जिंदगियां बर्बाद कर देता है झूठ
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विवाह और समाज की हकीकत
ये दो केसेस सच हैं और इससे भी बड़ा, कड़वा सच यह है कि आज भी हमारे यहां शादी के मंडप में शारीरिक-मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति इस सोच के साथ बैठा दिए जाते हैं कि वे शादी के बाद स्वस्थ हो जाएंगे।
दरअसल, ऐसा सोचने वाले केवल गांव-देहात या निरक्षर वर्ग में ही नहीं मिलेंगे। पढ़े-लिखे संभ्रांत परिवारों में भी ऐसे लोग मिल जाएंगे। शायद इन तमाम लोगों का ज्ञान फिल्मों तक ही सीमित है जहां मानसिक रूप से विक्षिप्त आदमी भी शादी के बाद बिना किसी इलाज सिर्फ औरत के संसर्ग से ही पूरा हैंडसम और समझदार संजीव कुमार बनकर निकलता है! न उसे गोली दवाई की जरूरत ही पड़ती है न ही किसी साइकायट्रिस्ट की।
एक और कहानी देखिए
पड़ोस में ही रहा करती थीं वो। हम उनको सुंदर वाली दीदी कहा करते। हर तरह से गुणों की खान। पढ़ने- लिखने में अव्वल, खाना ऐसा बनाएं कि खाने वाला तारीफ करते करते थक जाए, त्योहारों पर रंगोली बनाने और गुझिया तलने तक उनकी होड़ का कोई नहीं होता और ऊपर से बला की खूबसूरत। मतलब यह कि वाकई ईश्वर ने उनको फुर्सत में ही गढ़ा था।
वो अक्सर कहतीं-
'मुझे सजना-सँवरना, घर के काम करना अच्छा लगता है। पढ़ाई मैंने खुद को वैचारिक रूप से मजबूत करने और कुछ सीखने के लिए की है। वरना तो मेरा सपना है एक अच्छा कमाऊ पति। वो बाहर के काम सम्भाले और मैं उसकी गृहस्थी। ऐसा घर रखूंगी और इतने अच्छे से बच्चों को पालूंगी न कि लोग मेरे हाउसवाइफ होने की भी मिसालें देंगे।
यह उनकी निजी सोच थी और वो इसमें खुश थीं। उनका सपना अपने परिवार के साथ आनंद से जीवन गुजारने का था। यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं। एक अच्छा परिवार, अच्छे समाज की रचना जो करता है। और आखिर तो एक अच्छे समाज से ही देश बनता है।
खैर.... तो सुंदर वाली दीदी की डिमांड बहुत थी शादी के मार्केट में। आखिर कौन नहीं चाहेगा ऐसी बहू जो ढेर दहेज भी लाए और पक्की गृहस्थन बनकर सारे काम करे। नाजो पली थीं दीदी और उनके माता-पिता के भी अरमान थे कि एक ही बेटी है, सो अच्छा घर-वर मिले।
आखिर रिश्तेदारों ने ही एक लड़का बताया जो करोड़पति परिवार से था। पढ़ा लिखा था और परिवार का व्यवसाय सम्भाल रहा था। सब खुश थे और सबसे ज्यादा खुश थीं सुंदर वाली दीदी। सबसे बड़ी बात थी कि लड़के वालों को दहेज नहीं सिर्फ कन्या चाहिए थी।
शादी खूब धूमधाम से हुई। दूल्हा-दुल्हन की जोड़ी एकदम राजकुमार-राजकुमारी सी लग रही थी। पहला महीना तो रस्में पूरी करने और दावतों में जाने में ही बीता। नई बहु अपनी झिझक और लाज अभी पूरी तरह हटा भी नहीं पाई थी कि उसे दूल्हे के व्यवहार कुछ 'अजीब' लगा। एक महीने में तीन बार वह शहर के अपने घर चला गया था, दुल्हन को अकेला पुश्तैनी घर वाले कस्बे में छोड़कर। कहीं भी हनीमून जैसी कोई हलचल नहीं थी, जिसके लिए शादी के पहले हवाई सपने दिखाए गए थे।
ऊपर से अक्सर दूल्हा देर-देर तक बाथरूम में बंद रहता। थोड़ा झिझकते हुए आखिर एक दिन दुल्हन ने पूछ लिया और जवाब मिला- संयुक्त परिवार है। मुझे सिगरेट पीने की आदत है। अब सबके सामने तो पी नहीं सकता न? इसलिए बाथरूम में पीता हूं। रही बात हनीमून की तो जल्द ही हम विदेश चल रहे हैं।
दुल्हन ने विश्वास किया और इसके पहले कि उसके सपनों को पंख मिलते, एक रात को प्यास लगने पर वह पानी पीने के लिए रसोई की तरफ बढ़ी तो रास्ते में प्यारे 'पतिदेव' को जमीन पर औंधा पड़ा पाया। पहले तो लगा कोई एक्सीडेंट है। उसने घबरा कर आवाज़ दी लेकिन उस दिन घर के बाकी लोग किसी फंक्शन में गए थे। फोन पर लॉक लगा था और दरवाजा बाहर से बन्द था। उसके लिए यह नया सीन था।
इधर, घबराती-डरती दुल्हन ने जैसे-तैसे पति को कमरे तक पहुंचाया और उसकी सांस चलते देख रातभर की हिम्मत रखी। सुबह सबके लौटने पर यह साफ हो गया कि लड़का ड्रग्स का लती है और कई सालों से नशे का शिकार है। लड़की के माता-पिता ने प्रश्न किए तो सास-ससुर ने जवाब दिया-'हमें तो लगा था शादी के बाद सुधर जाएगा।' बस यहीं से असली बात शुरू होती है।
धोखे की बुनियाद पर नहीं चलती शादियां
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एक तरह से देखा तो शादी हमारे देश में हर मुश्किल का रामबाण इलाज है। लड़का नपुंसक है, शादी करवा दो ठीक हो जाएगा, लड़की मानसिक रूप से अस्वस्थ है, कोई न, शादी करवा दो चंगी होकर गृहस्थी संभालेगी, लड़का कम कमाता है, शराब पीता है, लड़कियां छेड़ता है, जेल की हवा खा आया है, कोई समस्या नहीं है जी, शादी है न। एक बार शादी हो जाये बस... फिर तो सब ठीक हो जाएगा।
चूंकि बताने पर ये तमाम बातें कमियां लगती हैं, इसलिए इन्हें छुपा लिया जाता है। और जब सच्चाई सामने आती है तो 80 प्रतिशत लड़कियां अपनी किस्मत को कोसते हुए निभा ले जाती हैं और 20 प्रतिशत लड़के भी। इसलिए ही आजकल विवाह पूर्व मेडिकल कुंडली मिलाने पर जोर दिया जा रहा है, जिसका पालन मुश्किल से 1 प्रतिशत लोग करते हैं।
धोखा, झूठ और फरेब जब विवाह जैसे स्थाई रिश्ते की नींव बनता है तो, वह न केवल दो परिवारों बल्कि पूरे समाज के लिए नुकसानदायक बन जाता है। एक बात छुपाने के लिए, एक बार बोला गया झूठ आगे जाकर झूठ का पहाड़ बन जाता है जिसका अचानक गिरना तय होता है। इस सामाजिक बुराई से हमें अभी बहुत लंबी लड़ाई लड़ना होगा। सच बोलने का साहस और शुरुआत दोनों करना ही होगा।