यह हादसा बताता है कि पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करने का नतीजा कितना भयावक हो सकता है
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- विशाखापत्तनम गैस त्रासदी है इसका नवीन उदाहरण
इस मसौदे का एक दुष्परिणाम मई 2020 में सामने आया था जब विशाखापत्तनम के एलजी पॉलिमर संयंत्र में गैस रिसाव हुआ था। इसमें एक दर्जन लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग प्रभावित हुए थे। जांच में सामने आया था कि यह संयंत्र कई सालों से बिना पर्यावरणीय मंजूरी के चल रहा था। इसके लिए पूर्व में अनुमति नहीं ली गई थी।
- नए मसौदे इसलिए होंगे घातक
पहले सिर्फ राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा से जुड़ीं परियोजनाओं को ही रणनीतिक माना जाता था लेकिन सरकार ने प्रस्तावित मसौदे के ज़रिये अन्य परियोजनाओं के लिये भी ‘रणनीतिक’ शब्द का प्रयोग किया है। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन मसौदा, 2020 के तहत अब ऐसी परियोजनाओं के बारे में कोई भी जानकारी भी सार्वजनिक नहीं की जाएगी, जो इस श्रेणी में आती हैं। इससे उद्योग जगत और राजनीतिक गठजोड़ को बढ़ावा मिलेगा।
नए मसौदे के तहत अब उन कंपनियों या उद्योगों को भी क्लीयरेंस प्राप्त करने का मौका दिया जाएगा जो पहले पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करते आ रहे हैं। इसे ‘पोस्ट-फैक्टो प्रोजेक्ट क्लीयरेंस’ कहते हैं। इसका फायदा उठाकर कंपनियां बिना पर्यावरण प्रभाव का आकलन किए निर्माण कार्य जारी रखेगी जिसका प्रतिकूल प्रभाव पर्यावर और समाज पर पड़ेगा। इस मसौदे में यह कहा गया है कि सरकार इस तरह के उल्लंघनों का संज्ञान लेगी।
हालांकि ऐसे पर्यावरणीय उल्लंघन या तो सरकार या फिर खुद कंपनी द्वारा ही रिपोर्ट किए जा सकते हैं। नये मसौदे के तहत पर्यावरण अधिनियम का उल्लंघन करने वाली परियोजनाएँ भी अब मंज़ूरी के लिए आवेदन कर सकेंगी। इससे पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाली परियोजनाएं भी शुरू हो सकेंगी। जिसका दुष्परिणाम भविष्य में इसी तरह के मानवीय आपदाओं के रूप में देखने को मिलेगा।
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