26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया। संविधान ही वह दस्तावेज है जिसमें वर्णित मौलिक अधिकारों के बल पर हम देश प्रदेश के हर कोने में अपनी हर प्रकार की स्वतंत्रता का आनंद लेते हैं। किसी भी प्रकार का अन्याय होने पर यही मौलिक अधिकार हमारी ढाल बन जाते हैं। मेरी तरह हर भारतीय खुद को सौभाग्यशाली समझता है कि उसे ऐसे मौलिक अधिकार मिले, जिससे वह अपने जीवन को बिना किसी डर भय के व्यतीत कर सकता है।
हम सब मौलिक अधिकारों की बात तो बड़ेे जोर-शोर से करते हैं, लेकिन जब बात आती है देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों की तो हम सब पीछे हटने और टाल मटोली वाली हालत में आ जाते हैं। इसी संविधान ने हमें समाज व देश के प्रति जो जिम्मेदारी तय करने के मौलिक कर्तव्य दिए उसकी बात या तो कोई करना नहीं चाहता या हम जानबूझकर नहीं करते, मतलब साफ है कि हम पाना तो सबकुछ चाहते हैं लेकिन बदले में या अपना दायित्व समझ कर कुछ करना नहीं चाहते।
इसी संविधान में वर्ष 1976 में अपनाए गए 42वां संविधान संशोधन के द्वारा नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों को सूचीबद्ध किया गया। संविधान के भाग IV में सन्निहित अनुच्छेद 51 'क' मौलिक कर्तव्यों के बारे में है।
यह अन्य चीजों के साथ-साथ नागरिकों को संविधान का पालन करने, आदर्श विचारों को बढ़ावा देने और अनुसरण करने का आदेश देता है, जो भारत के स्वंतत्रता संग्राम से प्रेरणा लेता है, देश की रक्षा करने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर देश की सेवा करने और सौहार्द्रता एवं समान बंधुत्व की भावना विकसित करने व धार्मिकता का संवर्धन करना, साथ ही भाषाविद् और क्षेत्रीय एवं वर्ग विविधताओं का विकास करने का आदेश व प्रेरणा देते हैं।
सरदार स्वर्ण सिंह समिति की अनुशंसा पर ही संविधान के 42वें संशोधन -1976 ई० के द्वारा मौलिक कर्तव्य को संविधान में जोड़ा गया। मौलिक कर्त्तव्यों को रूस के संविधान से लिया गया है। कहने को तो मौलिक कर्तव्य की संख्या 11 है, परंतु इन मौलिक कर्त्तव्यों में कुछेक कर्तव्यों को एक दूसरे में जोड़ दिया गया है अर्थात् नाम अलग-अलग कर दिया है।
मैं बात करूं विशेष व जरूरी मौलिक कर्तव्यों की तो सबसे पहले बात आती है संविधान में वर्णित प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य बनता है कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करे।
प्रत्येक देशवासी का मौलिक कर्तव्य बनता है कि भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे लेकिन यहां भी हम कहां निभा पाते हैं इस कर्तव्य को।
हमें यह याद जरूर रहता है कि हमें हमारी सुरक्षा का मौलिक अधिकार मिला है पर देश की सुरक्षा अखंडता की आज कितने लोग परवाह कर रहे हैं। देश की रक्षा केवल सीमा पर जाकर या सैनिक बन कर ही नहीं हो सकती।
हम देश या अपने क्षेत्र में भाईचारे की भावना को पैदा कर भी देश की रक्षा कर सकते हैं। आज जातिवाद या धर्म के नाम पर बंटने बांटने की बजाए हम क्यों नहीं अपने मौलिक कर्त्तव्य का पालन करते। अपने-अपने धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की बात तो सब करते हैं, लेकिन सर्वधर्म स्वतंत्रता व धार्मिक विश्वास को बढ़ाने की बात आखिर क्यों नहीं की जाती? तब हम इसी मौलिक अधिकार के साथ-साथ मौलिक कर्तव्य की बात क्यों नहीं करना चाहते?