उत्तराखंड के चार धाम: प्रकृति से छेड़छाड़ बेहद नुकसानदायक होगी।
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- चारधाम मार्ग के बाद अब बदरीनाथ का मास्टर प्लान निशाने पर
चारधाम मार्ग के मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब बदरीनाथ धाम के नवीनीकरण का मामला भी चर्चाओं में आ गया है। इस मामले में भी विशेषज्ञों की राय लिए बिना धाम का मास्टर प्लान बना लिया गया है। जबकि 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद इन हिमालयी तीर्थों में प्रकृति से अनावश्यक छेड़छाड़ न किए जाने की अपेक्षा की जा रही थी।
इससे पहले 1974 में बिड़ला ग्रुप के जयश्री ट्रस्ट द्वारा बदरीनाथ के जीर्णोद्धार का प्रयास किया गया था। उस समय उत्तर प्रदेश की हेमतवती नन्दन बहुगुणा सरकार ने नारायण दत्त तिवारी कमेटी की सिफारिश पर बदरीनाथ के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ करने पर रोक लगा दी थी और जयश्री ट्रस्ट को भारी भरकम निर्माण सामग्री समेत वापस लौटना पड़ा था।
बदरीनाथ के हकहुकूक धारियों में से एक डिमरी पंचायत के अध्यक्ष आशुतोष डिमरी के अनुसार बदरीनाथ की तुलना तिरुपति से नहीं की जा सकती और ना ही इस हिमालयी तीर्थ का विकास तिरुपति की तर्ज पर किया जा सकता है।
डिमरी कहते हैं कि मास्टर प्लान से पहले बदरीनाथ के इतिहास और भूगोल को जानने की जरूरत है। सरकार को धर्मक्षेत्र के विशेषज्ञों से भी परामर्श करना चाहिए। बदरीनाथ एवलांच, भूस्खलन और भूकंप के खतरों की जद में है और वहां लगभग हर 4 या 5 साल बाद हिमखंड गिरने से भारी नुकसान होता रहता है।
बदरीनाथ मंदिर को हिमखंड स्खलन (एवलांच) से बचाने के लिए सिंचाई विभाग ने नब्बे के दशक में एवलांचरोधी सुरक्षा उपाय तो कर दिए मगर वे उपाय कितने कारगर हैं, उसकी अभी परीक्षा नहीं हुई है।
- गोगोत्री मंदिर भी असुरक्षित
भागीरथी के उद्गम क्षेत्र में स्थित गंगोत्री मंदिर भी निरंतर खतरे झेलता जा रहा है। इस मंदिर पर भैंरोझाप नाला खतरा बना हुआ है। समुद्रतल से 3200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गंगोत्री मंदिर का निर्माण उत्तराखंड पर कब्जा करने वाले नेपाली जनरल अमर सिंह थापा ने 19वीं सदी में किया था।
हिंदुओं की मान्यता है कि भगीरथ ने अपने पुरखों के उद्धार हेतु गंगा के पृथ्वी पर उतरने के लिए इसी स्थान पर तपस्या की थी। इसरो द्वारा देश के चोटी के वैज्ञानिक संस्थानों की मदद से तैयार किए गये लैंड स्लाइड जोनेशन मैप के अनुसार गंगोत्री क्षेत्र में 97 वर्ग कि.मी. इलाका भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील है, जिसमें से 14 वर्ग कि.मी. का इलाका अति संवेदनशील है।
गोमुख का भी 68 वर्ग कि.मी. क्षेत्र संवेदनशील बताया गया है। भू-गर्भ सर्वेक्षण विभाग के वैज्ञानिक पी.वी.एस. रावत ने अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट में गंगोत्री मंदिर के पूर्व की ओर स्थित भैंरोझाप नाले को मंदिर के अस्तित्व के लिए खतरा बताया है और चेताया है कि अगर इस नाले का शीघ्र इलाज नहीं किया गया तो ऊपर से गिरने वाले बडे़ बोल्डर कभी भी गंगोत्री मंदिर को धराशयी करने के साथ ही भारी जनहानि कर सकते हैं।
मार्च 2002 के तीसरे सप्ताह में नाले के रास्ते हिमखंडों एवं बोल्डरों के गिरने से मंदिर परिसर का पूर्वी हिस्सा क्षतिग्रसत हो गया था। यह नाला नीचे की ओर संकरा होने के साथ ही इसका ढलान अत्यधिक है। इसलिए ऊपर से गिरा बोल्डर मंदिर परिसर में तबाही मचा सकता है।
- यमुनोत्री भी खतरे की जद में
यमुना के उद्गम स्थल यमुनोत्री मंदिर के सिरहाने खड़े कालिंदी पर्वत से वर्ष 2004 में हुए भूस्खलन से मंदिर परिसर के कई निर्माण क्षतिग्रस्त हुए तथा छह लोगों की मौत हुई थी। वर्ष 2007 में यमुनोत्री से आगे सप्तऋषि कुंड की ओर यमुना पर झील बनने से तबाही का खतरा मंडराया जो किसी तरह टल गया।
वर्ष 2010 से तो हर साल यमुना में उफान आने से मंदिर के निचले हिस्से में कटाव शुरू हो गया है। इस हादसे के मात्र एक महीने के अंदर ही कालिंदी फिर दरक गया और उसके मलवे ने यमुना का प्रवाह ही रोक दिया। कालिंदी पर्वत यमुनोत्री मंदिर के लिए स्थाई खतरा बन गया है। सन् 2001 में यमुना नदी में बाढ़ आने से मंदिर का कुछ भाग बह गया था।
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