दुनिया की 25 सबसे ऊंची पहाड़ की चोटियों में से आठ इसी इलाके में है।
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POK को लेकर हिंदुस्तान
चौदह जिलों में बंटा गिलगिट बल्टिस्तान स्ट्रेटेजिक और सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। मीरपुर, मुज्जफराबाद की सीमा केवल पाकिस्तान से मिलती है लेकिन गिलगिट बल्टिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन और भारत चारो दिशाओं में दौड़ते हैं।
दुनिया की 25 सबसे ऊंची पहाड़ की चोटियों में से आठ इसी इलाके में है जिसमे माउंट एवरेस्ट के बाद दूसरी सबसे ऊंची पहाड़ की चोटी के-2 भी शामिल है। पोलर क्षेत्र का सबसे बड़ा ग्लेशियर और दूसरा सबसे बड़ा देवसाई प्लैटू भी इसी इलाके में है। खदानों के हिसाब से ये इलाका बहुत धनी है। यहां प्रचुर मात्रा में सोना, माइका, तांबा और कीमती पत्थर पाए जाते हैं। पर्यटन के हिसाब से यह दुनिया के सबसे खूबसूरत इलाकों में से एक है।
इन दोनों इलाकों के राजनीतिक अस्तित्व पर ध्यान दें तो मीरपुर मुजफ्फराबाद वाले क्षेत्र को विशेष दर्जा प्राप्त है और इसे आजाद कश्मीर भी कहा जाता है और आधिकारिक तौर से पाकिस्तान से आये लोगों के बसने पर पाबंदी है लेकिन गिलगिट बल्टिस्तान से जुल्फिकार अली भुट्टो के काल में ये सुविधा छीन ली गई थी।
इस इलाके ने हर सम्भव कोशिश की गई कि उनकी पहचान बदल कर पाकिस्तान के करीब लाया जाए। इस इलाके में बाहर से लोग बसाए गए। यही कारण है कि 1998 से 2011 के बीच गिलगिट बल्टिस्तान की जनसंख्या 63 प्रतिशत बढ़ी वहीं मीरपुर मुजफ्फराबाद इलाके की जनसंख्या केवल 23 प्रतिशत बढ़ी।
मीरपुर, मुजफ्फराबाद और गिलगिट बल्टिस्तान की ज्यादातर जनसंख्या मुस्लिम है, लेकिन गिलगिट के मुसलमानों का रहन सहन पाकिस्तानी मुसलमानों से अलग है। इस क्षेत्र के मुसलमान मुख्य रूप से शिया, नूरबक्शी, इस्माइली और तालिबानी हैं।
नूरबक्शी तो दुनिया भर में सिर्फ इसी इलाके में पाए जाते हैं। धर्म के हिसाब यहां के लोग मुसलमान हैं लेकिन पाकअधिकृत कश्मीर की भाषा पाकिस्तानियों की भाषा से नही मिलती है। इस इलाके में पहाड़ी, पोटवारी, कश्मीरी, हिन्दको, स्निहा, पासतो और सबसे ज्यादा गुर्जरी बोली जाती है।
पाक अधिकृत गिलगिट बल्टिस्तान में आज भले शतप्रतिशत जनता मुस्लिम रही हो लेकिन इतिहास कुछ और ही बयान करता है।
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POK की संस्कृति और दुनिया
पाक अधिकृत गिलगिट बल्टिस्तान में आज भले शतप्रतिशत जनता मुस्लिम रही हो लेकिन इतिहास कुछ और ही बयान करता है। प्राचीन काल मे यहां मौर्य वंश का शासन था और अशोक ने यहां बौद्ध धर्म का प्रचार भी किया था। पहली और दूसरी शताब्दी में यहां कुषाण वंश का शासन था।
मध्यकाल में शाहजहां ने 1637 में इस इलाके पर अपना कब्जा जमाया और 1753 तक के मुगलों के अधीन रहा। इसके बाद इस इलाके पर अफगानों का कब्जा हो गया जो 1819 तक चला। इसी साल सिखों ने गुलाब सिंह के नेतृत्व में यहां कब्जा जमाया। अंग्रेजों ने भी इस इलाके में अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा दिखाई।
जब रूस के इस इलाके के तरफ प्रसार की सूचना मिलने लगी तो अंग्रेजों ने पहले यहां 1877 में गिलगिट एजेंसी बनाई थी। बाद में उन्होंने 1935 में महाराजा से इस इलाके को 60 साल के लीज पर ले लिया था। 1947 में देश आजाद होने के बाद अंग्रेजो ने यह इलाका महाराजा को लौटा दिया।
दो प्रमुख यात्री लेखकों प्राचीन काल मे ह्वेनसांग और मध्यकाल में इब्नबतूता इस इलाके के दौरे पर गए और अपने वृतांत में इसका उल्लेख किया। जाहिर सी बात है कि इस इलाके में तब हिन्दू जनसंख्या भी होती थी। यहां बने प्रसिद्ध मंदिर इसकी गवाही देते हैं इसका सबसे बड़ा उदाहरण शारदा पीठ है जिसके बारे में कहा जाता है कि शंकराचार्य भी इस स्थल पर गए थे और उन्हें ये महाउपाधि इसी पीठ से मिली।
इस इलाके की राजनीतिक परिस्थितियों की बात करें तो मीरपुर मुजफ्फराबाद इलाके को विशेष दर्जा प्राप्त है। यहां एक कठपुतली राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री होता है।
यहां की असेम्बली में 45 सदस्य चुने जाते हैं जिनमें 12 सदस्य भारतीय जम्मू और कश्मीर से आये रिफ्यूजी होते हैं। आठ सदस्य मनोनीत होते हैं जिनमें 5 महिलाओं के लिए आरक्षित होते हैं।
गिलगिट बल्टिस्तान को पाकिस्तान ने अपना हिस्सा घोषित कर रखा है। इस क्षेत्र को कोई विशेष दर्जा प्राप्त नही है। यहां तक कि बड़े ब्यूरोक्रेट्स पाकिस्तान से भेज कर थोपे जाते हैं। आज के हालात में मीरपुर, मुजफ्फराबाद को पाकिस्तान भले शांत कर लेता है लेकिन गिलगिट बल्टिस्तान में पाकिस्तानी हुकूमत के खिलाफ गहरा रोष देखा जाता है। अक्सर उनके आंदोलनों को सख्ती से दबाया जाता है।
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