बाजार में धान की उपलब्धता अधिक होने के कारण किसानों को कीमत भी कम मिलती है। तमिलनाडु में महिला किसानों की संख्या अधिक है। खेती की बदहाल स्थिति का खामियाजा उन्हें सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता है, क्योंकि वे शाम को खेतों में काम करने के बाद रात में रसोई में खाना बनाती हैं।
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मैंने पूरे राज्य का दौरा करने के बाद पाया कि भूमिगत जलस्तर के गिरने के कारण जहां किसानों की आय बहुत ही कम रह गई है, वहीं वे कुपोषित भी हैं, और पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा कुपोषित हैं। फसल के लिए कर्ज लेने के अलावा उन्हें अपनी गृहस्थी चलाने के लिए भी नए सिरे से कर्ज लेना पड़ता है। चूंकि तमिलनाडु में सूखे की समस्या लंबे समय से है, ऐसे में भूमिगत जलस्तर का लगातार गिरते चले जाना बेहद गंभीर मुद्दा है। इस समस्या का समाधान करने के लिए मैंने वुमन्स कलेक्टिव नाम से एक संस्था शुरू की। मैंने महिला किसानों के लिए ही काम शुरू किया, क्योंकि मेरा मानना है कि शोषण का शिकार सर्वाधिक महिलाएं ही होती हैं।

जगह-जगह महिला किसानों से मिलकर मैंने धान के बजाय ज्वार और बाजरे की खेती करने का सुझाव दिया, क्योंकि इनकी खेती में ज्यादा पानी की जरूरत नहीं पड़ती। मैंने उन्हें यह भी बताया कि पहले हमारे देश में जलस्तर गिरने की समस्या नहीं थी, क्योंकि भौगोलिक स्थिति के मुताबिक ही खेती की जाती थी। अब ज्यादा मुनाफे के चक्कर में नकदी फसल उपजाई जाती है, जिसके लिए ज्यादा पानी की जरूरत होती है। मुझे यह भी पता चला कि राज्य में पहले बड़े पैमाने पर मोटे अनाज का उत्पादन होता था, पर गन्ने की खेती करने के लिए किसानों को कर्ज मिलता है, इसलिए बड़ी संख्या में लोगों ने ज्वार-बाजरे की जगह गन्ने की खेती शुरू की थी।
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शुरुआत में दो गांवों की महिलाओं ने मेरी सलाह पर अमल किया। ज्वार और बाजरे की फसल न केवल कम पानी में भी अच्छी हुई, बल्कि किसानों को उनके ज्यादा दाम मिले, क्योंकि राज्य में इसकी खेती कम होती है, जबकि पौष्टिक होने के कारण हाल के वर्षों में इनकी मांग बढ़ी है। मैंने किसानों को रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल न करने की भी सलाह दी। कुछ किसानों को मेरा यह सुझाव अच्छा नहीं लगा, क्योंकि खेतों की उर्वरा शक्ति घट चुकने के कारण वे रासायनिक उर्वरकों के अधिक इस्तेमाल के आदी हो चुके थे।

लेकिन उन किसानों ने पाया कि मेरी सलाह पर जैविक खाद का इस्तेमाल करने के बावजूद मोटे अनाज का उत्पादन पर्याप्त हुआ। इसका नतीजा यह हुआ कि धीरे-धीरे किसानों में खेती का पैटर्न बदलने की इच्छा जागी। अचानक ही धान की जगह ज्वार, बाजरा और रागी जैसे मोटे अनाज की खेती बढ़ने लगी है। बाजार में इनकी कीमत तो अधिक मिलती ही है, इनका सेवन कुपोषण की समस्या का भी इलाज है। खेती का यह पैटर्न जारी रहा, तो भूमिगत जलस्तर के नीचे जाने का खतरा भी नहीं रहेगा। राज्य के करीब 30,000 किसानों ने नकदी फसल छोड़ मोटा अनाज उपजाना शुरू किया है, जो एक अच्छा संकेत है।


-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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