यहां के टीचर ट्रेनिंग संस्थान को भी विश्वस्तरीय पहचान मिली हुई है।
यहां शिक्षक का ओहदा किसी भी दूसरे पेशे या व्यवसाय से ऊपर है। हालांकि यहां अध्यापक बनना इतना आसान भी नहीं है।यहां अध्यापकों की शैक्षणिक योग्यता स्नातकोत्तर तय है। इसके साथ उन्हें अव्वल दर्जे का अध्यापन प्रशिक्षण( टीचर ट्रेनिंग ) भी लेना जरूरी है। इसके बगैर उन्हें क्वालिफाइड टीचर नहीं माना जाता। यहां के टीचर ट्रेनिंग संस्थान को भी विश्वस्तरीय पहचान मिली हुई है।
फिनलैंड में एक क्वालिफाइड टीचर की तरह काम करने से पहले छात्रों को अपने यूनिवर्सिटी के समय से ही टीचर ट्रेनिंग स्कूलों में अभ्यास शुरू कर देना होता है। इस दौरान उन्हें खासतौर पर यह सिखाया जाता है कि बच्चों में सीखने के लिए उत्सुकता कैसे पैदा करें। दूसरे देशों में टीचर ट्रेनिंग के दौरान प्रशिक्षु को पहले चीजें समझाई जाती हैं फिर स्कूल में बताए गए बिंदुओं पर अमल करना होता है। लेकिन फिनलैंड में मामला इसके उलट है।
वे पहले दिन से ही स्कूल में बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के कामकाज में हाथ बंटाना शुरू कर देते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि फिनलैंड में टॉप स्कूल और सबसे खराब प्रदर्शन वाले स्कूल के बीच आंशिक अंतर ही होता है। शहर और गांव के स्कूलों के बीच शिक्षा और शिक्षकों की गुणवत्ता में किसी तरह का अंतर नहीं होता। यहां औसतन सभी स्कूल का प्रदर्शन अच्छा है और वे बेहतर स्थिति में हैं। ऐसा दुनिया के किसी भी दूसरे देश में नहीं देखा जाता है।
किसी खास विषय को पढ़ने के लिए ही बच्चों के बैठने की व्यवस्था पर जोर देना चाहिए।
फिनलैंड में सभी बच्चों को निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा का समान अधिकार प्राप्त है। यहां बच्चों के पढ़ाई का पैटर्न रिसर्च आधारित है। यानी किसी एक खास पैटर्न पर चलने के बजाए शिक्षक अपनी सोच से नित नए तरीक़ों को अपनाते हैं। ताकि प्रत्येक बच्चे को बिना किसी दबाव के, उसकी सहमति से निखारा जाए। आपको बता दूं कि इस देश के स्कूलों में क्लास टीचर या सब्जेक्ट टीचर बनने के लिए मास्टर डिग्री तक की पढ़ाई अनिवार्य है। जबकि डेकेयर सेंटर के शिक्षक और बच्चों पर निगरानी रखने वाले लोग भी न्यूनतम स्नातक डिग्रीधारी होते हैं।
दुनिया की सबसे बेहतरीन शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों तो यह छूट होती है कि वे नए तरीक़ों को इजाद कर और तकनीक की मदद से छात्रों को दिलचस्प तरीके से पढ़ाएं। यहां पढ़ाई के घंटे बंधें नहीं होते। बच्चा जितनी देर चाहे स्कूल में पढ़ सकता है। उसे पूरे दिन किताबों के बीच दिमाग केंद्रित करने की जरूरत नहीं। वह जब चाहे पढ़ाई से ब्रेक ले सकता है, खेल सकता है या फिर आराम कर सकता है। इसकी सुविधा सभी स्कूलों में होती है।
क्लासरूम में बच्चों को प्रत्येक 45 मिनट से एक घंटे की पढ़ाई के बाद कम से कम 15 मिनट का ब्रेक लेना अनिवार्य है। इस दौरान उन्हें खेल के मैदान में, प्राकृतिक संसर्ग में रहने को प्रेरित किया जाता है।यहां प्रायोगिक शिक्षा पर विशेष जोर दिया जाता है। बच्चों के बैठने के लिए बेंच और डेस्क के उपयोग को अनिवार्य नहीं माना जाता, ना ही शिक्षक खुद के लिए टेबल -कुर्सी की जरूरत पर बल देते हैं।
बच्चे बीन बैग पर या आराम सोफे पर बैठकर भी पढ़ाई कर सकते हैं। या फिर शिक्षक और बच्चे गोलाकार होकर नीचे बैठकर भी किसी विषय पर चर्चा कर सकते हैं। यहां के शिक्षक मानते हैं कि बच्चों को किसी विशेष स्थान पर बैठने के लिए बाधित नहीं करना चाहिए। यह जरूरी नहीं कि बेंच या कुर्सी पर बैठकर पढ़ने वाले बच्चे ज्यादा होशियार हो जाते हैं। कई दफा बिनबैग पर बैठकर बच्चे ज्यादा आरामदायक तरीके से पढ़ाई कर पाते हैं। किसी खास विषय को पढ़ने के लिए ही बच्चों के बैठने की व्यवस्था पर जोर देना चाहिए। ऐसी कई बातें हैं जो यहां की शिक्षा व्यवस्था को अनूठा बनाती है।
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