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अनजान के बारे में समीर: मुंबई आए थे बीमारी से बचने, शहर ने बना दिया नामी गीतकार

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अनजान साब। - फोटो : Amar Ujala
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हमारे परदादा राजाराम शास्त्री बहुत बड़े ज्ञाता थे। कला और साहित्य कहीं न कहीं हमारे खून में रहा। हमारे पिताजी यानी अनजान साब को शायरी का शौक हुआ तो लिखने लगे। रुद्र काशिकेय का सानिध्य प्राप्त हुआ। वहां से उनकी कविता की शिक्षा दीक्षा सही राह में शुरू हुई। बनारस के पत्र पत्रिकाओं में छपने लगे और वहां के काव्य गोष्ठियों में कविता पाठ करने के लिए जाने लगे क्योंकि उनका कंठ बहुत सुरीला था। जब वह अपनी कविताओं को तरन्नुम में पढ़ते थे तो लोग बहुत पसंद करते थे। उस जमाने में हरिवंश राय बच्चन की किताब 'मधुशाला' बहुत लोकप्रिय हुई थी। पिता जी ने उस पर एक पैरोडी लिख दी और उसका नाम रखा 'मधुबाला'। यह किताब नौजवानों में खूब  लोकप्रिय हुई।

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मुंबई आना एक इत्तेफाक रहा
इसी बीच पिताजी अस्थमा से ग्रसित हो गए। यह बीमारी उनको इतनी भयानक हुई कि डॉक्टर ने कहा कि अगर किसी शुष्क वातावरण में रहेंगे तो जिंदा नहीं रह सकते, कहीं न कहीं  सागर तट पर जाना पड़ेगा। उस जमाने में लोग बंबई (मुंबई) या कलकत्ता (कोलकाता) ही जाते थे। पिताजी को लगा कि मुंबई ही बेहतर है। कम से कम मुंबई में एक फिल्म इंडस्ट्री है, अगर कहीं कुछ काम नहीं मिला तो वहां कोशिश करूंगा। पहली फिल्म उनको इसलिए जल्दी मिल गई क्योंकि उनके एक दोस्त बनारस में शशि बाबू थे। एक बार मुकेश जी किसी कार्यक्रम में बनारस में आए थे। उन्होंने मुकेश जी से कहा कि मेरा एक दोस्त है उसे आप एक बार सुनिए। मुकेश जी बहुत ही सरल आदमी थे, उन्होंने पिता जी की कुछ कविताएं सुने तो बहुत खुश हुए।

किशोर कुमार, अनजान। - फोटो : Amar Ujala
मुंबई में पहला ब्रेक
पिता जी मुंबई आकर मुकेश जी से मिले तो मुकेश जी को उनका वादा याद था। वह पिता जी को लेकर राज कपूर से मिलवाने के लिए ले गए। राज कपूर ने गाना सुना भी, लेकिन कहा कि मेरे यहां लिखने के लिए तुमको अभी 10 साल लगेंगे और मेहनत करनी पड़ेगी। फिर मुकेश जी ने उन्हें प्रेम नाथ से मिलवाया। और वहां पिता जी की जो पहली फिल्म जो शुरू हुई उसका नाम 'गोलकुंडा का कैदी' था। उस फिल्म के लिए पिता जी के गाने रिकॉर्ड हो गए। मगर दुर्भाग्य यह रहा कि फिल्म चली नहीं, तो संघर्ष का एक लंबा सिलसिला शुरू हुआ। इस फिल्म से लेकर तकरीबन 17 साल तक उन्होंने लड़ाई लड़ी और फिर उन्हें रविशंकर की फिल्म 'गोदान' में मौका मिला। रवि शंकर जैसे विद्वान और संगीतज्ञ के साथ काम करना ही अपने आपने बहुत बड़े सम्मान की बात थी। यह फिल्म मुंशी प्रेमचंद की कहानी गोदान पर बनी थी। इस फिल्म का प्रीमियर बनारस में हुआ था। इसमें राजकुमार हीरो और कामिनी कौशल हीरोइन थी। इस फिल्म का गाना 'पिपरा के पटवा सरीखे डोले मनवा' बहुत मशहूर हुआ था। 

जीविकोपार्जन के लिए पढ़ाए ट्यूशन
लोगों तक ये बात पहुंचने लगी कि कोई गीतकार आया है जो अच्छा लिखता है। इस बीच जीविका चलाने के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे। कुछ पत्रिकाओं में लेख लिखते रहते थे, ताकि महीने का खर्चा किसी तरह से चलता रहे। फिर उन्हें राजेश खन्ना और मुमताज की फिल्म 'बंधन' मिली। इस फिल्म का एक गाना 'बिना बदरा के बिजुरिया' बहुत मशहूर हुआ। वहां से पिताजी लोगों के नजर में थोड़ा थोड़ा आने लगे। इस फिल्म के साथ ही वह कल्याणजी आनंदजी भाई की फिल्मों के गीत लिखने लगे और फिर जब 'डॉन' मिली तो कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस फिल्म का गीत 'खइके पान बनारस वाला' उन्हें कामयाबी के उस शिखर तक लेकर गया।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का साथ
पिता जी ने सबसे ज्यादा काम कल्याण जी आनंद जी भाई और बप्पी लहरी के साथ काम किया, लेकिन वह लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी के बहुत बड़े मुरीद थे। रवि टंडन एक फिल्म 'अपने रंग हजार' बना रहे थे। उन्होंने पिता जी से कहा कि मैं लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी के साथ एक फिल्म करने जा रहा हूं, चलो मिलवाता हूं। पिताजी ने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी से कहा कि आनंद बख्शी साहब के साथ आप की ट्यूनिंग बहुत अच्छी है, मेरा बहुत दिल है कि आपके साथ काम करूं। इस तरह से पिता जी ने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत निर्देशन में फिल्म 'अपने रंग हजार' के गाने लिखे। मुझसे  पिता जी अक्सर कहते थे कि तुम भले ही अपने पसंदीदा संगीतकार के साथ काम कर लो, लेकिन अगर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और आर डी बर्मन के साथ काम नहीं किया तो समझ लो कि जिंदगी में बहुत कुछ मिस कर गए।

आरडी बर्मन के साथ कमाल के रिश्ते
पिता जी का आर डी बर्मन के साथ तो बहुत ही कमाल का रिश्ता था। पिता जी ने आर डी बर्मन के साथ हालांकि ज्यादा काम नहीं किया और न ही उनके साथ गाने इतने मशहूर हुए। आरडी बर्मन साहब संगीतकार महान तो थे ही, आदमी भी बहुत महान थे। जब पापा बीमार थे तो उन्होंने मुझसे कहा कि पापा को सीटिंग में मत लेकर आना, मैं खुद आऊंगा। देव आनंद साहब की फिल्म 'स्वामी दादा' की म्यूजिक सीटिंग पर आर डी बर्मन साहब हमारे घर पर आते थे। वह पापा को बहुत मानते थे। वह मुझसे कहा करते थे कि तुम्हारे पिता गॉडमैन हैं। इतना शरीफ आदमी जिंदगी में कभी देखा ही नहीं।
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समीर, अनजान। - फोटो : Amar Ujala
भोजपुरी से आखिर तक रहा प्यार
मेरे पिता अनजान साहब को अपनी मातृभाषा से बहुत प्यार था। चित्रगुप्त जी को तो भोजपुरी फिल्मों के संगीत का मसीहा बोला जाता है। जब उनको 'बलम परदेसिया' मिली तो उनको लगा कि यह मौका है। जब वह भोजपुरी गानों की सिटिंग पर जाते थे तो उनके चेहरे पर एक अलग किस्म की रौनक नजर आती थी। उनको लगता था कि अब जो काम करने जा रहा हूं वह मेरी रूह, मिट्टी और मातृभाषा का काम है। उन्हें बनारस और गंगा मईया से बहुत ही प्यार था। जब भी वह बनारस जाते थे तो गंगा जी में जरूर तैरते थे और बाबा विश्वनाथ के दर्शन करते थे। उन्होंने फिल्म 'गंगा की सौगंध' में गंगा मइया पर गीत 'मानो तो मैं गंगा मां हूं ना मानो तो बहता पानी' लिखा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के स्वच्छता अभियान दौरान यही गाना बज रहा था। उनको बनारस की संस्कृति, वहां के लोगों से इतना लगाव था कि जब भी बनारस जाने का मौका मिलता था तो मौका छोड़ते नहीं थे। उन्होंने एक किताब 'मैं गंगा तट का बंजारा' लिखी।  उनका जीवन और उनके गानों में साहित्य, अध्यात्म और जीवन का ऐसा दर्शन है कि हर आदमी के जिंदगी  से मिलता जुलता है।

लालजी पांडे से यूं बने अनजान
एक बार अमीन सयानी जी ने अपने इंटरव्यू में पिताजी से पूछा कि आपने अपना नाम अनजान क्यों रखा? पिता जी ने कहा, 'एक अनजान वह होता है जिसे कोई जानता नहीं। दूसरे अनजान का मतलब होता है जो खुद कुछ नहीं जानता। यह दोनों चीजें लोगों को बताना चाहता हूं कि लोग मुझे जाने और मैं दुनिया को कुछ जानूं, इसलिए नाम अनजान रखा।'
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