बड़ा सवाल यह है कि इस तरह हादसों के शिकार पीडि़तों के प्रति लोग इतनी बेरूखी क्यों दिखाते हैं? क्या इसलिए कि पीडि़तों में कोई उनका परिचित या सगा सम्बन्धी नहीं है।
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संवेदनहीन समाज और नजरिया
यह वाकई गहरे अफसोस और समाज के आत्मचिंतन की बात है कि हम सभ्य, सम्पन्न और ज्ञानी होने के बाद भी मनुष्यता का बुनियादी ककहरा भी भूलते जा रहे हैं। समाज की यह संवेदनहीनता पुलिस की संवेदनहीनता से भी ज्यादा खतरनाक है।
आज कानून व्यवस्था कायम रखने का जिम्मा हमने पूरी तरह पुलिस और न्याय व्यवस्था के भरोसे छो़ड़ दिया है। हर कोई शायद यह सोच रहा है कि जो दुर्घटना, बलात्कार, दरिंदगी और अत्याचार किसी दूसरे के साथ हुआ है, वह अपने साथ नहीं होगा। इसलिए मुझे क्या करना है? जब अपने पर बीतेगी तब देखा जाएगा। अभी तो अपनी जिंदगी सुकून से जी लें। जो हुआ, जिसके साथ हुआ और जैसा भी हुआ, वो दूसरे दिन अखबार में पढ़ लेंगे या सोशल मीडिया का कोई न कोई हरकारा क्लिक बढ़वाने के लिए अपने व्हाट्स एप ग्रुप पर उसका वीडियो डाल ही देगा। घर में बैठकर या बिस्तर पर लेटकर किसी की यातना का वीडियो देखने और उसे दूसरों को फारवर्ड करने से मिलने वाला आसुरी आनंद अलग ही है।
आज हममे से अधिकांश इसी आसुरी आनंद के मनोरोगी हो चुके हैं। इन वीडियो दर्शको से कोई नहीं पूछेगा कि वीडियो बनाकर पहले पोस्ट करने का गोल्ड मेडल जीतने के बजाए पीडि़त की समय रहते मदद का विवेक उस व्यक्ति में क्यों नहीं जागता? अगर जागता भी है तो वह कार्यरूप में परिणत क्यों नहीं होता?
बड़ा सवाल यह है कि इस तरह हादसों के शिकार पीडि़तों के प्रति लोग इतनी बेरूखी क्यों दिखाते हैं? क्या इसलिए कि पीडि़तों में कोई उनका परिचित या सगा सम्बन्धी नहीं है। या फिर उसकी संवेदनाएं केवल कुछ खास लोगों के लिए हैं। एक इंसान के तौर पर उसकी संवेदनाएं उदासीनता के लॉकर में बंद रहती हैं।
इस बारे में मनोवैज्ञानिको का कहना है कि समाज का यह आचरण ‘तमाशाई प्रभाव’ (बायस्टैंडर इफेक्ट) है। इस सिद्धांत की स्थापना सामाजिक मनोवैज्ञानिक बिब लातेन और जॉन डार्ले 1964 में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में किटी जेनोविस की कुख्यात हत्या के बाद की। जेनोविस की उसके अपार्टमेंट के बाहर चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी। वह अपने घर के बाहर लेटी हुई थी जब हत्यारा उसे फिर से चाकू मारने के लिए लौटा। जिन पड़ोसियों ने अपराध देखा, वे उसकी सहायता के लिए नहीं आए।
हत्या ने लाटेन और डार्ले को प्रयोगों की एक श्रृंखला शुरू करने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने मापा कि प्रतिभागियों को-जो अकेले थे या दूसरों की उपस्थिति के बारे में पता था - एक आपात स्थिति में हस्तक्षेप करने में कितना समय लगा। अपने अध्ययन से उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि भीड़ में होने पर व्यक्ति की 'जिम्मेदारी का फैलाव' होता है।
ऐसी स्थिति में मदद करना कोई अपनी जिम्मेदारी नहीं समझता, इसलिए मदद के लिए कोई आगे नहीं आता। इसके विपरीत जब आप अकेले होते हैं तो मदद करने की जिम्मेदारी केवल आप की होती है। इसलिए यह स्थिति व्यक्ति को पीड़ितों की मदद करने के लिए प्रेरित करती है। वरना हर कोई सोचता है, मेरा क्या लेना देना है?
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इस बेरूखी का दूसरा कारण हमारे समाज में प्रगति के बरक्स सहानुभूति का घटते जाना है। आज हर कोई एक अंधी दौड़ में है, और उसके लिए, किसी की मदद की ज़रूरत से ज़्यादा उसका अपना एजेंडा महत्वपूर्ण है। यह आत्म-लीन स्वार्थ हर जगह प्रदर्शित होता है। जब लोगो में जुड़ाव की कमी होती है, तो सामाजिक लगाव और जिम्मेदारी कम हो जाती है। आप तमाशाई बनकर घटना घटते देखते तो हैं, लेकिन हादसे में किसी की मदद करना जरूरी नहीं समझते। इस मानसिकता के पीछे एक और बड़ा कारण पुलिस उत्पीड़न का डर है।
अमूमन हादसे के दर्शक के रूप में मौजूद व्यक्ति के मन में सवाल कौंधता है कि पीडि़त की मदद करके मैं किसी मुसीबत में तो नहीं पड़ जाऊंगा? हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केन्द्र ने ऐसे मामलो में अच्छे लोगों को परेशान होने से बचाने के लिए नियम बनाए हैं। लेकिन ज्यादातर को उसका पता नहीं है और यदि है भी तो वो किसी भी पचड़े में फंसने से बचना चाहते हैं, जबकि पीडि़त की मदद करना मानव और राष्ट्र सेवा दोनो है। लेकिन इस सकारात्मक सोच का हमारे यहां अभाव और अज्ञान दोनो है।
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