भारत का सबसे बड़ा असंगठित क्षेत्र कृषि ही है। हम दुनिया में कृषि और डेयरी प्रोडक्ट के मामले में लीड करते हैं।
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दरअसल, हाल ही में नेपाल के साथ भारत के कड़वे संबंधों में चीन की भूमिका पूरी दुनिया को मालूम है। नेपाल जल्दी सतर्क हो गया क्योंकि उसके सामने पाकिस्तान और श्रीलंका के उदाहरण थे। केपी शर्मा ओली लगातार चीन की फंडिंग पर अपने यहां कंस्ट्रक्शन और आंदोलनों को बढ़ावा देते रहे, लेकिन जैसे-जैसे उन पर आंतरिक दबाव आया उन्हें चीन की गोद से उतरकर दोबारा भारत के करीब आना पड़ा।
अब दुनिया में अलग-थलग पड़ चुके चीन ने भारत के किसान आंदोलन का रुख किया है। किसानों का आखिर मोबाइल कंपनियों से क्या लेना देना हो सकता है? इस बात का कोई तुक समझ नहीं आता, लेकिन चीन का भारतीय मोबाइल कंपनियों पर हमला समझ में आता है। जिन काॅॅरपोरेट घरानों का किसान आंदोलन से कोई लेना-देना ही नहीं उनके खिलाफ किसान आंदोलन में नारेबाजी और उनको टारगेट किया जाना, चीन की गहरी साजिश है।
दरअसल, भारत सरकार ने चीन के फैलाए वायरस और पूरी दुनिया में हुई चीन की निंदा के बाद चीनी एप्स को बंद कर दिया। साथ ही साथ चीनी कंपनी हुआवे को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इसी से चिढ़े बैठे चीन ने भारतीय मोबाइल कंपनियों पर हमला करना शुरू किया है। यह मामला सिर्फ सरकार के खिलाफ आंदोलन का नहीं है बल्कि व्यावसायिक लड़ाई भी बन गया है।
डिजिटल वर्ल्ड की ताकत को कौन नहीं जानता है। हम सभी जानते हैं कि वर्तमान दौर का असली व्यवसाय इस डिजिटल दुनिया से ही हो रहा है। इसीलिए ये सवाल उठना लाजिमी है कि किसान आंदोलन के मंच पर इस डिजिटल वर्ल्ड की लड़ाई को क्यों लड़ा जा रहा है? इसके पीछे कौन है? इससे किस का हित सधता है?
किसानों के इस जमावड़े का दुरुपयोग आखिर कौन कर रहा है? हम चीन पर शक क्यों नहीं करें? वो भी तब जब यहीं देश की राजधानी दिल्ली में चीनी जासूसों का नेटवर्क पकड़ा जा चुका है। अगर चीन पैसे देकर कुछ लामाओं को अपने पक्ष में कर सकता है तो वो किसान आंदोलन के जरिए अपने हित साधने के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकता? केंद्रीय जांच एजेंसियों को इसकी गंभीरता से पड़ताल करनी चाहिए।
किसान आंदोलन क्या विदेशी ताकतों की साजिश है?
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उद्योगपतियों पर निशाना साधना कम्युनिस्ट पार्टी की मूल सोच रही है, जबकि हम सभी जानते हैं वक्त बदल चुका है। खासतौर पर विकासशील देशों के लिए उद्योगों को बढ़ावा देना बहुत जरूरी है।
प्रधानमंत्री मोदी के स्टार्टअप इंडिया मिशन के जरिए एग्री स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया जा रहा है। आत्मनिर्भर भारत के पैकेज में एक बड़ा हिस्सा डेयरी और एग्री स्टार्टअप्स के लिए रखा गया है। भारत में युवाओं को कृषि क्षेत्र की तरफ आकर्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
भारत का सबसे बड़ा असंगठित क्षेत्र कृषि ही है। हम दुनिया में कृषि और डेयरी प्रोडक्ट के मामले में लीड करते हैं। यदि हमारे किसान और उनकी आने वाली पीढ़ियां कृषि क्षेत्र में भारत सरकार के इस विजन के साथ चलती हैं, तो हमें कोई भी विश्व शक्ति बनने से नहीं रोक सकता है।
यही वजह है कि चीन ने सीधा निशाना किसानों पर साधा है। किसानों के जरिए कम्युनिस्ट पार्टी की एंटी विंग को एक ताकत मिली है। यदि इसके लिए जबरदस्त फंडिंग भी मिल रही हो तो इससे इनकार नहीं किया जा सकता। मोबाइल कंपनियों पर किसानों के बहाने हमला एक बहुत ही चौंकाने वाली बात है।
मैं इनोवेट इंडिया के जरिए लगातार देश के युवाओं से जुड़ा हुआ हूं। उनकी गहरी दिलचस्पी स्टार्टअप इंडिया और कृषि और डेयरी उद्योग को नए आयाम देने पर है। किसानों का इस्तेमाल किया जा रहा है जो कि आंदोलन को किसान आंदोलन समझकर कम्युनिस्ट विंग के हाथों में आ गए हैं। आंदोलन के बहाने जो राजनीतिक नारेबाजी हुई है वो इस देश की गिरती राजनीति के स्तर को भी बताता है। निश्चित तौर पर कोई भी स्वदेशी पार्टी अपनी विपरीत विचारधारा के नेता के बारे में भी इस तरह की बात नहीं कहेगी।
इस तरह के नारे और किसानों का चोला ओढ़े मुखर प्रवक्ताओं का सामने आना एक सोची-समझी रणनीति है। कोरोना काल के दौरान उन्हें मिली राहत से किसान खुश थे। इस बात को मैं इसलिए जिम्मेदारी से कह सकता हूं क्योंकि मैंने बुंदेलखंड के सागर और आसपास के इलाकों में कई किसानों से इस मुद्दे पर इसी संक्रमण काल के दौरान बात की।
उत्तराखंड में कई युवा डेयरी और कृषि स्टार्टअप पर लगातार काम कर रहे हैं। उनके उत्साह को भी मैं जानता हूं। निश्चित तौर पर युवाओं को आकर्षित करने के लिए स्टार्टअप इंडिया जैसी योजनाओं को और ज्यादा सरल बनाए जाने की जरूरत है। भारत सरकार को फंडिंग और उसके सही वितरण पर भी ज्यादा बेहतर काम करने की जरूरत है।
हाल ही में दिल्ली से उत्तराखंड आते हुए मैंने पूरे पश्चिम यूपी बेल्ट में किसानों को गन्ने से भरी ट्रालियांं ले जाते और मंडियों में इस गन्ने को जमा करवाते हुए देखा है।
यह देश का वह असली किसान है जो आंदोलन के नाम पर की जा रही अराजकता के बीच भी अपने काम को करने में व्यस्त हैं। यह है देश का असली किसान जो जमीन पर अपना पसीना गिरा कर हमारी भूख को मिटाता है।
यह है वह असली किसान जो भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के लिए अपना सब कुछ समर्पित करता है।
यह है वह असली किसान जो नारेबाजी या राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर अपने कर्तव्य और अपने धर्म का पालन करता है। किसान आंदोलन में शामिल किसान भी मूल रूप से इसी प्रवृत्ति के हैं पर उनकी लड़ाई का दुरुपयोग किया जा रहा है। किसने इनसे छह महीने की लड़ाई की तैयारी करवाई? अगर मांगों के अनुरूप सारे सांशोधन करने के लिए सरकार तैयार है तो फिर भी आंदोलन समाप्त क्यों नहीं किया जा रहा है? आखिर इस सबके पीछे कौन है जो तर्कों को नहीं केवल जिद को मनवाना चाहता है? ये सोचा जाना चाहिए और इसकी जांच भी होनी चाहिए।
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