Lateral Entry And Controversy
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वास्तव में, यह कांग्रेस ही है जिसने जामिया मिलिया और एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान बताकर एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के अधिकारों का हनन किया। वास्तव में, यह कांग्रेस ही है जिसने अपनी राज्य सरकारों में एक वर्ग विशेष को आरक्षण देने के लिए एससी, एसटी और ओबीसी के अधिकारों का हनन करने की साजिश रची। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश इसके उदाहरण हैं।
कांग्रेस शुरुआत से ही आरक्षण के खिलाफ है। नेहरू जी कहते थे कि अगर एससी/एसटी, ओबीसी को नौकरी में आरक्षण मिला तो सरकारी कामकाज का स्तर गिर जाएगा। अगर उस समय सरकार में भर्ती हुई होती, तो वो प्रमोशन के बाद आगे बढ़ते और आज यहां पहुंचते। 27 जून 1961 को पंडित नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख कर आरक्षण का विरोध किया था। उन्होंने 1951 में जाति जनगणना का भी विरोध किया था। इंदिरा गांधी ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। इंदिरा गांधी कहती थी - न जात पर, न पात पर, मुहर लगेगी हाथ पर। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने लोक सभा में 6 सितंबर 1990 को अपने भाषण के दौरान मंडल कमीशन पर अपनी बात रखते हुए आरक्षण का विरोध किया था।
इससे पहले 1985 में भी प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने एक इंटरव्यू में आरक्षण के खिलाफ बोला था। कांग्रेस की सरकारों ने ओबीसी आयोग को संवैधानिक मान्यता देने का निर्णय वर्षों तक लटका कर रखा। सपा की सरकार ने अध्यादेश लाकर यूपी में सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था समाप्त कर दी थी। मुख्यमंत्री रहते हुए भी अखिलेश यादव ने बयान दिया था कि समाजवादी पार्टी पदोन्नति में आरक्षण के खिलाफ है। 1990 से 2005 के दौरान 15 साल तक बिहार में राजद की लालू-राबड़ी सरकार थी लेकिन इन 15 वर्षों में अतिपिछड़ों के लिए स्थानीय निकाय में आरक्षण की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
नरेन्द्र मोदी सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि यूपीएससी के माध्यम से लेटरल एंट्री पारदर्शी, संस्थागत तरीके से की जाएं जो सामाजिक न्याय और आरक्षण के सिद्धांतों के अनुरूप हों। मोदी सरकार सामाजिक न्याय प्रदान करने में सबसे आगे रही है, उसी के मद्देनजर सरकार परिपत्र को फिर से संशोधित कर रही है। लेटरल एंट्री को अब तक एकल-संवर्ग पदों के रूप में नामित किया गया था और इसलिए इन नियुक्तियों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं था। मोदी सरकार अब इस कमी को भी संशोधित कर रही है और न केवल लेटरल एंट्री को एक संस्थागत प्रक्रिया बनाकर बल्कि इसमें संशोधन कर सामाजिक न्याय के सिद्धांत को भी सुनिश्चित कर रही है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो सरकार में आने के साथ ही एससी, एसटी और ओबीसी के आरक्षण के पक्ष में निरंतर काम करते रहे हैं ताकि समाज के पिछले पायदान पर पहुंचे लोग विकास की मुख्यधारा में शामिल हों। पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का मामला हो, सरकारी सेवा में कार्यरत एससी एवं एसटी की प्रोन्नति का मामला हो, लोकसभा एवं विधानसभा में उनके आरक्षण की अवधि बढ़ाने का मामला हो, एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के सुझावों को मानने में असमर्थता जाहिर करना हो, स्टार्ट-अप इंडिया व स्टैंड अप इंडिया योजनाओं में दलितों-पिछड़ों को आगे बढ़ाना हो, मुद्रा योजना में ऐसे वर्गों को आगे बढ़ाना हो या सरकार की हर योजना में ऐसे वर्गों का विशेष ख़याल रखना हो - मोदी सरकार ने हमेशा एक कदम आगे बढाते हुए बाबा साहेब के सपनों को मूर्त रूप में धरातल पर उतारा है।
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