हिंदी भारत के जन-जन की भाषा है।
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मैं कलकल-छलछल करती नदिया की तरह हर आम और खास भारतीय ह्रदय में प्रवाहित होती हूं। मैं मंदिरों की घंटियों, मस्जिदों की अजान, गुरुद्वारे की शबद और चर्च की प्रार्थना की तरह पवित्र हूं। क्योंकि मैं आपकी, आप सबकी-अपनी हिन्दी हूं। विश्वास करों मेरा कि मैं दिखावे की भाषा नहीं हूं, मैं झगड़ों की भाषा भी नहीं हूं।
मैंने अपने अस्तित्व से लेकर आज तक कितनी ही सखी भाषाओं को अपने आंचल से बांधकर हर दिन एक नया रूप धारण किया है। फारसी, अरबी, उर्दू से लेकर आधुनिक बाला अंग्रेजी तक को आत्मीयता से अपनाया है। आधुनिक काल में मनुष्य अपनी सभ्यता तथा संस्कृति को खो दिया है।
भारतीय संस्कृति एक सतत् संगीत है। संस्कृति, संस्कार से बनती है। सभ्यता बनती है नागरिकता से। किसी भी नागरिक की पहचान उसकी भाषा से ही होती है। किसी भी देश की नागरिकता का सम्बन्ध उस देश की भाषा से होता है। संस्कृति व सभ्यता ही मानवता का पाठ पढाती है। संस्कृति आशावाद सिखाती है। संस्कृति का दर्शन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। दर्शन जीवन का आधार है। संस्कृति बौद्धिक व मानसिक विकास में सहायक है।
कवि रामधारी सिंह दिनकर के अनुसार संस्कृति जीवन जीने का तरीका है। भारत का संस्कृति शब्द संस्कृत भाषा से आया। संस्कृति शब्द का उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है। ऐतरेय , ऋग्वेद का ब्राह्मण ग्रन्थ है।
ऋग्वेद संपूर्ण ज्ञान व ऋचाओं (प्रार्थनाओं) का कोष है। ऋग्वेद मानव ऊर्जा का स्रोत है। अतएव हम कह सकते हैं कि हिंदी भाषा हिंदुस्तान कि संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक है।
हमें संस्कृति और मूल्यों को बरकरार रखना चाहिए और हिंदी दिवस इसके लिए एक अनुस्मारक के रूप में कार्य करता है। हिंदी भाषा राष्ट्र के गौरव का प्रतीक है।
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