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जीवन को सकारात्मक रखें, नजरिया बदलें और अपने कार्य को लगन से करते चलें

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हमने देखा है इंसान ज्यादातर अपने दैनिक कार्यों में भी दो नजरियों को अपने साथ रखता है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
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हमने देखा है इंसान ज्यादातर अपने दैनिक कार्यों में भी दो नजरियों को अपने साथ रखता है, पहला जीत और दूसरा हार। अब चाहे उसने घर में भाग कर टीवी का रिमोट ही क्यू ना पहले ढूंढ लिया हो वो उसको अपनी जीत समझ लेता है और दूसरे की हार। इस तरह जब तक उसकी जीत होती रहती है तब तक तो ये नजरिया ठीक चलता रहता है पर जैसे ही वो हारता है, बस तभी से उसको अपनी हार से ज्यादा दूसरे की जीत हतोउत्साहित करने लगती है।
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ऐसे में कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है इससे पहले की ये नजरिया आपके व्यवहार और आदत का हिस्सा बन जाए।
  •     हार और जीत से ऊपर उठिए।
हर काम को करने से पहले उसमें हार या जीत का ना सोचकर उस कार्य को कैसे सबसे बेहतर तरीके से किया जा सकता है उस पर ध्यान दें। अपना समय अपने आप से बेहतर तरीके से कार्य करवाने में जाया करे ,ना की ऐसा सोचने में कि कोई ओर उसको कैसे करेगा या फिर वो जीत गया तो क्या? बेवजह के सवालों को नजरंदाज करने की कोशिश करेंं।
  •     सबसे पहले कार्य को पूरा समझेंं।
जब कभी भी कुछ करना शुरू करेंं सबसे पहले उसके बारे में पूरी तरह रिसर्च कर लें। हमें ये ध्यान रखना होगा कि किसी भी काम के प्रति जब तक पूरी समझ विकसित नहीं हो जाती और उस कार्य को क्रियान्वित नहीं कर लिया जाता तब तक उसके आखरी परिणाम को लेकर ना तो खुश हुआ जा सकता है ना दुखी।
  •    अपने आप को उस लायक समझेंं और उस ओर प्रेरित करें।
अपने आप पर विश्वास होना बहुत जरूरी है। आत्मविश्वास और अतिआत्मविश्वास के बीच का अंतर समझे ये काम को मैं बेहतर ढंग से कर सकता हूं यह विश्वास है और इस कार्य को सिर्फ मैं ही बेहतर ढंग से कर सकता हूं ये अति आत्मविश्वास है। हार और जीत के बारे में सोचकर स्वयं को प्रेरित नहीं किया जा सकता क्यूंकि फल हमारे हाथ में नहीं है पर हां अपने कर्म के प्रति समर्पण को लेकर जरूर अपने आप को प्रेरित किया जा सकता है क्यूंकि वो हमारे हाथ में है ।
  •     मन में अच्छी भावना और सकरात्मकता रखें।
हार और जीत दो हिस्सों में अपने एक विचार को बांटना आपके मन में उपस्थित सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों के बीच के असमंजस्य को दर्शाता है, कोशिश करें कि कैसे ये सकारात्मकता संपूर्ण कार्य के दौरान बनी रहे उस पर जरूर ध्यान दें। आप देख लेना आपकी अच्छी सोच आपको अच्छा ही परिणाम देगी।
  •     जीवन को सीमित मत समझिए।
अपने आपको हार जीत के दायरे में रखकर आप खुद को सीमित कर रहे हैं और ऐसा करने से आपके विचार एक सीमा के अधीन हो जाते हैं। जैसे ही आपने हार और जीत ही सब कुछ है ये मान लिया ,तो आप ये कभी नहीं समझ पाएंगे कि उससे भी जरूरी कुछ हो सकता है, वो ये हो सकता है कि हारकर भी दोबारा जीतने की उम्मीद का मनोबल बनाए रखना और जीतकर भी अपने आप को कैसी भी अन्य परिस्थितियों के लिए तैयार रखना ।

हार और जीत तो हमें उस एक कार्य के परिणामस्वरूप मिलते हैं, पर उस कार्य के दौरान जो हमें सीखने का अनुभव मिलता है वो ता-उम्र काम आता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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