लोकार्पण का बहिष्कार- क्षुद्र राजनीति
नए संसद भवन के लोकार्पण का बहिष्कार प्राथमिक तौर पर क्षुद्र राजनीति लगती है, लेकिन इसका संदेश गहरा और दूरगामी होगा। इसे केवल विपक्षी एकता की एक और कोशिश अथवा कर्नाटक चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस की बढ़ती आक्रामकता के तौर पर ही देखना सही नहीं होगा।
विपक्ष ने राष्ट्रपति को मुद्दा इसलिए भी बनाया है, क्योंकि वो एक महिला हैं और उस आदिवासी समाज से हैं, जिस समाज से पहला राष्ट्रपति बनाने का श्रेय लेने में भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी। यह सही भी था कि जिन्हें देश का मूल निवासी माना जाता है, उस वर्ग का कोई राष्ट्रपति भी बने, यह मानने में 75 साल लग गए।
कांग्रेस चाहती तो खुद ऐसा कर सकती थी, लेकिन तब उसकी निगाह में क्षेत्रीय अथवा धार्मिक संतुलन ही ज्यादा महत्वपूर्ण रहा। लेकिन इस समय वो यह दिखाना चाहती है कि भाजपा और मोदी का आदिवासी प्रेम महज दिखावा और वोटसापेक्ष है। जब वास्तव में श्रेय लेने की बात आती है तो बड़ी आसानी से आदिवासियों को किनारे कर दिया जाता है। इसे सही ठहराने के तर्क भी गढ़ लिए जाते हैं।
इस दुखती रग पर भाजपा और उसे बड़बोले प्रवक्ता मौन हैं। जवाब में वो कांग्रेस की ‘गलतियों’ को वैधानिक ठहराने में अपना बचाव मान रहे हैं। कांग्रेस व अन्य दलों का विरोध इसलिए भी है, क्योंकि उद्घाटन का मुहूर्त तिथि किसी राष्ट्रीय उत्सव के बजाय हिंदुत्व विचार के जनक वीर सावकर की जन्म जयंती को चुना गया। यह परोक्ष रूप से भारत के हिंदू राष्ट्र बनने का संकेत है। फर्क इतना है कि कांग्रेस ‘हिंदुओं’ को चाहती है, ‘राष्ट्र’ को भी चाहती है, लेकिन ‘हिंदू राष्ट्र’ को नहीं चाहती।
जहां तक तकनीकी तौर पर संसद भवन के उद्घाटन की बात है तो प्रधानमंत्री को उतना ही अधिकार है। वैसे भी जब मोदीजी हर वंदे मातरम् ट्रेन को हरी झंडी दिखा रहे हैं तो ये तो संसद भवन का मामला है, उस संसद भवन का, जिसके वो नेता हैं और करोड़ों हिंदुओं के आदर्श हैं। लिहाजा यह उद्घाटन इस मायने में भी ऐतिहासिक है क्योंकि यह भव्य भवन एक हिंदू राजपुरुष द्वारा देखे गए सपने, एक हिंदू वास्तुशिल्पकार द्वारा डिजाइनीकृत, हिंदुत्व विचारधारा के पुरोधा की जयंती पर उद्घाटित, हजारों हिंदू श्रमिकों (जिनमें कुछ दूसरे धर्मों के भी हो सकते हैं) के हाथों निर्मित व भारत के विश्व गुरू बनने के मंगलाचरण का महाघोष करता स्थापत्य है। ऐसे स्थापत्य के लोकार्पण के लिए मोदी से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता।
जहां तक कांग्रेस की बात है तो संसद भवन के लोकार्पण के बहाने वो जो मोदी विरोध का नरेटिव खड़ा करना चाहती थी, उसमें उसे आंशिक सफलता ही मिली है। क्योंकि 17 ऐसे विरोधी दल इस समारोह में शामिल हो रहे हैं, जिनके लिए मोदी समर्थन से ज्यादा कांग्रेस विरोध महत्वपूर्ण है तथा जो लोकतंत्र के इस नए मंदिर के उद्घाटन को दलीय दुराग्रहों से ऊपर उठकर देख रहे हैं। यानी विपक्ष भी पूरी तरह एक नहीं है। साथ ही इससे 2024 में संभावित राजनीतिक समीकरणों की झलक मिलती है। आगामी चुनावों में मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है।
कई सवालों का जवाब भविष्य की गोद में
एक और सवाल कि क्या नया संसद भवन एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की आत्मा का वास्तुशिल्पीय प्रतिबिंब है या नहीं? अमूमन शिल्पशास्त्र का सीधा सम्बन्ध मानव सभ्यताओं और संस्कृति के उत्थान पतन, राजनीतिक विचारों और राजशैलियों के विकास व सामाजिक परिवर्तनों से रहा है। प्राय: माना जाता है कि राजशाही अथवा औपनिवेशिक वास्तुशिल्प में अधिनायकवादी प्रवृत्ति हावी होती है।
वह मंत्रमुग्धता करने के साथ स्थापत्य की किसी हद तक आतंकित करने वाली विराटता, भव्यता, उत्कृष्टता और अप्रतिमता आम आदमी को उसके बौने पन और अजनबीपन का अहसास भी कराती है। जबकि लोकतांत्रिक वास्तु शिल्प में संवाद, परस्पर गरिमा और सहज भव्यता पर जोर रहता है। ऐसी भव्यता जिसमें देश का नागरिक खुद को सहज महसूस करे, उसे अपने राजनीतिक दर्शन का स्वाभाविक वास्तुशिल्पीय बयान मानें। यहां संवाद, गरिमा और न्याय अनिवार्य तत्व हैं।
नए संसद भवन के वास्तुशिल्प पर भी इन मुद्दों से सवाल उठे थे। लेकिन अभी जो वीडियो देखने में आए हैं, उससे यह वास्तु भव्य तो लगती है। यह अलग बात है कि अभी भी पुराने वास्तु शिल्पों की उद्दम भव्यता नए स्थापत्यों पर कई बार भारी पड़ती है। जो सवाल इस प्रसंग पर उठे हैं, उनमें से कुछ के जवाब आने वाले समय में मिल भी सकते हैं, लेकिन एक सवाल भाजपा के लिए फांस बना रह सकता है कि उसने इस ऐतिहासिक क्षण का सेहरा एक आदिवासी महिला राष्ट्रपति के सिर क्यों नहीं बंधने दिया ठीक उसी तरह कि जैसे कांग्रेस ने संविधान निर्माता बाबा साहब अंबेडकर को लोकसभा में चुनकर क्यों नहीं जाने दिया?
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