आज स्टीन ऑडिटोरियम, इंडिया हैबिटाट सेंटर, लोधी रोड की सारी सीटें खचाखच भरी हैं। लोग गार्ड से रिक्वेस्ट करके किसी तरह अंदर प्रवेश पा रहे हैं। और ऐसे माहौल का बनना लाज़मी है। मंच पर विदुषी सविता देवी अपनी बनारसी होली ठुमरी, होली दादरा और चैती के साथ आसीन हैं। मंच मानों सविता या सूर्य की आभा से दमक रहा हो।
जितनी सुंदर गायिका, उतनी ही मधुर उनकी आवाज और साथ में संगत देती खूबसूरत शिष्याएं। पीली साड़ी और लाल बिंदी में सविता जी इतनी खूबसूरत लग रही थीं, मानों सरस्वती स्वयं गाने बैठ गई हों। परंपरागत तरीके से उन्होंने गुरुवंदना गाई और फिर राग काफी में होरी ठुमरी ‘उड़त अबीर गुलाल लाल हो’ गाना शुरू किया।
मंच पर गेंदे और रजनीगंधा की सजावट देखने लायक थी। सविता जी के गायन ने ऐसा समा बांधा की कब 6:30 बजे शाम से रात के 9:30 बज गए पता ही नहीं चला। एक के बाद एक होरी गायी जा रही थीं। आइए अब सविता जी के बारे में कुछ बातें करते हैं। वो किसी परिचय की मोहताज नहीं इसलिए उनके बारे में बात किया जाना कहीं ज्यादा लाजिम होगा।
सन् 1940 को ठुमरी साम्राज्ञी पद्मश्री सिद्धेश्वरी देवी ने एक अप्रतीम सुंदर बालिका को जन्म दिया जो बाद में बनारस घराने की सुविख्यात ठुमरी गायिका - विदुषी सविता देवी के नाम से जानी गईं। बचपन से ही इन्हें गायन का शौक था पर सिद्धेश्वरी देवी जी उन्हें गायिका बनाना नहीं चाहती थीं। उनका मन था कि उनकी बेटी डॉक्टर बने तो उनका दाखिला विज्ञान के कोर्स के लिए हुआ पर सविता जी का मन उस कोर्स में नही लगा और वे सितार सीखने लगीं।
फिर आगे चलकर उन्होंने बनारस हिंदूू विश्वविद्यालय से सितार में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। वह पंडित रविशंकर जी की गंडाबंध शगिर्दा थीं, पर ठुमरी की शिक्षा उन्हें गर्भ से ही मिलने लगी थी। मां सिद्धेश्वरी उन्हें लोरी के रूप में ठुमरी सुनाया करती थीं और एक बार उन्होंने ठुमरी की बढ़त के क्रम को बदल दिया तो सिर्फ आठ महिने की बालिका सविता रो पड़ी। उनकी मां को समझ नहीं आया तो कुछ देर सोंचने के बाद उन्होंने ठुमरी को पुराने क्रम में गाया और वे चुप हो गईं। ऐसा दो-तीन बार हुआ।
इससे ये भी प्रमाणित होता है कि सविता जी प्रखर बुद्धि की तो थी हीं साथ- ही- साथ किसी भी शिक्षण पर अनुवंशातक और वातावरण दोनों ही कारक प्रभाव डालते हैं। इस प्रकार ठुमरी की तालीम अपनी मां की देखरेख में उन्हें बचपन से ही मिलने लगी थी। सविता जी कहती थीं कि मां बहुत अनुशासन-प्रिय थीं।
शिक्षण के समय वे थोड़ी भी ढिलाई पसंद नहीं करती थीं। चूंकि उनका घर कबीर- चौरा (बनारस का एक मोहल्ला जहां सभी बड़े संगीतज्ञों का आवास है) में था और उनके घर से सटा हुआ बड़े रामदास जी का घर था तो उनकी नींद रामदासजी के घर के गायन को सुनकर ही खुलती थी। सितार की शिक्षा की वजह से उनकी संगीत की समझ बहुत गहरी थी।
सच कहूं तो उन्होंने ठुमरी शैली के साथ पूर्ण न्याय किया। ठुमरी को भावों की भाषा कहते हैं और सविताजी इन भावों को उकेरने में माहिर थीं। वे कानपुर विश्वविद्यालय में भी प्राध्यापिका रहीं और विश्वविख्यात तबलावादक पद्मविभूषण पंडित किशन महाराज से शादी के बाद उन्होंने वहां की नौकरी छोड़ दी। तबतक सिद्धेश्वरी देवी दिल्ली में रहने लगी थीं।
पंडित किशन महाराज और सवितादेवी के दो पुत्र हुए। बड़े पुत्र की एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। पंडितजी के साथ उनके संबंध बहुत अच्छे नहीं थे। उनका जीवन बहुत ही संघर्षपूर्ण रहा बाद में वे बनारस से अपनी मां के पास दिल्ली आ गई और दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज में संगीत की विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत रहीं और यहीं से रिटायर भी हुईं। वह आकर्षक व्यक्तित्व और पैनी आवाज की मालकिन थीं। उन्होंने अपनी मां के जीवन पर 'मां सिद्धेश्वरी देवी' के नाम से एक पुस्तक भी लिखी।
उन्होंने सिद्धेश्वरी देवी एकैडमी ऑफ इंडियन म्यूजिक की स्थापना की। गुरु -शिष्य परंपरा का बहुत ही सुंदर मिसाल है ये एकैडमी। उन्होंने हर शिष्या को बहुत स्नेह दिया- एक समदर्शी व्यक्तित्व। वे एक आत्मीय और स्नेहमयी महिला थीं। आज उनकी अनेक शिष्याएं अच्छी ठुमरी गा रही हैं। 20 दिसंबर 2019 की सुबह गुड़गांव के फोर्टिस हॉस्पिटल में उन्होंने आखिरी सांस ली।
हम सभी विदुषी सविता जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, उन्हें शत् शत् नमन।
मां सिद्धेश्वरी ने सिद्ध किया
अद्भुत स्वर की थी दुहिता
वर पाया वीणापाणि से
थीं दिव्य रूप देवी सविता।
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