अलविदा रशीद भाई !
सैंकड़ों किताबें और पत्रिकाएं तुमसे उधार मांगकर पढ़ीं। कविता पुस्तकों की तलाश में तुम्हारे साथ इस शहर में जैको, दानाई ,क्रॉसवर्ड, लोटस, स्ट्रेंड, न्यू एंड सेकंड हैंड बुक स्टॉल, स्मोकर्स कॉर्नर, किताबखाना, वेवर्ड और फुटपाथ पर पुरानी दुर्लभ किताबें सजाए बैठे उन बहुत से पुस्तक- विक्रेताओं के पास जाने के कुछ दुर्लभ अनुभव स्मृति में बसे हुए हैं।
और कैसा विरोधाभासों से भरा जीवन था तुम्हारा। एक तरफ तुम विदेशी फिल्मों का चलता-फिरता इन्साइक्लोपीडिया थे। फिल्म समीक्षा के क्षेत्र में एक जाना-माना नाम थे और दूसरी अरफ आजीविका के लिए धोबीतलाब पर एक लम्बे समय तक अपना ईरानी रेस्त्रां ‘ ब्रेबॉर्न कैफे’ चलाते रहे। वह रेस्त्रां जिसमें कभी प्रसिद्ध कवि निसीम इज़ाकेल और इयुनिस डिसूज़ा भी आकर बैठकी जमाते थे और पत्रकार अनिल धारकर भी। और उस तरह के बीसियों लोग।
फिल्मकार सागर सरहदी और कविता-प्रेमी अपने उस बुजुर्ग दोस्त गिरीश दमानिया के साथ तुम्हारे उस ईरानी रेस्त्रां में घंटों हुई आत्मीय गपशप हमेशा याद आती रहेगी। दमानिया जी और रशीद भाई आप दोनों मुझे विश्व कविता की दुनिया में भटकते हुए कोलम्बस की तरह से लगते थे। लेकिन अब तो सिर्फ यादें बची हैं। तुम छोड़ गए हो अपने पीछे बहुत सारी किताबें, बहुत सारी बहसें, बहुत सारी जानकारियां, बहुत सारी गपशप और बहुत सारी सम्बन्धों की उष्मा।
तुम्हारे इस तरह से जाने पर मुझे प्रख्यात पोलिश कवि चेश्वाव मिवोश की वे पंक्तियां याद आ रही हैं-
I was to be redeemed by the gift of arranging words
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But must be prepared for an earth without grammar
मैं बहुत सारी कविता पुस्तकें खोलूंगा और तुम अक्सर याद आते रहोगे रशीद भाई ।