उत्तराखंड चुनाव 2022: क्या भाजपा सत्ता में लौटकर नया इतिहास रचेगी?
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किसानों के अलावा दूसरा सबसे अहम मुद्दा पलायन का है। उत्तराखंड के पहाड़ी हिस्सों से रोजगार के लिए लोगों का बड़े पैमाने पर पलायन बड़ी समस्या है। इसलिए पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्रसिंह रावत ने ‘उत्तराखंड राज्य पलायन आयोग’ का गठन किया था। लोगो के पलायन का मुख्य कारण पहाड़ी जिलों में विकास की बेहद धीमी गति और स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। रोजगार मुख्य रूप से मैदानी इलाकों में है। पहाड़ी इलाकों में पर्यटन एक बड़ा जरिया है, लेकिन उसकी भी सीमा है।
पढ़ लिखकर लोग आजीविका के लिए मैदानी या देश के दूसरे हिस्सों में चले जाते हैं तो फिर अपने गांव नहीं लौटते। इस संदर्भ में उत्तराखंड पलायन आयोग की रिपोर्ट ही काफी कुछ कहती है। इसके मुताबिक पिछल पांच सालों में पहाड़ी इलाकों की 60 फीसदी आबादी पलायन कर चुकी है। यानी करीब 32 लाख लोग अपने घर छोड़ चुके हैं। 2018 में 1700 गांव भूतहा बन चुके थे और एक हजार गांवों में सौ से भी कम लोग बचे थे। सर्वाधिक पलायन पौड़ी और गढ़वाल जिलों से हुआ है।
हालांकि उत्तराखंड सरकार का दावा है कि 20 फीसदी लोगो को वापस भी लाया गया है। बावजूद इसके निरंतर पलायन राज्य की अभी भी बड़ी समस्या है और इसका दीर्घकालिक निदान ही संभव है। आबादी घटने से राजनीतिक समीकरण भी बदल रहे हैं। कई पहाड़ी क्षेत्रों के नुमाइंदे अब मैदानी इलाकों से चुनाव लड़ने की जुगत में हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में आबादी घटने का एक कारण कठिन प्राकृतिक स्थितियां और आपदाएं भी हैं। इनके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़कों और आवागमन सुविधाओं की कमी भी बड़ा कारण है।
ऐसे में राजनीतिक पार्टियां चेहरा बदलने को फिर सत्ता हासिल करने एकमात्र उपाय समझने लगती हैं। तकरीबन हर मुख्यमंत्री कुछ समय बाद ही विवादों में घिर जाता है। चुनाव के मद्देनजर दलबदल आम बात है। इस बार भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है। विजय बहुगुणा, हरक सिंह रावत और सतपाल महाराज जैसे पुराने दिग्गज कांग्रेसी नेता कुछ पाने की उम्मीद में भाजपा में चले। गए थे, अब घर वापसी की तैयारी में हैं।
राज्य के पूर्व परिवहन मंत्री यशपाल आर्य और नैनीताल से बीजेपी विधायक संजीव कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। एक और मंत्री हरक सिंह रावत ने भी पद से इस्तीफा दे दिया है, उनके कांग्रेस में जाने की चर्चा है। ये विधायक मान रहे हैं कि अगली सरकार कांग्रेस की बन सकती है। शायद ही कारण है कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत ने अभी से अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। हाल में उन्होंने बयान दिया कि संगठन में आला कमान के नजदीकी लोग उन्हें ठीक से काम नहीं करने दे रहे हैं।
इस बयान के दो अर्थ निकाले गए। एक तो रावत पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की तर्ज पर उत्तराखंड में क्षेत्रीय दल बनाने के मूड में हैं या फिर राज्य में कांग्रेस के सत्ता में लौटने की संभावना के चलते सीएम पद के लिए अभी से अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं। इस बार चुनाव में आम आदमी पार्टी भी ताल ठोक रही है।
पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल हरिद्वार में रोड शो कर चुके हैं। खास बात है कि उत्तराखंड में आप को हिंदुत्व को मुद्दा बनाने से कोई गुरेज नहीं है। आप ने ही सबसे पहले उत्तराखंड को ‘देश की आध्यात्मिक राजधानी’ बनाने का ऐलान किया था। पार्टी के सभी नेता साधु संतों का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते। आप की यह रणनीति भाजपा के लिए खतरे की घंटी है।
बहरहाल सवाल यही है कि क्या भाजपा लगातार दूसरी बार विधानसभा चुनाव जीत कर राज्य में नया इतिहास रच पाएगी या नहीं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देवस्थानम् बोर्ड भंग कर नाराजी का एक बड़ा मुद्दा खत्म कर दिया है, लेकिन जीत की राह अभी भी आसान नहीं है।
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