यशवंत राव चव्हाण समिति की रिपोर्ट में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भूपेश गुप्ता ने जो नोट लिखा है, वह कांग्रेस की अवसरवादी राजनीति को अच्छे से बेनकाब करता है।
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1967 में संविद (संयुक्त विधायक दल) सरकार की सफलता के बाद बड़े पैमाने पर कांग्रेस छोड़कर विधायक विरोधी दलों में शामिल होने लगे, तब कांग्रेस सरकार ने यशवंत राव चव्हाण के नेतृत्व में दल बदल के बारे में एक समिति का गठन किया।
इस समिति का गठन लोकसभा में दल-बदल के संदर्भ में पारित एक प्रस्ताव के चलते हुआ। फरवरी 1967 से मार्च 1968 के बीच 12 महीने की समयावधि में कुल 438 विधायकों ने दल बदल कर लिया। तब कांग्रेस की आंखें चौंधियाई। यशवंत राव चव्हाण समिति की रिपोर्ट में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भूपेश गुप्ता ने जो नोट लिखा है, वह कांग्रेस की अवसरवादी राजनीति को अच्छे से बेनकाब करता है।
1967 तक जो दल-बदल हो रहे थे, इसका लाभ कांग्रेस को मिल रहा था। किंतु चौथे आम चुनाव के बाद विविध राज्यों में कांग्रेस की पराजय के बाद दल-बदल कर कांग्रेसी विधायक विपक्षियों के साथ सरकार बनाने लगे। 1967 के बाद जिन विधायकों ने पाला बदला था, उनमें सात राज्यों के 210 विधायक शामिल थे, जिनमें से 116 मंत्री बन गए थे। संकेत साफ था कि सरकार बनाने के लिए मंत्री पद का लोभ विधायकों को पाला बदलने के लिए प्रेरित कर रहा था।
1970 के दशक में पहले कांग्रेस ने और बाद में जनता पार्टी की सरकार ने पहली बार दल-बदल प्रतिबंधक कानून बनाने पर विचार करना प्रारंभ किया। हालांकि, 1979 में कांग्रेस ने जनता पार्टी में फूट डालकर मोरारजी देसाई की सरकार गिरा दी। चौधरी चरण सिंह को कुछ काल के लिए प्रधानमंत्री पद से पहले नवाजा और फिर उनकी सरकार से समर्थन वापस खींचकर उन्हें अपदस्थ कर दिया।
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर ने कांग्रेस को जबरदस्त बहुमत लोकसभा में प्रदान किया, जिसके बूते राजीव गांधी की सरकार ने 1985 में पहली बार संसद में दल-बदल विरोधी कानून पारित करने में सफलता प्राप्त की।
अब किसी भी विधानसभा या लोकसभा में विधायक दल या संसदीय दल में विभाजन के लिए एक तिहाई सदस्यों का साथ आना आवश्यक था। इसके बाद भी राजीव गांधी ने स्वयं विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार और चंद्रशेखर की सरकार को गिराने का खेल खेला। तमिलनाडु की विधानसभा में एक तिहाई विधायक दल के नियम की धज्जी स्वयं विधानसभा अध्यक्ष ने 1987 में उड़ाई।
जो शरद पवार इन दिनों दो-तिहाई विधायक दल के अजीत पवार के साथ जाने के बावजूद महाराष्ट्र के विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के फैसले को अलोकतांत्रिक करार दे रहे हैं, वही 1991 में एक तिहाई की तुलना में कम विधायक होने के बावजूद शिवसेना से अलग हुए छगन भुजबल के नेतृत्व वाले 12 विधायकों को तत्कालीन महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष मधुकर राव चौधरी के फैसले को संविधान के अनुकूल बता रहे थे। तमाम विधानसभाओं के ऐसे दर्जनों मामले हैं जिसमें विविध विधानसभाओं के विविध अध्यक्षों ने एक तिहाई और दो तिहाई के मानक की धज्जियां उड़ाई हैं।
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने अलग विधायक दल के लिए दो तिहाई का मानक तय किया। बावजूद इसके ऐसे तमाम उदाहरण हैं जिसमें विधायक दल की तोड़फोड़ को संविधान सम्मत ठहराया गया। अब कांग्रेस और उसके बगलबच्चा दल आए दिन गच्चा खा रहे हैं, इसलिए उनके लोकतंत्र और संविधान की परिभाषा आजकल बदली-बदली नजर आ रही है।
लेखक भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।
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