यहां सवाल यह भी है कि किसी एक व्यक्ति को दी गई गालियां दूसरा कोई क्यों अपने करंट अकाउंट में डलने दे। फिर जो गालियां दी गई हैं, उसके पीछे क्या कुछ कारण हैं? हालांकि अकारण दी गई गालियों को रिटर्न या खारिज किया जा सकता है। लेकिन यह उस व्यक्ति पर निर्भर है, जिसे पावर ऑफ एटर्नी दी गई है।
यहां दिग्विजय ने बिन मांगी गालियों को यह कहकर लौटाने की कोशिश की कि जिस वजह से गालियां मुझे ट्रांस्फर की जा रही हैं, उसमें मेरा कोई हाथ नहीं है। यानी ये उधार का सिंदूर मेरे माथे क्यों? इसी संदर्भ में दिग्विजयसिंह ने एक सोशल मीडिया पोस्ट भी डाली। उन्होंने कहा कि 'जब परिवार बड़ा होता है तो सामूहिक सुख और सामूहिक द्वंद्व दोनों होते हैं। समझदारी यही कहती है कि बड़े लोग धैर्यपूर्वक समाधान निकालें।' इस कसक पर कपड़ा डालने के अंदाज में कमलनाथ ने कहा- मैंने मजाक और प्यार में ये बात कही थी। इस पर किसी को नाराज नहीं होना चाहिए।‘
दरअसल, राजनीति में राजी नाराजी जताने के तरीके भी अलग होते हैं। राजनीति के नियम विज्ञान की तरह स्पष्ट और प्रमाण आधारित नहीं होते। लेकिन राजनीतिक प्रयोगशीलता सियासत आत्मा है। अमूमन यहां जो दिखता है, वो वैसा होता नहीं है और जो होता है, वह कई बार किसी और ही रूप में दिखाई पड़ता है। ताजा प्रकरण में गालियों की पावर ऑफ एटर्नी देने का अर्थ केवल ‘विषपान के अधिकार’ से है। जैसा कि खुद दिग्विजयसिंह ने भी कहा।
यह बात अलग है कि कई बार खुद दिग्विजय अपने ही विवादित बयानों के कारण कटघरे में खड़े होते हैं और फिर ‘हर फिक्र को धुएं में उड़ाने’ के अंदाज में उस कटघरे से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। इसका निहितार्थ इतना ही है कि राजनेता को हमेशा मोटी चमड़ी वाला होना चाहिए।
छुईमुई भाव से सियासत नहीं होती। क्योंकि सियासत के रास्ते फूलों और कांटो से एक समान भरे हैं। यहां हर बात का श्रेय लेने का उद्दाम घोष और आत्ममुग्धता में डूबे रहने का सुभीता भी है तो वक्त पड़े गम और गालियां खाते रहने की फजीहत भी है। सियासत में विरोधियों के कपड़े फाड़ सकने की कूवत भी चाहिए और अपने फटे कपड़ों को लेकर राजनीतिक हमदर्दी कबाड़ सकने का माद्दा भी चाहिए।
यही भी सचाई है कि आज राजनीति में ज्यादातर बड़े नेता इस तरह गालियां खाने अथवा उसे पचा जाने की ‘पॉवर ऑफ एटर्नी’ अघोषित तौर पर किसी न किसी को दिए ही रहते हैं। बल्कि यूं कहें कि ये ‘पावर ऑफ एटर्नी’ किसी न किसी को लेनी ही पड़ती है। क्योंकि कई बार किसी आला नेता के सार्वजनिक बयान, जो कितने ही अतार्किक या मूर्खतापूर्ण क्यों न हों, की व्याखा करने और उसे उचित ठहराने का नैतिक दायित्व अमूमन उन प्रवक्ताओं अथवा समर्थक नेताओं कार्यकर्ताओं का होता है, जो किसी भी दल में होते ही इसीलिए हैं।
ताकि पार्टी में शीर्ष स्तर के मुखारविंद से जो और जैसा कहा गया है, उसकी कुतर्कीय व्याख्या अथवा संदर्भ से परे विवेचना करने का कौशल दिखाया जाए। यही गतकेबाजी किसी भी राजनीतिक ‘पावर ऑफ एटर्नी’ का वांछित गुणधर्म है।
इसके पीछे मान्यता यही है कि जो एक बार कह दिया गया है, वो सौ टंच सही है और अकाट्य है। अगर आप उसकी काट पेश भी करना चाहते हैं तो आपको उससे बड़ा विवादित और मूर्खतापूर्ण बयान देकर सुर्खियां जुटानी होंगीं।
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