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विश्व बाल श्रम निषेध दिवस 2020: बाल श्रम को रोके बिना अधूरी है भारत की तरक्की

सार

  • दशकों से भारत बालश्रम के नासूर को ढो रहा है।
  • भारत बाल श्रम से बच्चों को मुक्त करने के मामले में अभी भी मीलों दूर है।
  • बाल श्रम केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, यह एक वैश्विक घटना है।
  • बाल श्रम आमतौर पर मजदूरी के भुगतान के बिना या भुगतान के साथ बच्चों से शारीरिक कार्य कराना है।
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बालश्रम केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, यह एक वैश्विक घटना है। - फोटो : रोहित झा,अमर उजाला
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विस्तार
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मासूम सा फ़रिश्ता है वो, जिसे मां के आंचल में खिलना था, जिस जीवन में हंसना था वो आंसू पीकर मजबूत बना।

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बालश्रम की कालिख से ये कैसा बचपन गुजर रहा, ये कैसी गुमनामी के अंधेरे में हमारा देश पनप रहा है?


दशकों से भारत बालश्रम के नासूर को ढो रहा है। देश का बचपन अपने सुनहरे सपनों की जगह कभी किसी के घर को चमका रहा है या अपने नाजुक कंधो से बोझा ढोकर अपने परिवार का पेट पाल रहा है। यद्दपि भारत सरकार ने बालश्रम की समस्या को समाप्त करने के लिए अपने कदम उठाए हैं।

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन के द्वारा वर्ष 2016 में लिए गए डाटा से पता चलता है कि भारत बाल श्रम से बच्चों को मुक्त करने के मामले में अभी भी मीलों दूर है।

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इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट 'बाल श्रम के वैश्विक अनुमान, परिणाम और रुझान, 2012-2016' में कहा गया है कि पांच और 17 वर्ष की उम्र के बीच 152 मिलियन बच्चों को अवांछनीय परिस्थितियों में श्रम करने को मजबूर किया जा रहा है।

सेव द चिल्ड्रेनरिपोर्ट के अनुसार

  • दुनिया के आधे से अधिक बच्चों को गरीबी, संघर्ष और लड़कियों के खिलाफ भेदभाव का खतरा है। 
  • ये बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं यहांं तक कि स्वास्थ्य देखभाल तथा भोजन जैसी मूलभूत आवश्यकताओं से भी वंचित रहते हैं।
  • इन बच्चों से उनकी मासूमियत छीन ली गई है और उनका बचपन एवं भविष्य जिसका उन्हें हक़ है वह भी छीन लिया गया है।

क्या है बाल श्रम


बाल श्रम आमतौर पर मजदूरी के भुगतान के बिना या भुगतान के साथ बच्चों से शारीरिक कार्य कराना है। बाल श्रम केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, यह एक वैश्विक घटना है। भारतीय संविधान के अनुसार किसी उद्योग, कल-कारखाने या किसी कंपनी में मानसिक या शारीरिक श्रम करने वाले 5 - 14 वर्ष उम्र के बच्चों को बाल श्रमिक कहा जाता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार - 18 वर्ष से कम उम्र के श्रम करने वाले लोग बाल श्रमिक हैं।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार  - बाल श्रम की उम्र 15 साल तय की गई है।
अमेरिका में - 12 साल या उससे कम उम्र के लोगों को बाल श्रमिक माना जाता है।

भारत में 1979 में सरकार द्वारा बाल मजदूरी को खत्म करने के उपाय के रूप में गुरूपाद स्वामी समिति का गठन किया गया। जिसके बाद बालश्रम से जुड़ी सभी समस्याओं के अध्ययन के बाद गुरूपाद स्वामी समिति द्वारा सिफारिश प्रस्तुत की गई, जिसमें गरीबी को मजदूरी के मुख्य कारण के रूप में देखा गया और ये सुझाव दिया गया, कि खतरनाक क्षेत्रों में बाल मजदूरी पर प्रतिबंध लगाया जाए एवं उन क्षेत्रों के कार्य के स्तर में सुधार किया जाए।

समिति द्वारा बाल मजदूरी करने वाले बच्चों की समस्याओं के निराकरण के लिए बहुआयामी नीति की जरूरत पर भी बल दिया गया।   

1986 में समिति के सिफारिश के आधार पर बाल मजदूरी प्रतिबंध विनियमन अधिनियम अस्तित्व में आया, जिसमें विशेष खतरनाक व्यवसाय व प्रक्रिया के बच्चों के रोजगार एवं अन्य वर्ग के लिए कार्य की शर्तों का निर्धारण किया गया।

इसके बाद सन 1987 में बाल मजदूरी के लिए विशेष नीति बनाई गई, जिसमें जोखिम भरे व्यवसाय एवं प्रक्रियाओं में लिप्त बच्चों के पुर्नवास पर ध्यान देने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

बच्चों की समस्याओं पर विचार करने के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय प्रयास उस समय हुआ, जब अक्टूबर 1990 में न्यूयार्क में इस विषय पर एक विश्व शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें 151 राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा गरीबी, कुपोषण व भुखमरी के शिकार दुनिया भर के करोड़ों बच्चों की समस्याओं पर विचार-विमर्श किया गया।

10 अक्टूबर 2006 तक बालश्रम क़ानून को इस असमंजस में रखा गया की किसे खतरनाक और किसे गैर खतरनाक बाल श्रम की श्रेणी में रखा जाए। उसके बाद बाल श्रम निवारण अधिनियम 1986 में संशोधन कर ढाबों, घरों, होटलों में बालश्रम करवाने को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया। 

यूनिसेफ के अनुसार, बच्चों का किसी संस्था में नियोजन इसलिए किया जाता है...

बालश्रम की वजह से बच्चे शिक्षा से दूर हो जाते हैं। - फोटो : अमर उजाला
बाल श्रम के कारण
  • यूनीसेफ के अनुसार, बच्चों का किसी संस्था में नियोजन इसलिए किया जाता है, क्योंकि उनका आसानी से शोषण किया जा सकता है। 
  • बच्चे अपनी उम्र के अनुरूप कठिन काम जिन कारणों से करते हैं, उनमें आमतौर पर गरीबी पहला कारण है। 
  • इसके अलावा, जनसंख्या विस्फोट, सस्ता श्रम, उपलब्ध कानूनों का लागू नहीं होना, बच्चों को स्कूल भेजने के प्रति अनिच्छुक माता-पिता (वे अपने बच्चों को स्कूल की बजाय काम पर भेजने के इच्छुक होते हैं, ताकि परिवार की आय बढ़ सके) जैसे अन्य कारण भी हैं।
किन - किन रूपों में होता है बाल श्रम ?
  • बाल मज़दूर - वे बच्चे जो कारखानों, कार्यशालाओं, प्रतिष्ठानों, खानों और घरेलू श्रम जैसे सेवा क्षेत्र में मज़दूरी या बिना मज़दूरी में काम कर रहे हैं।
  • गली - मोहल्ले के बच्चे - कूड़ा बीनने वाले, अखबार और फेरी लगाने वाले और भीख मांगने वाले।
  • बंधुआ बच्चे - वे बच्चे जिन्हें या तो उनके माता-पिता ने पैसों की ख़ातिर गिरवी रखा है या जो कर्ज़ को चुकाने के चलने मज़बूरन काम कर रहे हैं।
  • वर्किंग चिल्ड्रन - वे बच्चे जो कृषि में और घर-गृहस्थी के काम में पारिवारिक श्रम का हिस्सा हैं।
  • यौन शोषण के लिए इस्तेमाल किए गए बच्चे - हजारों बालिक बच्चे और नाबालिक लड़कियां यौन शोषण की जद में हैं।
  • घरेलू गतिविधियों में लगे बच्चे - घरेलू सहायता के रूप में काम। इसमें लड़कियों का शोषण सबसे ज़्यादा है - बच्चे छोटे भाई-बहनों की देखभाल, खाना पकाने, साफ-सफाई और ऐसी अन्य घरेलू गतिविधियों में लगे हुए हैं।
बाल श्रम के कारण
  • बढ़ती जनसंख्या
  • गरीबी
  • खाद्य असुरक्षा
  • अशिक्षा
  • बेरोज़गारी
  • अनाथ
  • मौजूदा क़ानूनों का लागू न होना
  • सस्ता श्रम
बाल श्रम से उत्पन्न समस्या
बाल श्रम एक सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय समस्या है। इसके चलते -
  • बच्चे शिक्षा से दूर हो जाते हैं
  • स्वास्थ्य पर बुरा असर
  • बच्चों से दुर्व्यवहार
  • विस्थापन और असुरक्षित प्रवासन
  • यौन शोषण के लिए ग़ैर क़ानूनी ख़रीद - फ़रोख़्त (चाइल्ड पोर्नग्राफी)
  • भिक्षावृत्ति,
  • मानवअंगों का कारोबार
  • बाल अपराध
  • खेल कूद और मनोरंजन जैसे ज़रूरी गतिविधियां प्रभावित
इन सब के चलते बच्चों का शरीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है जोकि बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में मुश्किलें खड़ी करता है।

बाल श्रम एक ऐसा विषय है, जिस पर संघीय व राज्य सरकारें, दोनों कानून बना सकती हैं...

भारतीय संविधान में बाल मजदूरी पर लगाम लगाने के लिए कई प्रावधान हैं। - फोटो : Pixabay
बाल श्रम के लिए संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान में बाल मजदूरी पर लगाम लगाने के लिए कई प्रावधान हैं। संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप भारत का संविधान मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धातों की विभिन्न अनुच्छेदों के माध्यम से कहता है- 
  • अनुच्छेद 15 (3) - बच्चों के लिए अलग से क़ानून बनाने का अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 21 - (6 -14) वर्ष के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार।
  • अनुच्छेद 23 - बच्चों की ख़रीद और बिक्री पर रोक लगाता है।
  • अनुच्छेद 24 - 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को ख़तरनाक कामों में प्रतिबन्ध लगाया गया है।
  • अनुच्छेद 39 - नीति निर्देशक सिद्धांत के अंतर्गत आने वाला ये अनुच्छेद में बच्चों के स्वास्थ्य और उनके शारीरिक विकास के लिए ज़रूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने का आदेश देता है। राज्य अपनी नीतियाँ इस तरह निर्धारित करेंगे कि श्रमिकों, पुरुषों और महिलाओं का स्वास्थ्य तथा उनकी क्षमता सुरक्षित रह सके तथा बच्चों की कम उम्र का शोषण न हो एवं आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये वे अपनी उम्र व शक्ति के प्रतिकूल काम में प्रवेश करें।
  • अनुछेद 45 - नीति निर्देशक सिद्धांत के अंतर्गत आने वाला इस अनुच्छेद में भी 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की देखभाल और शिक्षा की ज़िम्मेदारी राज्यों की है। बच्चों को स्वस्थ तरीके से स्वतंत्र व सम्मानजनक स्थिति में विकास के अवसर तथा सुविधाएँ दी जायेंगी और बचपन व जवानी को नैतिक व भौतिक दुरुपयोग से बचाया जाएगा। 
  • संविधान लागू होने के 10 साल के भीतर राज्य 14 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेंगे।
  • बाल श्रम एक ऐसा विषय है, जिस पर संघीय व राज्य सरकारें, दोनों कानून बना सकती हैं। 
  • अनुच्छेद 51 A - माता पिता पर बच्चों की शिक्षा के लिए अवसर प्रदान करने का एक मौलिक कर्तव्य निर्धारित करता है।
बाल अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय कानून
  • कारखाना अधिनियम 1948 - 14 साल तक की आयु वाले बच्चों को कारखाने में काम करने से रोकता है।15 से 18 वर्ष तक के किशोर किसी फैक्टरी में तभी नियुक्त किये जा सकते हैं, जब उनके पास किसी अधिकृत चिकित्सक का फिटनेस प्रमाण पत्र हो। इस कानून में 14 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिये हर दिन साढ़े चार घंटे की कार्यावधि तय की गई है और उनके रात में काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। धारा 24-  14 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्ट्री या खदान में कार्य करने के लिए नियुक्त नहीं किया जाएगा और ना ही किसी खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जाएगा। न्यायालय ने यह आदेश भी दिया था कि एक बाल श्रम पुनर्वास सह कल्याण कोष की स्थापना की जाए, जिसमें बाल श्रम कानून का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं के अंशदान का उपयोग हो।
  • खदान अधिनियम 1952 - 18 साल से कम आयु वाले बच्चों को खदानों में काम करने पर प्रतिबन्ध लगाता है
  • अनैतिक तस्करी (बचाव) अधिनियम 1956
  • बाल श्रम (निषेध व नियमन) कानून 1986- यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी अवैध पेशे और 57 प्रक्रियाओं में, जिन्हें बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य के लिये अहितकर माना गया है, नियोजन को निषिद्ध बनाता है। इन पेशों और प्रक्रियाओं का उल्लेख कानून की अनुसूची में है। 
  • राष्ट्रीय बाल श्रम नीति 1987
  • किशोर न्याय देखभाल और संरक्षण अधिनियम 2000 - बच्चों के रोज़गार को दंडनीय
  • बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006
  • राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग 2007 - बाल अधिकारों के उल्लंघन के जुड़े मसले को सुलझाने का काम
  • निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009
  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012
  • किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2015

जरूरत के हिसाब से 1986 के बाल मजदूरी कानून में संशोधन किया गया है...

बच्चे स्कूल के बाद केवल तीन घंटे पारिवारिक उद्यमों में मदद कर सकते हैं। - फोटो : social media
बाल श्रम को रोकने के लिए सरकारी योजनाएं
  • बाल फिल्म सोसायटी 1955
एकीकृत बाल संरक्षण योजना (ICPS) 2009 -10
ICPS के तहत अलग - अलग बाल संरक्षण कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। इनमें -
  1. बाल न्याय के लिए कार्यक्रम।
  2. फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों के लिए एकीकृत कार्यक्रम।
  3. एक ही जगह विस्तृत नियमों और नए कार्यक्रमों सहित देश के भीतर बच्चों को गोद देने को बढ़ावा देने के लिए गृहों (शिशु गृह) को सहायता देने की योजना।
  • राष्ट्रीय बाल भवन राष्ट्रीय
  • खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013
बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) संशोधन विधेयक 2016
ज़रूरत के हिसाब से 1986 के बाल मज़दूरी क़ानून में संशोधन किया गया है। बाल श्रम संशोधन बिल 2012 में राज्य सभा में पेश किया जिसे साल 2016 में लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों से पारित कर दिया गया। ये संशोधन बच्चों को कुछ विशेष प्रकार के व्यवसायों में काम पर करने पर रोक लगाता है और दूसरे व्यवसायों में बच्चों के काम करने की स्थिति को नियमित करता है।

बाल श्रम क़ानून 2016 में ये छूट दी गई है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे पारिवारिक व्यवसाय में काम कर सकते हैं। इसके अलावा बिल में "किशोर" शब्द के ज़रिए 14 से 18 वर्ष की आयु के बच्चों को भी परिभाषित किया गया।

जहां पहले बाल श्रम अधिनियम 1986 में 83 क्षेत्रों को खतरनाक घोषित किया गया था तो संशोधन के बाद अब केवल तीन क्षेत्रों को ही ख़तरनाक बताया गया जहां किशोर बच्चे काम नहीं कर सकते। बिल में दिए गए ख़तरनाक कामों में खनन, ज्वलनशील पदार्थ और खतरनाक प्रक्रियाओं में किशोरों को काम पर रखने पर रोक है।

बाल श्रम संशोधन अधिनियम, 2017
बाल श्रम क़ानून 2016 के आते ही इसकी आलोचना की गई। आलोचना की वजहों में - ख़तरनाक व्यवसायों की संख्या को 83 से घटाकर तीन कर दिया जाना और बच्चों को पारिवारिक उद्यमों में काम करने की इजाज़त देने जैसे फैसले शामिल थे। इसके बाद इस क़ानून में कुछ ज़रूरी बदलाव किए गए। बदलावों के मुताबिक़ –
  • इसके बाद इस क़ानून में कुछ ज़रूरी बदलाव किए गए। बदलावों के मुताबिक़ बच्चे अब स्कूल के बाद केवल तीन घंटे ही पारिवारिक उद्यमों में मदद कर सकेंगे।
  • बच्चे शाम 7 और सुबह 8 बजे के बीच पारिवारिक उद्यमों में मदद नहीं कर सकेंगे।
  • बच्चे या किशोरों को एक कलाकार के रूप में एक दिन में केवल 5 घंटे और बिना आराम के 3 घंटे तक काम करने की इजाज़त दी गई है।
  • किसी भी ऑडियो-विज़ुअल मीडिया निर्माता या किसी वाणिज्यिक व्यवसाय जिसमें बच्चे या किशोरों की भागीदारी हो, ऐसा करने के लिए हर 6 महीने में ज़िला मजिस्ट्रेट से मंज़ूरी लेनी होगी।
  • किसी भी बच्चे या किशोर को बिना उसकी इच्छा और सहमति के किसी भी ऑडियो विजुअल और स्पोर्ट्स जैसी गतिविधियों में भाग लेने के लिये नहीं कहा जाएगा।
राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना NCLP
बाल मज़दूरी से आज़ाद कराए गए बच्चों के पुनर्वास के लिए सरकार ने राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना लागू की थी। इस परियोजना का मक़सद बाल मज़दूरी से आज़ाद कराए गए बच्चों का विशेष स्कूलों में दाख़िला कराया जाता है। जहां उन्हें औपचारिक शिक्षा प्रणाली में डालने से पहले शिक्षा, व्यवसायिक प्रशिक्षण, पौष्टिक आहार और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं।
बाल श्रम के लिए काम कर रहे कुछ गैर सरकारी संगठन भारत में कुछ गैर सरकारी संगठन भी बाल मज़दूरी को रोकने के लिए काम कर रहे हैं।
  • बचपन बचाओं आंदोलन
  • कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन फाउंडेशन
  • CRY - Child Rights and You
  • प्रथम संगठन
  • चाइल्ड फण्ड
  • तलाश एसोसिएशन
  • RIDE India,
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अधिसूचित बाल श्रम कानून शायद ही कभी लागू होते हैं...

हर साल 12 जून को विश्व दिवस बाल श्रमिकों की दुर्दशा को उजागर करने के लिए कई कैंपेन भी चलाए जाते हैं। - फोटो : Pixabay
बाल मज़दूरी से होने वाले रोग
  • बीड़ी उद्योग - टी. बी. श्वासनली – शोथ
  • हस्तकरघा उद्योग - दमा, टी. बी. श्वासनली – शोथ, रीढ़ की हड्डी की बीमारी
  • जरी एवं कढ़ाई - आँखों में त्रुटि एवं खराबी
  • रून व हिरा कटिंग - आँखों में त्रुटि एवं खराबी
  • कागज के टुकड़े को बटोरना - सिलिकोसिस, सर्दी एवं खांंसी
  • पत्थर एवं स्लेट खनन - सिलिकोसिस
  • चूड़ी उद्योग - ताप आघात (प्रहार), चर्म-रोग, श्वासदोष, कंजंकटीवाइटिस
  • कृषि उद्योग - चर्म- रोग, कीटनाशक दवाईयों एवं मशीनों का दु:प्रभाव, स्नायु संबंधी जटिलता एवं अत्यधिक उत्तेजना, ऐठन
  • ईंट भट्टी - सिलिकोसिस, ऐठन
  • माचिस उद्योग - आग से दुर्घटना, तुरंत मृत्यु
  • शीशा एवं पावरफुल उद्योग -दमा, श्वासनली- शोथ, तपेदिक, आँखों में खराबी, जलना इत्यादि .
भारत निम्नलिखित संधियों पर हस्ताक्षर कर चुका है
  • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन बलात श्रम सम्मेलन (संख्या 29)
  • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन बलात श्रम सम्मेलन का उन्मूलन (संख्या 105)
  • बच्चों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (सीआरसी)
  • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने बाल श्रम को  खत्म करने साथ ही आवश्यक कार्रवाई और प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए 2002 में बाल दिवस के खिलाफ विश्व दिवस का शुभारंभ किया।
 
संक्षेप/ सार
हर साल 12 जून को विश्व दिवस बाल श्रमिकों की दुर्दशा को उजागर करने के लिए सरकारों, नियोक्ताओं और श्रमिक संगठनों, नागरिक समाज के साथ-साथ दुनिया भर के लाखों लोगों को जागरूक करता है और उनकी मदद के लिए कई कैंपेन भी चलाए जाते हैं। इस बार भी मनाया जाएगा। 2019 में बाल श्रम निषेध दिवस की थीम बच्चों को सड़कों पर नहीं बल्कि सपनों पर काम करना चाहिए थी। 

बाल श्रम 2020 के खिलाफ विश्व दिवस की थीम “बच्चों को खेतों में काम नहीं करना चाहिए, लेकिन सपने पर”। विषय दुनिया भर में कृषि क्षेत्र में काम करने वाले बच्चों के विकास पर केंद्रित है। यदपि भारत में बाल श्रम का शोषण बहुत फैला हुआ है।

यह अधिकारियों की आंखों के सामने चलता है और अधिसूचित बाल श्रम कानून शायद ही कभी लागू होते हैं। ये भी सच है की बाल श्रम पर अंकुश लगाने के लिए कई संगठन, आईएलओ आदि प्रयास कर रहे हैं। लेकिन हमें भी जिम्मेदार होना चाहिए और अपने कर्तव्यों को बाल श्रम को खत्म करने में मदद करना चाहिए।

बाल अधिकारों के बिना भारत की तरक्की है अपूर्ण, बाल मजदूरी रोककर करो इसे परिपूर्ण।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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