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श्रीदेव सुमन पुण्यतिथि विशेष: स्वाधीनता आन्दोलन को नई राह दिखा गया सुमन का बलिदान

सार

श्रीदेव सुमन का पवित्र बलिदान भारतीय इतिहास में अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण और उल्लेख योग्य है। इससे पहले बोर्स्टल जेल में यतीन्द्रनाथ दास के बलिदान ने देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था।

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‘‘... श्रीदेव सुमन का पवित्र बलिदान भारतीय इतिहास में अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण और उल्लेख योग्य है। - फोटो : Jay Singh Rawat
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विस्तार
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अपने अधिकारों के लिए लम्बी-लम्बी भूख हड़तालों के उदाहरण इतिहास में भरे पड़े हैं। भारत में ही इरोम चानू शर्मिला ने 500 हफ्तों तक अन्न जल त्यागा था। प्रख्यात पर्यावरणवादी नेता सुन्दर लाल बहुगुणा ने टिहरी बांध के खिलाफ 74 दिन तक अनशन किया था। लेकिन स्वाधीनता आन्दोलन में जेल में भूख हड़ताल कर प्राणोत्सर्ग करने वाले टिहरी रियासत के श्रीदेव सुमन से पहले केवल यतीन्द्रनाथ दास का ही नाम दर्ज है।

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महान क्रांतिकारी यतीन्द्रनाथ या जतिन दास ने बोर्स्टल जेल में 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद देश की आजादी के लिए प्राणोत्सर्ग किया था। उनके बाद श्रीदेव सुमन ने 1944 में जतिन दास द्वारा स्थापित परम्परा को आगे बढ़ा कर टिहरी की जेल में 84 दिनों की भूख हड़ताल के बाद प्राण त्यागे थे।


हालांकि श्रीदेव सुमन का संघर्ष टिहरी की राजशाही के जुल्मों के खिलाफ था मगर वह एक समर्पित कांग्रेसी भी थे और राष्ट्रीय आन्दोलन में भी उतने ही सक्रिय थे। उनके बलिदान का स्वाधीनता आन्दोलन पर व्यापक असर पड़ा। सुन्दरलाल बहुगुणा के प्रेरणास्रोत भी श्रीदेव सुमन ही रहे।

सुमन की शहादत ने स्वाधीनता आन्दोलन में जान फूंकी

अमर शहीद श्रीदेव सुमन की शहादत का भारत के स्वाधीनता आन्दोलन पर कितना प्रभाव पड़ा। इसका उदाहरण स्वाधीनता आन्दोलन के दिनों में 2 अगस्त 1944 के दैनिक हिन्दुस्तान का वह सम्पादकीय आलेख था जिसमें सम्पादक ने लिखा था कि,:-

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‘‘... श्रीदेव सुमन का पवित्र बलिदान भारतीय इतिहास में अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण और उल्लेख योग्य है। इससे पहले बोर्स्टल जेल में यतीन्द्र नाथ दास के बलिदान ने देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था और उसके फलस्वरूप भारतीय जेलों में राजनीतिक बंदियों को नाममात्र की सुविधाएं दी गईं।


श्रीदेव सुमन का बलिदान मगर, इससे अधिक उच्च सिद्धान्त के लिए हुआ है। टिहरी राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए आपने बलिदान दिया है। टिहरी के शासन पर पड़ा काला पर्दा इससे उठ गया है। हमारा विश्वास है कि टिहरी की जनता की स्वतंत्रता की लड़ाई इस बलिदान के बाद और जोर पकड़ेगी और टिहरी के लोग उनके जीवनकाल में अपने लोकनेता का जैसे अनुकरण करते थे, वैसे ही भविष्य में अनुप्राणित होंगे।”

नेहरू ने कहा था हम इस वीर को कभी नहीं भूलेंगे

टिहरी जेल में 84 दिनों की भूख हड़ताल के बाद श्रीदेव सुमन की 25 जुलाई 1944 को शहादत पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 31 दिसम्बर 1945 का उदयपुर में आयोजित देशी राज्य लोक परिषद के अधिवेशन में अपने भाषण में कहा था- ‘
 

‘हमारे साथियों में से जो अनेक शहीद हुए हैं उनमें टिहरी राज्य के श्रीदेव सुमन का मैं विशेष तौर पर उल्लेख करना चाहता हूं। हममें से अनेक इस वीर को याद करते रहेंगे, जो कि राज्य की जनता की आजादी के लिए काम किया करते थे...।’’
 

देशी राज्य लोक परिषद कांग्रेस का ही एक अनुसांगिक संगठन था जिसका गठन भारत की 560 से अधिक छोटी बड़ी रियासतों में लोकतंत्र के लिए कांग्रेस द्वारा ही किया गया था। इसके पहले अध्यक्ष भी जवाहरलाल नेहरू ही थे। इस परिषद के अधीन सभी रियासतों के प्रजामण्डल काम करते थे।


84 दिन के अनशन के बाद 25 जुलाई 1944 को प्राणोत्सर्ग

चूंकि अन्य रियासतों की तरह टिहरी रियासत की पैरामौट्सी (सार्वभौम सत्ता) ब्रिटिश ताज में ही निहित थी, इसलिए किसी भी रियासत का अपराधी ब्रिटिश राज का भी अपराधी था। इसलिए श्रीदेव सुमन को गिरफ्तार कर 6 सितम्बर 1942 को देहरादून पुलिस के हवाले किया गया तो ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें आगरा जेल भेज दिया था। आगरा जेल से छूटने के बाद श्रीदेव सुमन 30 दिसम्बर, 1943 को टिहरी जेल में बन्द कर दिए गए और फिर कभी जीवित बाहर नहीं निकले।

जेल में ही 21 फरवरी 1944 को स्पेशल मजिस्ट्रेट ने देशद्रोह की धारा 124 (अ) के तहत दो वर्ष के कठोर कारावास और 200 रुपये अर्थदण्ड की सजा सुनाई। सुमन महाराजा के विरुद्ध नहीं बल्कि उनके कारिंदों की ज्यादतियों के खिलाफ थे और राजा के अधीन ही उत्तरदायी शासन चाहते थे।

जेल में सुमन ने 3 मई 1944 को अपना ऐतिहासिक अनशन शुरू किया और 25 जुलाई 1944 को शाम 4 बजे उन्होंने प्राणोत्सर्ग कर दिया। टिहरी से मात्र 12 मील दूर सुमन के गांव जौलगांव में उनके परिजनों को मृत्यु का समाचार 30 जुलाई को पहुंचाया गया। उनकी पत्नी श्रीमती विनय लक्ष्मी उन दिनों महिला विद्यालय हरिद्वार में थी, जिन्हें कोई सूचना नहीं दी गई। लेकिन श्रीदेव सुमन का यह बलिदान न केवल टिहरी की राजशाही के अंत का कारण बना बल्कि देशभर के स्वाधीनता सेनानियों के लिए प्रेरणा का श्रोत भी बना।

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महान क्रांतिकारी यतीन्द्रनाथ या जतिन दास ने बोर्स्टल जेल में 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद देश की आजादी के लिए प्राणोत्सर्ग किया था। - फोटो : Jay Singh Rawat

कांग्रेस की देशी राज्य लोक परिषद में सक्रिय थे सुमन

श्रीदेव सुमन अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के अधिवेशनों में भाग लेते थे, इसलिए आन्दोलन और संगठन का अनुभव उन्हें अधिक था। इसके बाद श्रीदेव सुमन, जिनका बचपन का नाम श्रीदत्त बडोनी था, टिहरी के जनसंघर्षों के महानायक के रूप में उभरते गए।
 
20 मार्च 1938 को दिल्ली में हुए अखिल भारतीय पर्वतीय सम्मेलन में बदरीदत्त पाण्डे के साथ टिहरी से श्रीदेव सुमन ने भी भाग लिया। हिमाचल की धामी रियासत में 16 जुलाई 1939 को हुए गोलीकांड की जांच के लिए अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की ओर से गठित जांच समिति में सुमन को मंत्री बनाया गया।
 

उन्होंने 5-6 मई 1938 को श्रीनगर गढ़वाल में हुए कांग्रेस के राजनीतिक सम्मेलन में पंडित जवाहर लाल नेहरू तथा विजय लक्ष्मी पंडित को टिहरी वासियों के कष्टों से अवगत करा दिया था। अगस्त 1938 में रियासतों के सम्मेलन में सुमन और बदरीदत्त पाण्डे ने टिहरी रियासत की प्रजा की कठिनाइयों का उल्लेख करते हुये इसके लिये जिम्मेदार नीतियों की आलोचना की थी। 17-18 फरबरी 1939 को लुधियाना में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए देशी राज्य लोक परिषद के सम्मेलन में भी सुमन ने टिहरी की प्रजा की आपबीती बेहतर ढंग से सुनाई। सुमन ने मार्च 1939 में त्रिपुरा कांग्रेस में भी प्रजामण्डल के प्रचार मंत्री के तौर पर भाग लिया था।


पहली बार 9 मई 1941 हिरासत में लिया

19 मार्च 1941 को प्रजामण्डल के अधिवेशन में टिहरी राज्य के अंदर प्रजामण्डल का गठन करने का निर्णय लिया गया और श्रीदेव सुमन तथा शंकरदत्त डोभाल को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। 9 मई 1941 को टिहरी के पास पडियार गांव में सुमन को पहली बार हिरासत में लिया गया और दो दिनों तक उनको एक पुलिस इंस्पेक्टर के घर पर रखने के बाद उन्हें मुनी-की-रेती में छोड़ने के साथ ही हिदायद दी गई कि बिना प्रशासन की अनुमति के वह दो माह तक राज्य के अंदर प्रवेश न करें।


जेल से कभी जीवित नहीं निकल पाए

29 अगस्त 1942 को सुमन जब बंबई में सम्पन्न हुई देशी राज्य लोक परिषद की बैठक से लौट रहे थे तो उन्हें देवप्रयाग में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें कुछ दिनों तक वहीं हिरासत में रखने के बाद 6 सितम्बर 1942 को ब्रिटिश पुलिस के हवाले कर दिया गया।

सुमन देशी राज्य लोक परिषद की बैठक में भाग लेकर 18 अगस्त 1942 को देहरादून लौटे और 29 अगस्त 1942 को जब वह देवप्रयाग से कोटी होते हुये राजधानी जा रहे थे तो उन्हें ’भारत छोड़ो आन्दोलन’ के सिलसिले में बंदी बना कर मुनि की रेती पहुंचाया गया।

वहां से देहरादून में ब्रिटिश पुलिस के हवाले किए गए। पुलिस ने उन्हें आगरा जेल भेज दिया। आगरा जेल से छूटे तो फिर टिहरी पुलिस ने पकड़ कर जेल डाल दिया। जहां से वह कभी जीवित नहीं निकल पाए।


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