राहत भाई आप तो कहते थे कि....
“वबा फैली हुई है हर तरफ़,
अभी माहौल मर जाने का नई..!”
तो फिर इतनी जल्दी? ऐसे? हे ईश्वर! बेहद दुखद! इतनी बेबाक़ ज़िंदगी और ऐसा तरंगित शब्द-सागर इतनी ख़ामोशी से विदा होगा,कभी नहीं सोचा था ! शायरी के मेरे सफ़र और काव्य-जीवन के ठहाकेदार क़िस्सों का एक बेहद ज़िंदादिल हमसफ़र हाथ छुड़ा कर चला गया
“मैं मर जाऊँ तो मेरी इक अलग पहचान लिख देना,
लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना...!"
राहत इंदौरी जी का जाना एक कलंदर का जाना है। सैंकड़ों यात्राओं, मंच और नेपथ्य के साथ में मैंने उनमें एक बेख़ौफ़ फ़कीर देखा था, उस परम्परा का, जो कबीर से चल कर बाबा नागार्जुन तक पहुँचती है। राहत भाई हिन्दी-उर्दू साहित्य के बीच के सबसे मज़बूत पुल थे। मेरी याददाश्त में मैंने किसी शायर को मक़बूलियत के इस उरूज़ पर नहीं देखा था, जितना उन्हें। उनके अंदर की हिन्दुस्तानियत का ये जादू था कि हिन्दी कवि-सम्मेलनों में भी उन्हें वही मुकाम हासिल था जो उर्दू मुशायरों में था।
राहत भाई मुँहफट होने, इन्दौरी होने, शायर होने और इन सब से बढ़ कर हिंदुस्तानी होने पर ताउम्र फ़िदा रहे, और ग़ज़ब के फ़िदा रहे। पिछले बीस सालों में शायद ही उनके किसी हमसफ़र को उनके सफ़र का इतना साथ मिला हो, जितना मुझे। दुनिया भर की यात्राओं में जिस नज़ाकत भरे लेकिन मज़बूत तरीक़े से वे हिन्दुस्तानियत को थाम कर चलते थे, उनकी शायरी में, अदायगी में और चेहरे पर इसकी हनक देखते ही बनती थी।
कई मुल्कों के खचाखच भरे ऑडिटोरियम की कशमकश भरी वे रातें मेरी आँखों को मुँह ज़बानी याद हैं, जहाँ अपने जुमलों और शेरों में महकती हिन्दुस्तानियत की खुश्बू पर आपत्ति उठाने वाले लोगों से राहत भाई अपने तेवर, फिलवदी जुमलों और क़हक़हों के हथियार ले कर एकदम भिड़ जाते थे। बहरीन की एक महफ़िल में, जहाँ हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों के श्रोता लगभग बराबर संख्या में मौजूद थे, वहाँ खूब देर तक तालियों के शोर के बीच सुने जा रहे राहत भाई ने जब अपनी एक ग़ज़ल का मतला पढ़ा कि-
"मैं जब मर जाऊँ तो मेरी अलग पहचान लिख देना
लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना"
तो महफ़िल के एक ख़ास हिस्से से एक चुभता हुआ सा जुमला उठा - "राहत भाई, कम से कम ग़ज़ल को तो मुल्क के रिश्ते से बाहर रखिये।" जुमले के समर्थन में छिटपुट तालियों और विरोध में जनता के फिकरे और ज़्यादा तालियों के शोर के बीच परिस्थिति की कमान को अपने हाथ में लेने की कोशिश करते मुझे ख़ामोश होने का इशारा किया और अपने मशहूर अंदाज़ में माइक को थाम कर कहा कि 'हिंदुस्तान के एक अलग हुए टुकड़े के बिछड़े हुए भाई, ज़रा ये शेर भी सुनो - "ए ज़मीं, इक रोज़ तेरी ख़ाक में खो जायेंगे, सो जायेंगे// मर के भी, रिश्ता नहीं टूटेगा हिंदुस्तान से, ईमान से"।