गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
- फोटो : अमर उजाला
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मोदी का भाषण और केन्द्र सरकार की राशन भी उत्तराखण्ड में भाजपा के काम आ गई। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल, ऑल वेदर चारधाम रोड सहित कई केन्द्रीय योजनाओं का भाजपा को सीधा लाभ मिलता नजर आ रहा है। इस चुनाव में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का भी काफी असर रहा है।
चुनाव के दौरान मंहगाई, बेरोजगारी, गैरसैण राजधानी, भूमि कानून, पलायन और लोकायुक्त जैसे मुद्दे गौण हो गए थे जबकि मुस्लिम यूनिवर्सिटी, लव जेहाद, जमीन जेहाद और समान नागरिक संहिता जैसे काल्पनिक मुद्दे प्रचार अभियान में छा गए थे। चुनाव में कांग्रेस को आम आदमी पार्टी ने भी काफी नुकसान पहुंचाया है। जबकि आप पार्टी की परफार्मेंस खुद बहुत निराशाजनक नजर आ रही है।
राज्य गठन से लेकर 2017 के चुनाव तक उत्तराखण्ड में कांग्रेस और भाजपा बारी-बारी से सरकार बनाती रही है। वर्ष 2002 में हुए पहले चुनाव में कांग्रेस ने 36 सीटें हासिल कर राज्य में सरकार बनाई थी। जबकि भाजपा 19 सीटों पर अटक गई थी। उससे पहले भाजपा की ही अंतरिम सरकार थी। 2007 के चुनाव में भाजपा को बहुमत से दो कम 34 सीटें और कांग्रेस को 21 सीटें मिलीं थीं।
सिंगल लार्जेस्ट पार्टी होने के नाते भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिला और भुवनचन्द्र खण्डूड़ी मुख्यमंत्री बने थे, जिन्होंने अपने कार्यकाल में ही बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया था। उसके बाद 2012 के चुनाव में कांग्रेस को 32 और भाजपा को 31 सीटें मिलीं थी। सिंगल लार्जेस्ट पार्टी होने के नाते कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर मिला तो विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया गया, जिन्होंने अपने कार्यकाल में ही बहुमत जुटा लिया था।
हालांकि 2014 में उन्हें पद छोड़ना पड़ा और हरीश रावत मुख्यमंत्री बन गए। 2017 के चुनाव चुनाव में भाजपा ने 57 सीटें हासिल कर अभूतपूर्व सफलता हासिल की और कांग्रेस 11 सीटों पर सिमट गई।