माटी है, माटी रहेगी। और वह है तो माटी के पात्र भी एकदम से तो चले नहीं जाएंगे।
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यह उस समय की बात है, जब बिजली के रंगीन लट्टू नहीं थे, जिन्होंने माटी की दीपमालाओं को अब दूर तक अपदस्त कर दिया है। समय के साथ चीज़ें बदलती हैं यह सही है। फ्रिज के आने से पहले भला किस घर में नहीं होती थीं सुराहियां, नहीं होते थे घड़े। जो भी हो, लगता यही है कि माटी के पात्रों को न तो हम विस्मृत कर पाएंगे, न ही करना चाहिए।
कहां विस्मृत हुए हैं, लक्ष्मी-गणेश-माटी के। बहुतेरे घरों की शोभा हैं वे अभी। अन्य देवी-देवता भी। सरस्वती-विशेष रूप से। दिख जाती है उनकी भी माटी पूर्ति। और नागर-जीवन चाहे जैसा भी हो या रहा हो, पर, लोक का जीवन—ग्राम्य का जीवन, वहां तो ‘माटी’का ही प्राधान्य रहा है। हर मामले में। उसका वह उर्वरा रूप तो बदलने वाला नहीं है-भले ही कितनी ही मशीनी चीज़ें आ जाएं, एक से एक, नई प्रौद्योगिकी की। माटी है, माटी रहेगी। और वह है तो माटी के पात्र भी एकदम से तो चले नहीं जाएंगे। वे नये-नये रूप भी धर रहे हैं।
हमारे कुंभकार-उनकी तो एक बहुत बड़ी दुनिया रही है। वह शायद कम हुई है।
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पहले नहीं थी इतनी बड़ी जमात हमारे यहां सिरेमिक कलाकारों की; जो अब गढ़ती हैं, माटी से ही विभिन्न पात्र, रचती हैं, कलाकृतियां थी। कभी भोपाल जाना हो तो देखिये, ‘भारत भवन’का सिरेमिक विभाग। प्रसन्न हो जाएँगे ‘माटी तेरे रूप अनेक’देखकर। घरों-मुहल्लों तक में, ‘स्थापित’ हैं अब माटी को नये रूप देने वाले कलाकारों के स्टूडियो। वे उन्हें भट्टी में पकाते हैं, उनकी ग्लेजिंग करते हैं। माटी परिवर्तित होती है, पर भीतर से रहती तो माटी ही है।
सिरेमिक कलाकारों के बनाए हुए सिरेमिक ‘पात्र’और उनकी रची हुई कलाकृतियां, दिखती-बिकती है अब एक बड़ी संख्या में : कला मेलों में, स्वयं उनकी लगाई गई किसी हाट में। देश-विदेश की कला-गैलरियों में।
और हमारे कुंभकार-उनकी तो एक बहुत बड़ी दुनिया रही है। वह शायद कम हुई है। पर, हैं अभी कुछ अद्भुत बस्तियां-नाथद्वार के पास ‘मोलेला टेराकोटा विलेज’जैसी जहां न जाने कितने देसी-विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं, माटी के पात्रों-मूर्तियों को सराहने। वह दुनिया फले-फूले, बढ़े, ऐसी कामना हम करते हैं। उन्ही के रचे ‘पात्रों’से निकली हैं ढेरों कविताएं। उन्हीं के आधार पर, और स्वयं उन पर उकेरे गए हैं चित्र। उन्हें गाया-बजाया गया है। आखिरकार ‘घटम’के रूप में हमारे पास उन्हीं का सिरजा वाद्य यंत्र हैं।
आप याद करते चले जाइये, पिछले दिनों से लेकर आज तक का न जाने क्या-क्या आपको और याद आ जाएगा-माटी प्रसंग से। पात्र प्रसंग से। बचपन में अपने यहां, और अन्य घरों में देखा है वह स्थान, जिस पर घड़ों-मटकों की बगल में रखे रहते थे वैसे ही और भी पात्र। हम उस स्थान को अपनी जनपदीय भाषा—‘वैसवाड़ी’में, ‘घनौची’कहते थे। वह ठंडे पानी का गर्म-स्थल सा था। उसकी बात कभी भूल नहीं सकता। कितनी ठंडक होती है माटी के पात्र में।
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