केन्द्र सरकार बिजली सेक्टर को संकट से उबारने के लिए सन् 2000 से अब तक 3 बेलआउट पैकेज जारी कर चुकी है।
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बिजली से वोट उत्पादन का केजरीवाल नुस्खा
फरवरी 2020 में होने वाले दिल्ली विधानसभा के चुनाव से पहले अरविन्द केजरीवाल ने 1 अगस्त 2019 से 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली की घोषणा की तो उसका भरपूर लाभ उन्हें दूसरी बार जबरदस्त जीत के रूप में मिला। हालांकि इस दरियादिली के लिए उन्हें 2021-22 के बजट में 2,820 करोड़ सब्सिडी का प्रावधान करना पड़ा और राज्य का राजकोषीय घाटा 10,665 करोड़ तक पहुंच गया।
केजरीवाल के बाद महाराष्ट्र सरकार ने भी बीते वर्ष राज्यवासियों को दीवाली गिफ्ट के तौर पर 100 यूनिट तक प्रति माह मुफ्त बिजली देने की घोषणा तो की, मगर सच्चाई के आगे सरकार का वायदा बौना हो गया।
देश में सबसे खराब हालत महाराष्ट्र स्टेट इलैक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी की है, जिस पर पिछले वर्ष तक ही 38 हजार करोड़ का कर्ज चढ़ चुका था। बिजली से वोट उत्पादन का केजरीवाल फार्मूला अपनाते हुए ममता बनर्जी ने भी 2021 के विधानसभा चुनावों से पहले उपभोक्ताओं के तिमाही बिल में 75 यूनिट मुफ्त कर दीं जिसका लाभ उन्हें सत्ता में जबरदस्त वापसी के रूप में मिल गया। अब तो यह चुनावी फॉर्मूला आम होने जा रहा है।
बहुत महंगी पड़ती है मुफ्त की बिजली
बिजली का अर्थशास्त्र जानने वालों को पता है कि वोट कमाऊ सस्ती लोकप्रियता के लिए मुफ्त बिजली आम उपभोक्ता के लिए अन्ततः बहुत महंगी ही साबित होती है। अगर कोई सरकार किसी एक वर्ग को मुफ्त बिजली देती है तो बिजली महंगी होने पर उसकी भरपाई समाज के दूसरे वर्ग को करनी पड़ती है।
राज्य सरकार भले ही मुफ्त बिजली की भरपाई अपने बजट से करे तो भी वह वसूली जनता से ही होती है। बिजली वितरण कंपनियां (डिस्काॅम) वैसे ही आर्थिक संकट से गुजर रही हैं।
रिसर्च रेटिंग कंपनी ‘क्राइसिल‘ के अनुसार वित्तीय वर्ष 2020-21 तक देश की बिजली कंपनियों पर कर्ज का बोझ 4.5 लाख करोड़ तक पहुंच गया था।
अगर इसी तरह बिजली देकर वोट खरीदने की प्रवृत्ति जारी रही तो देश के ऊर्जा और खास कर बिजली सेक्टर का ब्रेक डाउन तय है। लेकिन राजनीतिक दलों को तो सत्ता हथियाने के लिए येनकेन प्रकारेण केवल वोट हथियाने होते हैं।
बिजली कंपनियां को संकट से उबारने के लिये पैकेज
केन्द्र सरकार बिजली सेक्टर को संकट से उबारने के लिए सन् 2000 से अब तक 3 बेलआउट पैकेज जारी कर चुकी है। सन् 2000 में पहला पैकेज 40 हजार करोड़ का था। दूसरा रिवाइवल पैकेज 2012 में 1.9 लाख करोड़ का था और तीसरा पैकेज मोदी सरकार ने ‘‘उज्ज्वल डिस्काॅम एस्यौरेंस योजना (उदय) के नाम से 2015 में जारी किया। लेकिन इन पैकेजों के बावजूद बिजली वितरण कंपनियों की हालत में अपेक्षानुरूप सुधार परिलक्षित नहीं हो रहा है।
उदय योजना में कंपनियों के कर्ज को राज्य सरकार के बाॅंड में बदलना, लाइन लाॅस 15 प्रतिशत तक लाना, सप्लाइ की औसत लागत और राजस्व वसूली के बीच का अंतर शून्य करना आदि प्रावधान हैं।
दोहरी तलवार है मुफ्त बिजली की राजनीति
बिजली की राजनीति दोहरी तलवार की भांति है। अगर किसी सरकार ने मुफ्त बिजली की शुरुआत कर दी तो फिर उसे रोकने का जोखिम कोई राजनेता नहीं उठा पाएगा। वैसे भी राजनीतिक दलों की पहली और सर्वोच्च प्राथमिकता वोट कमाकर सत्ता पर काबिज होने और फिर सत्ता पर बने रहने की होती है।
पंजाब में एक बार अकाली दल सरकार ने उर्जा संकट के दौर में यह जोखिम उठाया तो उसे सत्ता गंवानी पड़ी। सन् 2000 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में ओम प्रकाश चैटाला ने किसानों के बकाया बिजली बिल माफ करने का वायदा कर चुनाव जीता था, लेकिन जब हकीकत से वह रूबरू हुए तो वायदे से मुकर गए।
इसका नतीजा उग्र किसान आन्दोलन के रूप में सामने आया। आन्दोलन के दौरान पुलिस फायरिंग में कुछ किसान मारे गए तो कुछ घायल हुए जिसकी परिणति 2005 के चुनाव में चैटाला की हार के रूप में हुई।
फ्री बिजली की घोषणाएं घाटे का इंतजाम होती हैं।
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उत्तराखण्ड के लिए आत्मघाती होगा बिजली का चुनावी नुस्खा
उत्तराखण्ड के बिजली मंत्री हरक सिंह रावत के अनुसार पद्रेश में लगभग 7 लाख उपभोक्ता बिजली की 100 यूनिट तक उपभोग करते हैं जिनको अब मुफ्त बिजली मिलेगी और लगभग 200यूनिट तक खर्च करने वाले लगभग 14 लाख उपभोक्ताओं के बिजली बिलों की आधी रकम माफ कर दी जाएगी। इस प्रकार घरेलू उपभोक्ताओं को 4 रुपये प्रति यूनिट की दर से मिलने वाली बिजली के बिलों में आधी रकम माफ कर दी जाएगी।
चूंकि बिजली कंपनी उत्तराखण्ड पावर कॉरपोरेशन हजारों करोड़ के घाटे में डूबा हुआ है और वैसे भी देश कोई भी बिजली कंपनी (डिस्काॅम) किसी को मुफ्त बिजली नहीं देती,इसलिए राज्य सरकार को ही केवल 100 यूनिट तक खर्च करने वालों पर प्रति माह लगभग 28 करोड़ रुपये और सालाना 336 करोड़ और अगर 14 लाख उपभोक्ताओं के बिजली के आधे बिल माफ होते हैं तो उनके 336 करोड़ की माफ हुई रकम को जोड़कर सालाना 672 करोड़ की रकम वहन करनी पड़ेगी जो कि कर्ज में डूबते जा रहे उत्तराखण्ड के लिए आत्मघाती साबित होगा।
राज्य के चालू वर्ष के 57,024 करोड़ के बजट की भरपाई के लिये 12,850 करोड़ कर्ज लेने का प्रावधान रखा है। राज्य को अपने करों से मात्र 12,5744 करोड़ तथा केन्द्र से 7440.98 करोड़ मिलने का अनुमान है।
राज्य की माली हालत इतनी पतली है कि उसे कर्मचारियों के वेतन भत्तों के लिये भी कर्ज लेना पड़ता है। कर्ज इतना चढ़ चुका कि जिसका ब्याज ही 6,052 करोड़ हो गया। इधर राज्य के पावर कॉरपोरेशन को प्रतिवर्ष लगभग 1500 करोड़ की महंगी बिजली खरीदनी पड़ रही है। कॉरपोरशन का घाटा ही 5 हजार करोड़ पार कर गया है।
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