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भारत और वैदिक विज्ञान: कहानी प्राचीन भारत के रसायन शास्त्र की, जिसे दुनिया के सामने लाए वैज्ञानिक डॉ.प्रफुल्ल चंद्र रे

सार

‘द हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमेस्ट्री’ एक दुर्लभ पुस्तक है। जाने-माने रसायनशास्त्री प्रफुल्ल चंद्र रे ने इसे लिखा था। पीसी रे ने चरक और सुश्रुत के कार्यों पर भी गहन शोध किया। उन्होंने अपनी पुस्तक में ये भी सिध्द किया कि अरब में मौजूद कई वैज्ञानिक शोधों के लिए कैसे दुनिया भारत की ऋणि है। 

पीसी रे अपने कार्य में ये भी स्थापित करने में सफल हुए थे कि आधुनिक विज्ञान के विकास में भारत में हुई महत्वपूर्ण खोजों को या तो नजरअंदाज किया गया या समय, काल, परिस्थिति की वजह से उस ज्ञान के अन्य जगहों पर पहुंचने की वजह से उसे वहां का मान लिया गया।

अपनी पुस्तक के दूसरे ही अध्याय में उन्होंने इस पर अपनी बात रखी है। उन्होंने वागभट्ट के कार्य को भी अपनी पुस्तक में शामिल किया।  

अपने इस कार्य को आगे बढ़ाते हुए वो इस पुस्तक का दूसरा खंड भी लेकर आए।जिसे 1904 में प्रकाशित किया गया। उनके इस कार्य को इसलिए भी पहचान मिली क्योंकि वे पहले ही रसायन शास्त्री के तौर पर पूरी दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना चुके थे। 

दुर्भाग्यवश भारत में गणित, खगोल, रसायन आदि कई विषयों पर हुए ऐसे महत्वपूर्ण कार्यों को आने वाली पीढ़ियां आगे नहीं बढ़ा पाई। इसकी बड़ी वजह ये रही कि ज्यादातर स्कॉलर्स पाश्चात्य पध्दति के शोधों को ही पढ़ते हैं।

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पीसी रे को रसायन शास्त्र के एक और दिग्गज एम. बर्थेलॉट ने 1897 में लंदन बुलाया था। बर्थेलॉट जैसे कई वैज्ञानिक भारत के पुरातन ज्ञान विज्ञान से प्रभावित थे। - फोटो : बंगाल केमिकल्स एण्ड फार्मास्यूटिकल्स वेबसाइट
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विस्तार
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‘द हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमेस्ट्री’ एक दुर्लभ पुस्तक है। जाने-माने रसायनशास्त्री प्रफुल्ल चंद्र रे ने इसे लिखा था। दुनिया भर में उनकी प्रतिष्ठा थी और यही वजह है कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें कई सम्मान दिए गए। उनके काम और कहानी को जानना इसीलिए जरूरी है क्योंकि ये एक उदाहरण है कि वर्तमान दौर के गंभीर वैज्ञानिकों ने भी वेदों में मौजूद विज्ञान को किस तरह आज की भाषा में रखा।

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पीसी रे को इसलिए जाना जाए 
पीसी रे को रसायन शास्त्र के एक और दिग्गज एम. बर्थेलॉट ने 1897 में लंदन बुलाया था। बर्थेलॉट जैसे कई वैज्ञानिक भारत के पुरातन ज्ञान विज्ञान से प्रभावित थे। पीसी रे ने उनकी प्रेरणा से भारतीय रसायनशास्त्र जिसे वे रस शास्त्र कहते हैं, के विषय में लिखना शुरू किया। उन्हें इस कार्य का महत्व समझ में आया इसीलिए उन्होंने स्वयं को पूरी तरह इसी कार्य में समर्पित किया और इस पुस्तक को दो खंडों में लिखा।

दुर्भाग्य है कि आज ये पुस्तक प्रिंट में नहीं है। बड़ी मुश्किल से इसकी कुछ एक प्रतियां मिल पाती हैं। उनकी ये पुस्तक इसीलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उनके कार्य को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। यानी वे लोग जो भारतीय पुरातन शास्त्रों को कपोल कल्पना कहते हैं, उनके लिए पीसी रे का ये कार्य एक करारा जवाब है।  

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पीसी रे रसायन शास्त्र के जानकार थे, लेकिन संस्कृत और वैदिक साहित्य का उन्हें ज्ञान नहीं था न ही वो इस शास्त्र को पढ़ने में सक्षम थे। - फोटो : ट्विटर

गौरवशाली इतिहास की बानगी 
गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ इंडियन मेडिसिन, मैसूर, जिसे देश के प्राच्य पुस्तकालयों में गिना जाता है के पुस्तकालय में इस पुस्तक की कुछ प्रतियां मिलीं। 1904 में डॉ. बर्थलॉट के आग्रह के बाद पीसी रे ने रसेंद्र सार संग्रह के आधार पर एक मोनोग्राफ लिखा था। इसके बाद उन्होंने भारतीय पुरातन रस शास्त्र का गहराई से अध्ययन किया। यदि उनकी पुस्तक के कुछ अध्यायों के शीर्षक ही पढ़ लिए जाएं तो भारत के पुरातन विज्ञान के गौरवशाली इतिहास का अंदाजा लगाया जा सकता है।

हिंदू केमेस्ट्री का पहला अध्याय ही है वेदों में रसायन शास्त्र की संकल्पना। दूसरे अध्याय में उन्होंने आयुर्वेदिक युग और रसायन शास्त्र के महत्व पर बात की है। उनके इस कार्य का महत्वपूर्ण पहलू है शास्त्रों को समझना। 

पीसी रे रसायन शास्त्र के जानकार थे, लेकिन संस्कृत और वैदिक साहित्य का उन्हें ज्ञान नहीं था न ही वो इस शास्त्र को पढ़ने में सक्षम थे। यही वजह है कि उन्होंने अपने इस बेहतरीन शोध के लिए संस्कृत के प्रकांड विद्वान पंडित श्रीराम नवकांत कविभूषण का सहयोग लिया। पंडित जी ने रे साहब के लिए संस्कृत साहित्य और वैदिक वांग्मय की जानकारियां जुटाई और उन्हें समझने में मदद की।

ये उदाहरण इसीलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज भी जो वैज्ञानिक अज्ञानतावश भारत के समृध्द पुरातन ज्ञान विज्ञान पर प्रश्न उठा देते हैं उन्होंने कभी स्वयं इन शास्त्रों का अध्ययन किया ही नही है, ना ही वे इसकी पात्रता रखते हैं।

दरअसल, वैदिक वांग्मय को संस्कृत के जानकार ही समझ पाते हैं, लेकिन वे स्वयं ज्योतिष और कर्मकांड तक सीमित हो कर रह गए हैं। पंडित नवकांत कविभूषण भी रसायन शास्त्र के जानकार नहीं थे, लेकिन पीसी रे और उन्होंने मिलकर आधुनिक विज्ञान और भारत के पुरातन रसायन शास्त्र पर ये महत्वपूर्ण शोध करने में सफलता हासिल की। आज के दौर में भी ऐसे ही प्रयासों की आवश्यकता है।  

पीसी रे ने तांत्रिक काल पर भी काफी गहन शोध किया। जैसे ही हम तांत्रिक शब्द या तंत्र मंत्र शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो हमारे मन में पोंगापंथी के भाव आते हैं। संस्कृत के प्रति अज्ञानता और अज्ञानियों द्वारा उसकी विवेचना ने ये स्थिति बना दी।

दरअसल, यज्ञ का अर्थ वेदों में शोध और अनुसंधान से है। इसी तरह तंत्र और मंत्र वर्तमान दौर में प्रचलित थ्योरम और फॉर्मूला जैसे शब्दों के लिए इस्तेमाल होते थे। जब तक इन वेदों में उतरा नहीं जाएगा, तब तक उस ज्ञान से सब अछूते ही रह जाएंगे।  

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आज पीसी रे साहब की किताबों को कोर्स में शामिल कराना तो दूर की बात है उनकी प्रतियां मिलना भी मुश्किल है। - फोटो : ट्विटर

पीसी रे का महान योगदान 
पीसी रे ने चरक और सुश्रुत के कार्यों पर भी गहन शोध किया। उन्होंने अपनी पुस्तक में ये भी सिध्द किया कि अरब में मौजूद कई वैज्ञानिक शोधों के लिए कैसे दुनिया भारत की ऋणि है। पीसी रे अपने कार्य में ये भी स्थापित करने में सफल हुए थे कि आधुनिक विज्ञान के विकास में भारत में हुई महत्वपूर्ण खोजों को या तो नजरअंदाज किया गया या समय, काल, परिस्थिति की वजह से उस ज्ञान के अन्य जगहों पर पहुंचने की वजह से उसे वहां का मान लिया गया।

अपनी पुस्तक के दूसरे ही अध्याय में उन्होंने इस पर अपनी बात रखी है। उन्होंने वागभट्ट के कार्य को भी अपनी पुस्तक में शामिल किया।  

अपने इस कार्य को आगे बढ़ाते हुए वो इस पुस्तक का दूसरा खंड भी लेकर आए। जिसे 1904 में प्रकाशित किया गया। उनके इस कार्य को इसलिए भी पहचान मिली क्योंकि वे पहले ही रसायन शास्त्री के तौर पर पूरी दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना चुके थे। दुर्भाग्यवश भारत में गणित, खगोल, रसायन आदि कई विषयों पर हुए ऐसे महत्वपूर्ण कार्यों को आने वाली पीढ़ियां आगे नहीं बढ़ा पाई। इसकी बड़ी वजह ये रही कि ज्यादातर स्कॉलर्स पाश्चात्य पध्दति के शोधों को ही पढ़ते हैं।

आज पीसी रे साहब की किताबों को कोर्स में शामिल कराना तो दूर की बात है उनकी प्रतियां मिलना भी मुश्किल है। फिर भी उनके जैसे महान वैज्ञानिकों ने आशा की एक किरण जगाई है कि किस तरह आधुनिक विज्ञान में अच्छा कार्य कर रहे युवा यदि अपनी संस्कृति और पुरातन शास्त्रों में छिपे गूढ़ रहस्यों का भी अध्ययन करें तो दुनिया के सामने खुद को बेहतर तरीके से रख सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि हम दुनिया भर के वैज्ञानिकों को विज्ञान की उन्नति का श्रेय देते हैं जबकि खुद हमारे इतिहास में विज्ञान की एक विस्तृत परंपरा दबी हुई है। इसी तरह गणित, खगोल शास्त्र, भौतिकी, चिकित्सा शास्त्र में भी कई लोगों ने शोध किए हैं जिन्हें आगे भी हम आपके सामने रखेंगे। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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