महाभारत काल में पुत्र मोह में अंधे हुए राजा धृतराष्ट्र और मित्र प्रेम में लाचार हुए सुदामा कभी आपस में मिले थे, इसका कोई पौराणिक जिक्र भले न हो, लेकिन कलियुग में यह भेंट संभव हुई है। न केवल संभव हुई बल्कि इस डायलॉग के साथ हुई कि सुदामा तुम तय कर लो कि तुम्हें सुदामा ही रहना है या फिर धृतराष्ट्र बनना है। इस संवाद में चेतावनी भी है और धमकी भी। चेतावनी इस बात की कि गरीब सुदामा को कभी सम्राट धृतराष्ट्र बनने का ख्वाब नहीं देखना चाहिए और धमकी इस बात की कि अगर तुमने सुदामा की औकात से बाहर निकलने की कोशिश की तो राजनीतिक आख्यानों में भले तुम्हे अमरत्व हासिल हो जाए, लेकिन सियासी जिंदगी में तुम्हारी भू्णहत्या भी हो सकती है।
द्वापर युग का यह समूचा संदर्भ (पौराणिक स्रोतों के अनुसार) वर्तमान कलियुग के 5126 वें वर्ष में लोकतांत्रिक भारत में हो रहे 18 वीं लोकसभा चुनाव के पहले चरण में होने वाले छिंदवाड़ा लोकसभा सीट पर चुनाव जीतने के उद्देश्य से दो नेताओं के बीच हुए संवाद का है।
संवाद कहने के बजाए उसे एकालाप कहना ज्यादा उचित होगा। मीडिया में आई रिपोर्टों को सही मानें तो जो नैतिक डायलॉग बोला गया वो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ का था, जो दूसरी बार अपने पुत्र को छिंदवाड़ा से लोकसभा में भेजने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं तो दूसरी तरफ चार दशकों से कमलनाथ के सेवक रहे दीपक सक्सेना हैं, जो आर्थिक रूप से भले ही गब्बर बन गए हों, लेकिन राजनीतिक रूप से सुदामा ही रहे।
सुदामा होना केवल आर्थिक असमानता का प्रतिफल ही नहीं है बल्कि ऐसा भाग्यफल भी है, जिसमें लक्ष्मी और सत्ता सुंदरी दोनों गठबंधन कर याचक को ठेंगा दिखाती रहतीं हैं। दीपक सक्सेना नामक पात्र की सियासी ट्रेजेडी यही है कि तमाम वफादारियों के बाद भी उनके हिस्से में दरी उठाने का काम ही आया है। उनका कमलनाथ भक्त होना ही मानो इस राजनीतिक अभिशाप का कारण है। लिहाजा इस चुनाव में उन्होंने कमलनाथ से नाल तोड़कर कमलदल से जोड़ने की जुर्रत की तो बदले में उलाहना मिला कि धृतराष्ट्र बनने की कोशिश भी न करना।
इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि एक हस्तिनापुर में एक ही धृतराष्ट्र रह सकता है। या यूं कहें कि पुत्र मोह पालने का विशेषाधिकार भी उन्हीं को है, जो सत्ता सम्पन्न हैं। सत्ता में जमे हुए हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी जमे रहना चाहते हैं। यह जनता का पुनीत कर्तव्य है कि वह एक पीढ़ी के इन्वेस्टमेंट पर कई नस्लों को राजनीतिक लाभांश देती रहे। राजनेताओं के लिए अपने पुत्र/पुत्री/ पत्नी आदि के सियासी कॅरियर के आगे हर शै बेमानी है। कोई सुदामा अगर उसे चु्नौती देने की धृष्टता करेगा भी तो वह आंखों के साथ हाथ- पैरों से भी हाथ धो बैठेगा।
यूं तो धृतराष्ट्र और सुदामा की कहानी में कहीं कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। ये सारा ताना बाना उस कूटनीतिज्ञ और भगवान कृष्ण के माध्यम से है, जो धृतराष्ट्र को पुत्र मोह से बचने की समझाइश देते हैं और नाकाम रहते हैं दूसरी तरफ सुदामा को दोस्ती का वास्ता देकर भौतिक आकांक्षाओं को तृप्त करने की कोशिश करते हैं।
पुराणों में सुदामा के पिता का तो उल्लेख है कि वो राक्षसराज शंखचूड़ के पुत्र थे। शंखचूड़ को ब्रह्मा से अमरत्व का वरदान था। लेकिन सुदामा के पुत्रों का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। चूंकि सुदामा राजनेता नहीं थे, इसलिए उनके पुत्रो के राजनीतिक और आर्थिक भविष्य की चिंता करने की गरज पुराणकारों को भी महसूस नहीं हुई होगी।
ब्राह्मण सुदामा मूलत: उस समाजवादी सोच की उपज थे, जिसमें अमीरी के बजाए गरीबी के समान वितरण पर ज्यादा जोर रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि दीपक सक्सेना के भाग्य में सुदामा होना ही बदा है। द्वापर युग में योगीराज कृष्ण ने अपने इस बाल मित्र को दोस्ती की खातिर जो कुछ माल- ताल दे दिया, उसे सुदामा को अपना सौभाग्य समझ कर संतुष्ट रहना चाहिए। इससे ज्यादा की उम्मीद पालना भी अपने आप में राजनीतिक अपराध है। आखिर नौकर, नौकर है और मालिक, मालिक।