परिवार को सीमित रखने का यह राजनीतिक आग्रह देश में इमर्जेंसी के दौरान सरकारी दुराग्रह में बदल गया।
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आखिर कांग्रेस कहां खड़ी है इस समय?
इसी आकाशगंगा में कांग्रेस के राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की हैसियत उस सितारे जैसी है, जिसकी चमक अभी बाकी है। इन परिवारजन्य नेताओं के राजनीतिक आग्रहों में विचारधारा के साथ-साथ यह भाव भी शिद्दत से शामिल हैं कि लीडर बनने का अधिकार उन्हें आनुवांशिक रूप से मिला है। या यूं कहें कि उनका अवतरण ही इसलिए हुआ है कि वो जनता के वोटों के सहारे सत्ता हासिल करें और उसका उपभोग करते हुए अपनी अगली पीढ़ी को इस दैवी दायित्व को वहन करने के लिए अभी से तैयार करें।
इस मामले में भाजपा का परिवारवाद थोड़ा अलग है। वहां बहुत से ऐसे लोग भी हैं, जो परिवार रखते ही नहीं या रखते भी हैं तो सन्यस्त भाव से उससे विलग हो जाते हैं। गहराई से देखें तो भाजपा में परिवारवाद ‘पैतृक सेवावाद’ के रूप में है। यानी जो पार्टी की दशकों से सेवाकर कर रहा है और किसी बड़े नेता का पुत्र या पुत्री है तो परिवारवाद का महाप्रसाद उसके लिए आरक्षित है।
बहरहाल, बात राजनीतिक परिवारवाद की। दिलचस्प यह है कि जिस जमाने में भारतीय राजनीति पर परिवारवाद हावी नहीं था, उस वक्त देश में परिवार नियोजन की खूब बात होती थी। तब देश की आबादी आज की तुलना में आधी भी नहीं थी, लेकिन एक चिंता सत्ताधीशों और समाज को सतत् खाए जाती थी कि देश की आबादी इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो न जाने क्या होगा? कितने हाथों को काम मिलेगा और कितने पेट को रोटी मिल सकेगी, इसीलिए परिवार की अच्छी तरह से परवरिश करनी है तो परिवार छोटा रखो। यानी ‘हम दो हमारे दो।’ इस नियोजित परिवार के आग्रह का एक प्रतीक चिन्ह भी हुआ करता था ‘लाल तिकोन।‘ कवि बालकवि बैरागी ने तो उस पर कविता भी रची थी ‘ गुदनवारे गोद दे रे लाल तिकोना, लाल तिकोना तो है रे मेरा सलोना।‘
परिवार को सीमित रखने का यह राजनीतिक आग्रह देश में इमर्जेंसी के दौरान सरकारी दुराग्रह में बदल गया। इसे चलाने वाले इंदिरा गांधी और संजय गांधी सत्ता से बेदखल हो गए। उसी के साथ परिवार को नियोजित रखने के कार्यक्रम का उत्साह भी ठंडा होता गया। बाद में इसे चलाने वाले विभाग का नाम भी परिवार कल्याण विभाग हो गया। देश की आबादी अपनी रफ्तार से बढ़ती रही और परिवारवादी पार्टियां भी।
अब आलम यह है कि हर व्यक्ति अपनी एक छोटी पार्टी बनाता है और उसे प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाने लगता है। उसका नियंता वह स्वयं और बाद में उसकी संताने इसका चार्ज ले लेती हैं। मतदाता के पास इतना ही विकल्प रहता है कि वह इस परिवार को चुने या उस परिवार को।
आज जब हम दुनिया की सर्वाधिक आबादी वाले और सबसे ज्यादा परिवारवादी पार्टियों के देश हैं तब परिवारवाद का अर्थ पूरी तरह से राजनीतिक हो गया है। जब कोई यह कहता है कि ‘फलां फलां मेरा परिवार है’ तो राजनीति की डिक्शनरी में उसका अर्थ ‘वोट परिवार’ से होता है। अर्थात् इतने वोट मेरे या मेरी पार्टी के खाते में हैं।
मैं इस अकाउंट को प्लस करता जाऊंगा। या यूं समझे कि जब किसी व्यक्ति पर परिवार को लेकर सियासी हमला होगा तो वह जवाब में परिवार का व्यापक वोटपूंजीकरण कर डालेगा। ताकि सत्ता का प्रति शेयर भाव बढ़ता रहे। इसीलिए जब लालू प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर परिवार को लेकर व्यक्तिगत हमला करते हैं तो मोदी देश को ही अपना परिवार बताने में देरी नहीं करते।
इसी तरह चूंकि नीतीश कुमार की दौड़ बिहार तक ही है, इसलिए वो बिहार को अपना परिवार बताते हैं। यानी यहां परिवार की हदें भौगोलिक सीमाएं तय करती हैं। ऐसे में कोई पंच भी अपने पंचायत हल्के को अपना ‘परिवार’ कह सकता है। यह अधिकार उसने स्वत: अर्जित कर लिया है बावजूद इसके कि खुद उसके परिजन उसे इस योग्य माने न मानें।
कुल मिलाकर अब सत्तावाद परिवारवाद की नई शक्ल में है। चाहे इसका हो या उसका हो। वह सत्ता हासिल करने का कारण भी है और सत्ता से बेदखल करने का कारण भी है। वह जन्मना अधिकार भी है और जनसंख्या जनित विशेषाधिकार भी है। वह वोटों के जोड़ में सम संख्या भी है और वोट छीनने के लिए विषम भाव भी है। परिवारवाद अगर सत्ता दिलाता है तो सौभाग्य का सिंदूर है और यदि इसी कारण से सत्ता जाती है तो वह वैधव्य की चूडि़यां हैं।
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