वास्तुकला का बेजोड़ नमूना गुरुराम राय दरबार
मंदिर का केंद्रीय परिसर बाबा राम राय की मृत्यु के बारह साल बाद 1699 में पूरा हुआ और संपूर्ण संरचनात्मक कार्य 1703 और 1706 के बीच समाप्त हो गया। माना जाता है कि अलंकरण और पेंटिंग का काम संरचनात्मक पूरा होने के बाद भी लंबे समय तक जारी रहा। बाबा राम राय की पत्नी माता पंजाब कौर ने निर्माण कार्य की देखरेख की और 1741-42 में अपनी मृत्यु तक दरबार के मामलों का प्रबंधन किया।
किलानुमा गुरु राम राय दरबार की प्राचीर के चारों तरफ प्रवेश द्वार खुलते हैं और उनके ऊपर मीनारें बनीं हैं। पश्चिमी छोर पर विशाल फाटक के सामने सफेद सीढ़ीनुमा गोल चबूतरा नजर आता है । इसी चबूतरे पर खड़ा है आस्था का वह प्रतिबिंब है, झण्डा साहिब।
गुरु रामराय महाराज ने 1699 में धामावाला में झंडा दरबार की स्थापना की। यह मुगल वास्तुकला की अनूठी प्रतिकृति है, जिसे 1707 में उनकी चार में से सबसे छोटी पत्नी पंजाब कौर ने भव्यरूप प्रदान किया। चित्रकार की अनूठी कृति दरबार साहिब के महराबों पर अंकित फूल-पत्तियां, पशु-पक्षी, वृक्ष, ऊंची नासिका वाले एक जैसे चेहरे, बड़े नेत्र और उनकी रंग योजना कांगड़ा-गुलेर और मुगल शैली के मिश्रण हैं। ऊंची मीनारें और गोल बुर्ज मुस्लिम वास्तुकला के ऐसे नमूने हैं।
दरबार साहिब और उसके चारों ओर बसा झंडा मोहल्ला वर्तमान देहरादून का मूल है। इसमें एक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक परंपरा समाहित है जो देहरादून में पनपी और पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, हिमाचल व दिल्ली तक फैल गई।
गढ़वाल नरेश और गोरखों का युद्ध देखा इस झंडे ने
अतीत के गवाह इस झण्डा साहब ने 1804 में इसी के पास खुड़बुड़ा में गोरखों और गढ़़वाल नरेश का तुमल संग्राम देखा जिसमें हाथी पर सवार महाराजा प्रद्युम्न शाह की आंख में गोली लगने से वह शहीद हो गए और गढ़वाल राज्य अग्रेजों के अधीन हो गया।इसने फिर 10 साल बाद खलंगा का युद्ध देखा जिसमें गोरखा जनरल बलभद्र बड़ी बहादुरी से तो लड़ा मगर अन्ततः अग्रेजों ने उसे खलंगा का दुर्ग छोड़ कर पंजाब की ओर भाग जाने पर विवश कर दिया।
दुर्ग के पतन के बाद गढ़वाल गोरखों के अत्याचारी शासन से मुक्त हुआ। बलभद्र के बचेखुचे गोरखा सैनिक खलंगा दुर्ग से बच कर निकले तो फिर सिखों के साथ मिल गए। गोरखा राज के पतन के बाद इस झण्डा साहिब ने गढ़वाल के नए राजा सुदर्शन शाह को गद्दीनसीं होते तो देखा मगर उसका आधा गढ़वाल देहरादून समेत अंग्रेजों के पास चला गया।
दरअसल ईस्ट इंडिया कंपनी ने गोरखा आंग्ल युद्ध में गोरखा कमांडर बलभद्र सिंह को 1815 में खलंगा दुर्ग से भगाकर 1816 में देहरादून समेत गढ़वाल राज्य के एक हिस्से को अपने अधीन कर देहरादून को सुप्रीटेंडेंट के तौर पर फेड्रिक जे. शोर के हवाले कर देहरादून को 1819 में सहारनपुर जिले में मिला दिया था। सन् 1975 में देहरादून को गढ़वाल कमिश्नरी में मिला दिया गया।
देहरादून के बाद अंग्रेजों ने मसूरी खोजी और वहां अपनी बसागत बना ली। इस प्रकार देहरादून जिले पर लंबे समय तक अंग्रेजों का प्रभाव रहा। अन्ततः नब्बे के दशक का वह प्रचण्ड उत्तराखण्ड आन्दोलन भी देखा जिसके आगे भारत सरकार को झुकना पड़ा और उत्तर प्रदेश का विभाजन कर उत्तराखण्ड राज्य बनाना पड़ा जिसकी अस्थाई राजधानी भी देहरादून ही बनी।
दरबार साहिब की परंपरा के महंत महंत
औददास (1687-1741) महंत हरप्रसाद (1741-1766)महंत हरसेवक (1766-1818) महंत स्वरूपदास (1818-1842) महंत प्रीतमदास (1842-1854) महंत नारायणदास (1854-1885) महंत प्रयागदास (1885-1896) महंत लक्ष्मणदास (1896-1945) महंत इंदिरेशचरण दास (1945-2000) महंत देवेंद्र दास (25 जून 2000) से गद्दीनसीन।
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