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लेटरल एंट्री पर कांग्रेस और इंडी ठगबंधन का फेक नैरेटिव

सार

जहां तक लेटरल एंट्री का विषय है, ये कंसेप्ट तो कांग्रेस की यूपीए सरकार लेकर आई थी जिसमें वे सभी दल भी सहभागी थे जो आज कांग्रेस के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस के दौर में लैटरल एंट्री सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप बिलकुल भी नहीं थी और इसलिए एससी, एसटी और ओबीसी को दरकिनार कर दिया गया।
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Lateral Entry And Controversy - फोटो : वीडियो
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विस्तार
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आज कल आप ‘लेटरल एंट्री’ के बारे में इधर-उधर चर्चा सुन रहे होंगे। पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस सहित इंडी ठगबंधन के घटक दलों की ओर से आदतन इस विषय पर भी देश और जनता को गुमराह करने की एक निचले स्तर की साजिश रची जा रही है। फिर इस तरह की अफवाह भी फैलाई जा रही है कि मोदी सरकार ही आरक्षण से बचने के लिए ‘लेटरल एंट्री’ की स्कीम को लेकर आई थी और वही अब आरक्षण देने के लिए अपनी ही स्कीम से पीछे हट रही है। इस तरह की बातें एकदम से मोदी सरकार के खिलाफ फैलाए जा रहे फेक नैरेटिव प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं जिसे विपक्षी इंडी ठगबंधन हवा दे रहा है।

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एंटी-मोदी और एंटी-इंडिया सेक्शन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जनता को बरगलाने के लिए सारी नापाक चालें चल कर देख ली लेकिन वे जनता के दिलों से नरेन्द्र मोदी को जब हटा नहीं पाए तो अब वे आरक्षण पर पेपर-डिजाइंड ‘फेक नैरेटिव’ की एक सीरीज तैयार कर के आए हैं जिसका उदाहरण हमने लोक सभा चुनाव प्रचार के दौरान भी देखा, एससी-एसटी क्रीमी लेयर से संबंधित विषय पर सुप्रीम कोर्ट के सुझावों के बाद भी देखा और अब ‘लेटरल एंट्री’ वाले विषय में भी देख रहे हैं। जिन पार्टियों का इतिहास ही जातिगत राजनीति और आरक्षण के खिलाफ रहा है, आज वे इसके सबसे बड़े पैरोकार बनने का झूठा दंभ भर रहे हैं जबकि उनकी असली मंशा कुछ और ही है!

जहां तक लेटरल एंट्री का विषय है, ये कंसेप्ट तो कांग्रेस की यूपीए सरकार लेकर आई थी जिसमें वे सभी दल भी सहभागी थे जो आज कांग्रेस के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस के दौर में लैटरल एंट्री सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप बिलकुल भी नहीं थी और इसलिए एससी, एसटी और ओबीसी को दरकिनार कर दिया गया।
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हालांकि, लेटरल एंट्री का पहला और सबसे बड़ा उदाहरण तो हमें आजादी के ठीक बाद पंडित नेहरू की सरकार में ही दिख गया था जब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी बहन विजया लक्ष्मी पंडित को चार-चार देशों में भारत का राजदूत बनाया जबकि उन्होंने कोई औपचारिक स्कूली शिक्षा भी प्राप्त नहीं की थी। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भी किया। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी 1971 में लेटरल एंट्री के जरिए ही आर्थिक सलाहकार बनाए गए थे। बाद में वे वित्त मंत्री और पीएम भी बने। मंतोष सोढ़ी, सैम पित्रोदा, वी कृष्णमूर्ति, बिमल जालान, कौशिक बसु, केपीपी नांबियार, अरुणा मैरा, आईजी पटेल, अरविंद विरमानी जैसे लोगों को भी लेटरल एंट्री के जरिये ही सरकार का हिस्सा बनाया गया था। यहां तक कि कांग्रेस सरकार ने बिना किसी योग्यता के सोनिया गांधी को लेटरल एंट्री की तर्ज पर ही यूपीए सरकार में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) का अध्यक्ष बना कर प्रधानमंत्री के ऊपर बिठा दिया गया था।

यहां तक कि कांग्रेस की सोनिया-मनमोहन सरकार के दौरान गठित राष्ट्रीय सलाहकार परिषद जिसने यूपीए के दस वर्षों के दौरान शासन में सक्रिय भूमिका निभाई थी, उसमें भी कई लैटरल एंट्री थीं और उन सभी में एससी, एसटी और ओबीसी को अनदेखा किया गया। एनएसी के सदस्यों में से एक जीन ड्रेज़ थे, जिन्हें हाल ही में दिल्ली में फिलिस्तीन के समर्थन में विरोध प्रदर्शन करते देखा गया था। पूर्व आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर भी एनएसी का हिस्सा थे। इसी तरह मोंटेक सिंह अहलूवालिया, नंदन नीलेकणि और अन्य जैसे अन्य हाई प्रोफाइल लैटरल एंट्री को बिना किसी व्यवस्थागत प्रक्रिया के लिया गया। 2018 में मोदी सरकार ने यूपीएससी के माध्यम से लैटरल एंट्री को संस्थागत रूप दिया, जिससे प्रक्रिया में अपारदर्शिता दूर हुई और सिस्टम में तदर्थ प्रविष्टियों पर रोक लगी।

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Lateral Entry And Controversy - फोटो : ANI
वास्तव में, यह कांग्रेस ही है जिसने जामिया मिलिया और एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान बताकर एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के अधिकारों का हनन किया। वास्तव में, यह कांग्रेस ही है जिसने अपनी राज्य सरकारों में एक वर्ग विशेष को आरक्षण देने के लिए एससी, एसटी और ओबीसी के अधिकारों का हनन करने की साजिश रची। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश इसके उदाहरण हैं।

कांग्रेस शुरुआत से ही आरक्षण के खिलाफ है। नेहरू जी कहते थे कि अगर एससी/एसटी, ओबीसी को नौकरी में आरक्षण मिला तो सरकारी कामकाज का स्तर गिर जाएगा। अगर उस समय सरकार में भर्ती हुई होती, तो वो प्रमोशन के बाद आगे बढ़ते और आज यहां पहुंचते। 27 जून 1961 को पंडित नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख कर आरक्षण का विरोध किया था। उन्होंने 1951 में जाति जनगणना का भी विरोध किया था। इंदिरा गांधी ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। इंदिरा गांधी कहती थी - न जात पर, न पात पर, मुहर लगेगी हाथ पर। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने लोक सभा में 6 सितंबर 1990 को अपने भाषण के दौरान मंडल कमीशन पर अपनी बात रखते हुए आरक्षण का विरोध किया था।

इससे पहले 1985 में भी प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने एक इंटरव्यू में आरक्षण के खिलाफ बोला था। कांग्रेस की सरकारों ने ओबीसी आयोग को संवैधानिक मान्यता देने का निर्णय वर्षों तक लटका कर रखा। सपा की सरकार ने अध्यादेश लाकर यूपी में सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था समाप्त कर दी थी। मुख्यमंत्री रहते हुए भी अखिलेश यादव ने बयान दिया था कि समाजवादी पार्टी पदोन्नति में आरक्षण के खिलाफ है। 1990 से 2005 के दौरान 15 साल तक बिहार में राजद की लालू-राबड़ी सरकार थी लेकिन इन 15 वर्षों में अतिपिछड़ों के लिए स्थानीय निकाय में आरक्षण की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
 
नरेन्द्र मोदी सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि यूपीएससी के माध्यम से लेटरल एंट्री पारदर्शी, संस्थागत तरीके से की जाएं जो सामाजिक न्याय और आरक्षण के सिद्धांतों के अनुरूप हों। मोदी सरकार सामाजिक न्याय प्रदान करने में सबसे आगे रही है, उसी के मद्देनजर सरकार परिपत्र को फिर से संशोधित कर रही है। लेटरल एंट्री को अब तक एकल-संवर्ग पदों के रूप में नामित किया गया था और इसलिए इन नियुक्तियों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं था। मोदी सरकार अब इस कमी को भी संशोधित कर रही है और न केवल लेटरल एंट्री को एक संस्थागत प्रक्रिया बनाकर बल्कि इसमें संशोधन कर सामाजिक न्याय के सिद्धांत को भी सुनिश्चित कर रही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो सरकार में आने के साथ ही एससी, एसटी और ओबीसी के आरक्षण के पक्ष में निरंतर काम करते रहे हैं ताकि समाज के पिछले पायदान पर पहुंचे लोग विकास की मुख्यधारा में शामिल हों। पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का मामला हो, सरकारी सेवा में कार्यरत एससी एवं एसटी की प्रोन्नति का मामला हो, लोकसभा एवं विधानसभा में उनके आरक्षण की अवधि बढ़ाने का मामला हो, एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के सुझावों को मानने में असमर्थता जाहिर करना हो, स्टार्ट-अप इंडिया व स्टैंड अप इंडिया योजनाओं में दलितों-पिछड़ों को आगे बढ़ाना हो, मुद्रा योजना में ऐसे वर्गों को आगे बढ़ाना हो या सरकार की हर योजना में ऐसे वर्गों का विशेष ख़याल रखना हो - मोदी सरकार ने हमेशा एक कदम आगे बढाते हुए बाबा साहेब के सपनों को मूर्त रूप में धरातल पर उतारा है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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