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महात्मा गांधी ने दुनिया को नैतिकता का नया आधार दिया

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गांधी के जीवन का एक भी क्षण ऐसा नहीं रहा जिसमें उन्होंने लोगों से घृणा का भाव रखा हो। - फोटो : social media
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विनय, शांति, दया और आम-जनमानस के विचारों के प्रति आदर, लोगों को समझने की शक्ति और सत्य के प्रति भक्ति भाव से भरपूर महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर सन् 1869 में (पिता) करमचंद गांधी और (माता) पुतलीबाई के घर हुआ था। बचपन से ही उनके कोमल मन में सत्य, अहिंसा और असमानता से जूझते कई प्रश्न उठते थे, जिनका हल वे स्वयं ही ढूंढ़ने का प्रयास करते।

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उनके इन्हीं प्रयासों का परिणाम था कि आगे जाकर न सिर्फ उन्होंने भारत को आजाद कराया बल्कि जीवन के हर पहलुु को चाहे वह राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक हो या धार्मिक उसे नैतिकता का नया आधार दिया। सत्य का गांधी से गहरा नाता है।


सत्य और गांधी एक दूसरे के पर्याय ही समझ आते हैं। गांधी की जीवनी सत्य के प्रयोग पर नजर डाले तो ऐसे कई घटनाक्रम हैं, जिनमें गांधी सत्य में और सत्य गांधी में समाया हुआ नजर आएगा। यहीं नहीं गांधी से जब कोई व्यक्ति असत्य बोलता, तो वह उस व्यक्ति से नाराज नहीं होते बल्कि स्वयं की कमियों को तलाशने में लग जाते।
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सत्य की कसौटी पर अजीवन वे स्वयं को कसते रहे और सत्यनारायण के सामने सत्यस्वरूप बनकर ही अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। सत्य पर आरूढ़ होना ही गांधी का सत्याग्रह है। महात्मा गांधी का सत्य के लिए आग्रह प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए था, जो शोषित था, प्रताड़ित था, परेशान था।

फिर वह परेशानी ब्रिटिश हुकूमत से हो या भारतीय साहूकारों और पूंजीपतियों से। गांधी अड़ि़ग थे, अन्याय के विरूद्ध चाहे दक्षिण अफ्रीका हो या भारत हर सरजमीं पर गांधी के जीवन में सत्य को सर्वोच्च और उत्कृष्ट स्थान प्राप्त था। जो उन्हें मोहन से महात्मा बनाता है।

गांधी के जीवन का एक भी क्षण ऐसा नहीं रहा जिसमें उन्होंने लोगों से घृणा का भाव रखा हो। उनके जीवन की पारदर्शिता मन के भीतर और बाहर एक समान थी। उनकी वाणी में संयम और प्रेम था। इसलिए आज भी दुनिया महात्मा गांधी के जीवन से प्रेरणा लेती है।  

गांधी ने जीवन के हर मोड़ पर मानवता की सेवा को ही अपना धर्म माना। अस्पृश्यता और असमानता को मिटाने के लिए मीलों यात्राएं कीं, असंख्य सभाएं कीं, लोगों से हृदय परिवर्तन की अपील की, किसानों और मजदूरों की लड़ाई लड़ी।

लोगों को संगठित करके अंग्रेजी हुकूमत के विरूद्ध कई आंदोलन किए। उनकी वाणी में गजब का जादू था। जिस स्थान पर ब्रिटिश हुकूमत भी अपने लश्कर के साथ जाने में कतराती थी, वहां गांधी बे-खौफ अकेले जाते थे। भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने का उनका प्रयास निरंतक जारी रहा।

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गांधी जानते थे कि महामारी का प्रकोप बहुत ज्यादा है...

गांधी कहते थे कि ’उन्हें भारत की हर चीज आकर्षित करती है। - फोटो : social media
उनका कहना था कि ’मैं यह चाहता हूं कि यदि मेरी मृत्यु हो तो हिंदुओं और मुसलमानों को एक करने के प्रयत्न में ही हो। मुझे अपने जीवन में दो काम करने की अति प्रबल इच्छा है- इन दोनों में एकता और सत्याग्रह।’ कमाल की शख्सियत थी राष्टृपिता महात्मा गांधी की।    

सन् 1918 में जब दुनिया स्पेनिश फलू के खौफ से डरी-सहमी थी। गांधी खेड़ा में किसानों की बर्बाद फसल और ब्रिटिश हुकूमत के थोपे गए टैक्स को कम करने की जंग लड़ रहे थे। जबकि बीमारी का प्रकोप गुजरात में जोरों पर था।

महामारी ने गुजरात के पथराड़ा गांव में सबसे ज्यादा कहर बरपाया था। जहां उनके बेटे हरिलाल की पत्नी और बडे बेटे की महामारी से मृत्यु हो गई थी। कस्तूरबा गांधी अपने तीन पोते-पोतियों को लेकर आश्रम चली आई, जहां उनका पालन-पोषण किया।

गांधी जानते थे कि महामारी का प्रकोप बहुत ज्यादा है। जिससे ब्रिटिश हुकूमत के हाथ पांव फूल गए थे, लेकिन उनके लिए किसानों के शोषण को रोकना सर्वोपरी था। जिसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजों को उनके आगे झुकना ही पड़ा।

महामारी का प्रकोप लगभग दो वर्षों तक रहा लेकिन इस दौरान गांधी कभी भी रूके नहीं और न ही थकें, इतिहास इस बात की गवाही देता है। उनके आंदोलन लगातार चलते ही रहे। रोलेट एक्ट, जलियावाला बाग से लेकर असहयोग आंदोलन तक उस दौरान के महात्वपूर्ण आंदोलनों में नजर डालें तो गांधी कभी रूके नहीं। साथ ही लोगों को साफ-सफाई से रहने के लिए लगातार आग्रह करते रहे।  
गांधी नवजीवन में कहते हैं कि ’मैं भारत को स्वतंत्र और बलवान बना देखना चाहता हूं, ताकि वह दुनिया के भले के लिए स्वेच्छापूर्वक अपनी पवित्र आहुति दे सके। शुद्ध व्यक्ति कुटुम्ब के लिए, कुटुम्ब गांव के लिए, गांव जिले के लिए, जिला प्रान्त के लिए, प्रांत राष्टृ के लिए और राष्टृ सारे मानव-समाज के लिए अपना बलिदान करता है।’  

गांधी कहते थे कि ’उन्हें भारत की हर चीज आकर्षित करती है। सर्वोच्च आकांक्षाएं रखने वाले किसी व्यक्ति को अपने विकास के लिए जो कुछ चाहिए, वह सब उसे भारत में मिल सकता है।’ निसंदेह गांधी की आत्मीयता समाज के हर तबके के व्यक्ति के लिए एक समान थी। उनके सत्य अहिंसा और शान्ति के प्रयोगों ने दुनिया को नैतिकता का नया आधार दिया।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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