महान क्रांतिकारी यतीन्द्रनाथ या जतिन दास ने बोर्स्टल जेल में 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद देश की आजादी के लिए प्राणोत्सर्ग किया था।
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कांग्रेस की देशी राज्य लोक परिषद में सक्रिय थे सुमन
श्रीदेव सुमन अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के अधिवेशनों में भाग लेते थे, इसलिए आन्दोलन और संगठन का अनुभव उन्हें अधिक था। इसके बाद श्रीदेव सुमन, जिनका बचपन का नाम श्रीदत्त बडोनी था, टिहरी के जनसंघर्षों के महानायक के रूप में उभरते गए।
20 मार्च 1938 को दिल्ली में हुए अखिल भारतीय पर्वतीय सम्मेलन में बदरीदत्त पाण्डे के साथ टिहरी से श्रीदेव सुमन ने भी भाग लिया। हिमाचल की धामी रियासत में 16 जुलाई 1939 को हुए गोलीकांड की जांच के लिए अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की ओर से गठित जांच समिति में सुमन को मंत्री बनाया गया।
उन्होंने 5-6 मई 1938 को श्रीनगर गढ़वाल में हुए कांग्रेस के राजनीतिक सम्मेलन में पंडित जवाहर लाल नेहरू तथा विजय लक्ष्मी पंडित को टिहरी वासियों के कष्टों से अवगत करा दिया था। अगस्त 1938 में रियासतों के सम्मेलन में सुमन और बदरीदत्त पाण्डे ने टिहरी रियासत की प्रजा की कठिनाइयों का उल्लेख करते हुये इसके लिये जिम्मेदार नीतियों की आलोचना की थी। 17-18 फरबरी 1939 को लुधियाना में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए देशी राज्य लोक परिषद के सम्मेलन में भी सुमन ने टिहरी की प्रजा की आपबीती बेहतर ढंग से सुनाई। सुमन ने मार्च 1939 में त्रिपुरा कांग्रेस में भी प्रजामण्डल के प्रचार मंत्री के तौर पर भाग लिया था।
पहली बार 9 मई 1941 हिरासत में लिया
19 मार्च 1941 को प्रजामण्डल के अधिवेशन में टिहरी राज्य के अंदर प्रजामण्डल का गठन करने का निर्णय लिया गया और श्रीदेव सुमन तथा शंकरदत्त डोभाल को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। 9 मई 1941 को टिहरी के पास पडियार गांव में सुमन को पहली बार हिरासत में लिया गया और दो दिनों तक उनको एक पुलिस इंस्पेक्टर के घर पर रखने के बाद उन्हें मुनी-की-रेती में छोड़ने के साथ ही हिदायद दी गई कि बिना प्रशासन की अनुमति के वह दो माह तक राज्य के अंदर प्रवेश न करें।
जेल से कभी जीवित नहीं निकल पाए
29 अगस्त 1942 को सुमन जब बंबई में सम्पन्न हुई देशी राज्य लोक परिषद की बैठक से लौट रहे थे तो उन्हें देवप्रयाग में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें कुछ दिनों तक वहीं हिरासत में रखने के बाद 6 सितम्बर 1942 को ब्रिटिश पुलिस के हवाले कर दिया गया।
सुमन देशी राज्य लोक परिषद की बैठक में भाग लेकर 18 अगस्त 1942 को देहरादून लौटे और 29 अगस्त 1942 को जब वह देवप्रयाग से कोटी होते हुये राजधानी जा रहे थे तो उन्हें ’भारत छोड़ो आन्दोलन’ के सिलसिले में बंदी बना कर मुनि की रेती पहुंचाया गया।
वहां से देहरादून में ब्रिटिश पुलिस के हवाले किए गए। पुलिस ने उन्हें आगरा जेल भेज दिया। आगरा जेल से छूटे तो फिर टिहरी पुलिस ने पकड़ कर जेल डाल दिया। जहां से वह कभी जीवित नहीं निकल पाए।
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