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झंडा मेला: भीषण युद्ध और तख्त बदलते देखे गुरुराम राय के झण्डे ने

सार

ऐसा माना जाता है कि गुरु राम राय के इस डेरे से देहरादून का नामकरण हुआ। ’दून’ घाटी में ’डेरा’ यानि कि शिविर होने से इस स्थान का नाम ‘’डेरा दून’’ पड़ा जो कालान्तर में देहरादून हो गया। कुछ विद्वान इसका नाम द्रोणाचार्य की तपस्थली के रूप में मानते हैं,  इसीलिए इस अवसर को लोग देहरादून का जन्मदिन भी मानते हैं।
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झंडा मेला देहरादून - फोटो : JaiSingh Rawat
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विस्तार
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उदासीन पन्थ की परम्परानुसार होली के ठीक पांचवें दिन गुरुराम राय दरबार में आरोहण के साथ ही झण्डा साहिब एक बार फिर पूरी शानों-शौकत से लहरा गया। यह ऐतिहासिक झण्डा न केवल देहरादून में गुरु रामराय के डेरे की स्थापना का प्रतीक है बल्कि देहरादून के जीवनकाल के 348 सालों के इतिहास का भी जीता जागता गवाह है।

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इन सैकड़ों सालों में इस झण्डे ने गढ़वाल नरेश की शहादत के साथ ही गोरखों के राज और फिर गोरखों के पतन के साथ ही अग्रेजों की हुकुमत भी देखी है। उदासीन संप्रदाय का यह परचम उत्तराखण्ड आन्दोलन के बाद नए राज्य के जन्म का गवाह बना।

उदासीन पंथ का कुंभ है झंडा मेला

उत्तराखण्ड की अस्थाई राजधानी स्थित गुरु रामराय दरबार में होली के पांचवें दिन दरबार के दसवें महन्त देवेन्द्र दास द्वारा झण्डारोहण के साथ ही उत्तर भारत का विख्यात झण्डा मेला भी शुरू हो गया। यह मेला न केवल देहरादून में गुरु राम राय के डेरे की स्थापना की जयन्ती है बल्कि देहरादून शहर की स्थापना का भी समारोह है जिसका दूनवासी सालभर से इन्तजार करते हैं।

इसने देहरादून के खुड़बुड़ा में रामराय के डेरे की स्थापना के बाद की तीन सदियों में कई उतार चढ़ाव और कई तख्त बदलते देखे हैं। इस अवसर पर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश समेत उत्तर भारत के उदासीन पंथ श्रद्धालु हजारों की संख्या में एकत्र होकर विशालकाय पवित्र झंडा जी के आरोहण के साक्षी बनने के साथ ही झंडे पर वस्त्र और भेंट चढ़ाते हैं।

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सिखों के सातवें गुरू के जेष्ठ पुत्र थे राम राय

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार औरंगजेब के दरबार में हाजिर होने पर अपने पिता और सिखों के सातवें गुरु हर राय द्वारा घर से बेदखल किए जाने पर जब राम राय घर छोड़ कर नए ठिकाने के लिए यात्रा पर निकले थे तो वह लाहौर पहुंचे और वहां से अवध और आगरा होकर देहरादून के खुड़बुड़ा में ठहरे। इस दरबार की  स्थापना बाबा राम राय ने 17वीं शताब्दी के मध्य में तब की थी, जब उन्हें मुगल बादशाह औरंगजेब के सामने अपने पवित्र ग्रंथ में एक शब्द की समुदाय द्वारा अस्वीकृत व्याख्या करने के लिए निर्वासित होना पड़ा था।

माना जाता है कि औरंगजेब के हमले से बचने के लिए उसके समक्ष अपने ग्रंथ में उल्लिखित ‘‘मुसलमान’’ शब्द को बदल कर ‘आस्था विहीन’ कर दिया था। इतिहासकारों के अनुसार औरंगजेब से अच्छे संबंधों के चलते उन्हें इस स्थान पर गढ़वाल नरेश से जमीन आदि सुविधाएं मिली। गुरुराम राय दरबार परिसर में मुगलकालीन स्थापत्य आज भी देखा जा सकता है।

देहरादून का नामकरण रामराय के डेरे से

बाद में उन्होंने आचार्य श्रीचन्द के शिष्य बालू हसना से उदासीन पन्थ की दीक्षा ली और यहीं तपस्या करने लगे। कहा जाता है कि गुरु राम राय ने इसी दिन चैत्र माह की पंचमी को सन् 1676 में वर्तमान झण्डा साहिब के स्थान पर झण्डा गाढ़ कर अपना डेरा जमा दिया था। बाद में औरंगजेब ने गढ़वाल नरेश फतेहशाह को राम राय को हर सम्भव मदद करने का आदेश दिया। इस मुगल फरमान पर राजा ने गुरु राम राय को 7 गांव जागीर में दिए। ये 7 गावं आज एक महानगर देहरादून के रूप में विकसित हो गए।

ऐसा माना जाता है कि गुरु राम राय के इस डेरे से देहरादून का नामकरण हुआ। ’दून’ घाटी में ’डेरा’ यानि कि शिविर होने से इस स्थान का नाम ‘’डेरा दून’’ पड़ा जो कालान्तर में देहरादून हो गया। कुछ विद्वान इसका नाम द्रोणाचार्य की तपस्थली के रूप में मानते हैं,  इसीलिए इस अवसर को लोग देहरादून का जन्मदिन भी मानते हैं। 

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वास्तुकला का बेजोड़ नमूना गुरुराम राय दरबार

मंदिर का केंद्रीय परिसर बाबा राम राय की मृत्यु के बारह साल बाद 1699 में पूरा हुआ और संपूर्ण संरचनात्मक कार्य 1703 और 1706 के बीच समाप्त हो गया। माना जाता है कि अलंकरण और पेंटिंग का काम संरचनात्मक पूरा होने के बाद भी लंबे समय तक जारी रहा। बाबा राम राय की पत्नी माता पंजाब कौर ने निर्माण कार्य की देखरेख की और 1741-42 में अपनी मृत्यु तक दरबार के मामलों का प्रबंधन किया।

किलानुमा गुरु राम राय दरबार की प्राचीर के चारों तरफ प्रवेश द्वार खुलते हैं और उनके ऊपर मीनारें बनीं हैं। पश्चिमी छोर पर विशाल फाटक के सामने सफेद सीढ़ीनुमा गोल चबूतरा नजर आता है । इसी चबूतरे पर खड़ा है आस्था का वह प्रतिबिंब है, झण्डा साहिब।

गुरु रामराय महाराज ने 1699 में धामावाला में झंडा दरबार की स्थापना की। यह मुगल वास्तुकला की अनूठी प्रतिकृति है, जिसे 1707 में उनकी चार में से सबसे छोटी पत्नी पंजाब कौर ने भव्यरूप प्रदान किया। चित्रकार की अनूठी कृति दरबार साहिब के महराबों पर अंकित फूल-पत्तियां, पशु-पक्षी, वृक्ष, ऊंची नासिका वाले एक जैसे चेहरे, बड़े नेत्र और उनकी रंग योजना कांगड़ा-गुलेर और मुगल शैली के मिश्रण हैं। ऊंची मीनारें और गोल बुर्ज मुस्लिम वास्तुकला के ऐसे नमूने हैं।

दरबार साहिब और उसके चारों ओर बसा झंडा मोहल्ला वर्तमान देहरादून का मूल है। इसमें एक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक परंपरा समाहित है जो देहरादून में पनपी और पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, हिमाचल व दिल्ली तक फैल गई। 

गढ़वाल नरेश और गोरखों का युद्ध देखा इस झंडे ने

अतीत के गवाह इस झण्डा साहब ने 1804 में इसी के पास खुड़बुड़ा में गोरखों और गढ़़वाल नरेश का तुमल संग्राम देखा जिसमें हाथी पर सवार महाराजा प्रद्युम्न शाह की आंख में गोली लगने से वह शहीद हो गए और गढ़वाल राज्य अग्रेजों के अधीन हो गया।इसने फिर 10 साल बाद खलंगा का युद्ध देखा जिसमें गोरखा जनरल बलभद्र बड़ी बहादुरी से तो लड़ा मगर अन्ततः अग्रेजों ने उसे खलंगा का दुर्ग छोड़ कर पंजाब की ओर भाग जाने पर विवश कर दिया।

दुर्ग के पतन के बाद गढ़वाल गोरखों के अत्याचारी शासन से मुक्त हुआ। बलभद्र के बचेखुचे गोरखा सैनिक खलंगा दुर्ग से बच कर निकले तो फिर सिखों के साथ मिल गए। गोरखा राज के पतन के बाद इस झण्डा साहिब ने गढ़वाल के नए राजा सुदर्शन शाह को गद्दीनसीं होते तो देखा मगर उसका आधा गढ़वाल देहरादून समेत अंग्रेजों के पास चला गया।

दरअसल ईस्ट इंडिया कंपनी ने गोरखा आंग्ल युद्ध में गोरखा कमांडर बलभद्र सिंह को 1815 में खलंगा दुर्ग से भगाकर 1816 में देहरादून समेत गढ़वाल राज्य के एक हिस्से को अपने अधीन कर देहरादून को सुप्रीटेंडेंट के तौर पर फेड्रिक जे. शोर के हवाले कर देहरादून को 1819 में सहारनपुर जिले में मिला दिया था। सन् 1975 में देहरादून को गढ़वाल कमिश्नरी में मिला दिया गया।

देहरादून के बाद अंग्रेजों ने मसूरी खोजी और वहां अपनी बसागत बना ली। इस प्रकार देहरादून जिले पर लंबे समय तक अंग्रेजों का प्रभाव रहा। अन्ततः नब्बे के दशक का वह प्रचण्ड उत्तराखण्ड आन्दोलन भी देखा जिसके आगे भारत सरकार को झुकना पड़ा और उत्तर प्रदेश का विभाजन कर उत्तराखण्ड राज्य बनाना पड़ा जिसकी अस्थाई राजधानी भी देहरादून ही बनी।

दरबार साहिब की परंपरा के महंत महंत

औददास (1687-1741) महंत हरप्रसाद (1741-1766)महंत हरसेवक (1766-1818) महंत स्वरूपदास (1818-1842) महंत प्रीतमदास (1842-1854) महंत नारायणदास (1854-1885) महंत प्रयागदास (1885-1896) महंत लक्ष्मणदास (1896-1945) महंत इंदिरेशचरण दास (1945-2000) महंत देवेंद्र दास (25 जून 2000) से गद्दीनसीन।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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