पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा पर डॉक्टर केस का असर साफ दिखाई दे रहा है। कोलकाता की नाकतला नबपल्ली दुर्गापूजा समिति न आर.जी. कर की पीड़िता के लिए न्याय की मांग करते हुए पूरे पंडाल को ऐसे पोस्टरों और तस्वीरों से सजाने का फैसला किया है। पंडाल की साज-सज्जा में महिला अधिकारों की भी वकालत की जाएगी।
कोलकाता की नाकतला नबपल्ली दुर्गापूजा समिति न आर.जी. कर की पीड़िता के लिए न्याय की मांग करते हुए पूरे पंडाल को ऐसे पोस्टरों और तस्वीरों से सजाने का फैसला किया है। पंडाल की साज-सज्जा में महिला अधिकारों की भी वकालत की जाएगी।
इस साल आम लोगों ने आर.जी. कर की घटना को ध्यान में रखते हुए पूजा को उत्सव की तरह नहीं मनाने का फैसला किया है, इसलिए पूजा का आयोजन तो पहले जैसा ही होगा. लेकिन उसमें रंगीनियां नहीं होंगी। पहले जहां दुकानो में रोजाना औसतन 20 से 25 हजार की बिक्री होती थी वह अब घटकर पांच से 10 हजार के बीच यानी आधा या उससे भी कम रह गई है। कपड़ा बिक्रेताओं का दावा है कि इस बार कारोबार पिछले साल के मुकाबले एक-तिहाई है।
बंगाल में दुर्गा पूजा का कारोबार 50 हजार करोड़ से ज्यादा है. पूजा के दौरान कॉर्पोरेट घराने 800 से लेकर 1000 करोड़ रुपए से ज्यादा तक खर्च करते हैं. इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स पहले ही अनुमान जता चुका है कि 2030 तक दुर्गा पूजा का टर्नओवर मेगा कुंभ मेला के बराबर हो जाएगा जो करीब एक लाख करोड़ रुपए है। कोलकाता और उसके आस-पास के इलाकों में हर साल करीब साढ़े चार हजार पूजा आयोजित की जाती है. इनमें करीब दो सौ आयोजन ऐसे हैं, जिनमें हर पूजा में 50 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है. बाकियों में से हर पूजा में 20 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है. कुल मिलाकर करीब तीन लाख रोजगार पैदा होते हैं. इनमें टैक्सी ड्राइवर औऱ टूर गाइड्स भी शामिल हैं.
लोग इस बार उत्सव मनाने के मूड में नहीं हैं। हर साल पूजा के करीब दो महीने पहले से ही प्रमुख बाजारों में भीड़ उमड़ने लगती थी, लेकिन इस साल अपवाद है. इस साल पहले जैसी भीड़ नहीं नजर आ रही है. बिक्री का आंकड़ा भी काफी घट गया है।
कोलकाता की एक प्रमुख आयोजन समिति, जिसका बजट करोड़ों में होता है, के संयोजक दीपंकर दास बताते हैं कि इस साल प्रायोजक ही नहीं मिल रहे हैं। पिछले साल के मुकाबले आधे विज्ञापन भी नहीं मिले हैं. इसकी वजह से बजट में भारी कटौती करनी पड़ी है।
आयोजन समितियों के साझा मंच फोरम फार दुर्गोत्सव के अध्यक्ष पार्थ घोष बताते हैं कि पूजा की करीब 50 हजार करोड़ की अर्थव्यवस्था में 16 सौ करोड़ के खर्च पंडालों और साज-सज्जा पर किया जाता है। इसका 60 फीसदी प्रायोजकों की ओर से मिलता है. लेकिन इस साल कई प्रमुख प्रायोजकों ने या तो अपना हाथ खींच लिया है या फिर बजट में कटौती कर दी है. इससे आयोजन समितियों को भी बजट में कटौती करनी पड़ रही है।
कोलकाता के आर.जी. कर अस्पताल के पास होने वाली सौ साल से भी ज्यादा पुरानी आयोजन समिति के महासचिव अभिषेक भट्टाचार्य बताते हैं कि समिति ने उस घटना को ध्यान में रखते हुए इस साल आयोजन में कटौती की है. लेकिन साथ ही यह भी याद रखना होगा कि इस उत्सव से लाखों लोगों की आजीविका भी जुड़ी है। ऐसा नहीं होता तो हम इस साल पूजा का आयोजन ही नहीं करते।