‘महाभारत’ के ‘सभापर्व’ में राजनीतिक व्यक्ति (राजा) में 6 गुण ( व्याख्यान शक्ति, प्रगल्भता, तर्ककुशलता, नीतिगत निपुणता, अतीत की स्मृति और भविष्य के प्रति दृष्टि अर्थात् दूरदर्शिता) आवश्यक माने गए हैं, जो राजा इन 6 गुणों से युक्त होता है, उसकी राजनीति ही सुफलवती बनती है।
महाभारतकालीन राजनीति में राजनीति की उपर्युक्त समस्त अर्हताएं श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी महावीर अथवा महापुरुष में नहीं हैं। पितामह भीष्म में दृढ़ता है; वीरता है ;अद्भुत प्रतिज्ञा-प्रियता है किन्तु नीतिगत निपुणता का अभाव है। अपनी प्रतिज्ञा के प्रति अतिरिक्त आसक्ति उन्हें असफल राजपुरुष बनाकर शरशय्या पर लिटा देती है।
महात्मा विदुर में प्रगल्भता (अवसर के अनुसार कार्य करने की सामर्थ्य) का अभाव है। वे पूर्व निरूपित नीतियों के आलोक में निर्णय देने के अभ्यासी हैं। सत्यवादी युधिष्ठिर में व्याख्यान शक्ति, प्रगल्भता, तार्किकता, नीति निपुणता और दूरदर्शिता का नितांत अभाव है।
गुरु द्रोण, कृपाचार्य आदि अन्य राजपुरुष भी राजनीति की उपर्युक्त 6 अर्हताओं की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। केवल श्रीकृष्ण ही उस युग के एकमात्र ऐसे राजनीतिज्ञ हैं, जिनमें राजोचित् 6 गुणों की संव्याप्ति उनके कर्मगत धरातल पर सर्वत्र दिखाई देती है इसीलिए वे जगद्गुरु हैं। अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना में सफल हैं।
‘श्रीमद्भगवद गीता’ श्री कृष्ण की व्याख्यान-शक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है। कर्तव्य- पालन से विमुख मोहग्रस्त पुरुषार्थ को पुनः कर्म-पथ पर नियोजित करना कोई हंसी का खेल नहीं है। यह श्रीकृष्ण की व्याख्यान-कला ही है, जो किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन को पुनः कर्तव्य का बोध देकर उन्हें समरभूमि में उतारती है। उनकी इसी व्याख्यान-शक्ति में उनकी तार्किकता के भी दर्शन होते हैं।
नीति-निपुणता श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण पक्ष है। वे किसी पूर्वनिश्चित बंधी-बंधाई नीति का अनुसरण नहीं करते हैं, बल्कि लोककल्याण की दृष्टि से अपना नीति-पथ स्वयं निर्मित करते हैं। उनके इस क्रांतिकारी रूप का दर्शन उनके प्रारंभिक जीवन में ही होने लगता है।
गोकुल के माखन की मथुरा में आपूर्ति रोकना, इंद्र की पारंपरिक पूजा के स्थान पर प्राकृतिक वरदान रूप गोवर्धन पर्वत की पूजा कराना आदि कार्य उनकी नीति-निपुणता के परिचायक हैं।
जब राजा विराट की सभा में हुए निर्णय के अनुसार वे पांडवों के राजदूत बनकर हस्तिनापुर आते हैं, तब दुर्योधन उन्हें राज्य अतिथि बनाकर अपनी ओर कर लेना चाहता है, किंतु वे उसका आतिथ्य अस्वीकार कर विदुर की कुटिया में साधारण अन्न ग्रहण करते हैं।
राजनीतिक जीवन से जुड़े व्यक्ति की यह नीति-निपुणता उसकी स्वतंत्रता और स्वायत्तता के संरक्षण का उत्तम उपकरण बनती है।
भूतकाल की स्मृति और भविष्य पर दृष्टि रखने में कृष्ण अद्वितीय हैं। अत्याचारी सत्ता अपने हितों के संरक्षण और स्थायित्व के लिए किस सीमा तक पतित हो सकती है; निर्दोष प्रतिपक्ष को कहां तक प्रताड़ित कर सकती है- इसका व्यावहारिक ज्ञान कंस के अत्याचारों की अतीतकालीन स्मृति के रूप में कृष्ण के मन पटल पर भलीभांति अंकित है इसीलिए पांडवों के साथ किए गए कौरवों के अत्याचारों और अन्यायों पर उन्हें आश्चर्य नहीं होता है।
अतीत की यह कड़वी तीखी स्मृतियां उन्हें यह भी सिखाती हैं कि अत्याचारी सत्ता किसी भी सत्याग्रह को नहीं मानती। उसका अहंकार सहनशीलता से नहीं पिघलता; वह विनम्रता को कायरता समझती है और उसका उपहास करती है। इसलिए श्रीकृष्ण आततायी के हृदय-परिवर्तन की किसी भी कोमल-कल्पना से भ्रमित नहीं होते और उसका समूल नाश करने के लिए सतत सन्नद्ध मिलते हैं।