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Space Race: अचानक अंतरिक्ष में क्यों भेजे जा रहे हैं इतने मिशन्स? वैज्ञानिक खोजों से ज्यादा ये हैं असली मायने

सार

इस दशक के शुरू होते ही ऐसा क्या हुआ कि अमरीका, चीन, रूस और हमारा देश भारत चांद पर जाने के लिए कई स्ट्रैटेजिक मिशन्स प्लान कर रहा है। अमेरिका तो अपने आर्टेमिस प्रोग्राम के जरिए साल 2026 में दोबारा इंसानों को चांद पर उतारने जा रहा है। आप में से कई लोग सोच रहे होंगे कि इन मिशन्स के जरिए वैज्ञानिक खोजें, रिसर्च और स्पेस एक्स्पलोरेशन किया जाएगा। लेकिन ऐसा है नहीं।

इन सब से कहीं ज्यादा इसके पीछे एक बहुत बड़ा जियोपॉलिटिकल एंगल छिपा है। आने वाले भविष्य में चांद एक बहुत बड़ा सेलेस्टियल चॉक पॉइंट बनने जा रहा है, जो स्पेस रेस और मॉडर्न वारफेयर की परिभाषा को ही बदल के रख देगा। 
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स्पेस रेस - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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जुलाई 20, 1969 नील आर्मस्ट्रांग चांद पर अपना पहला कदम रखते हैं। ये इंसानों की अंतरिक्ष में एक विशाल छलांग थी। इसके बाद नासा ने अपोलो 14, 15, 16 कई मैन्ड मिशन्स चांद पर भेजे। हालांकि, साल 1972 में अपोलो 17 के बाद चांद पर भेजे जा रहे मानव मिशन्स का कारवां थम गया। यूजीन सेरनन वह आखिरी इंसान थे जिन्होंने चांद पर अपना कदम रखा था। तब से लेकर अब तक 50 सालों से भी ज्यादा का वक्त बीत चुका है पर कोई इंसान वहां पर नहीं गया। 

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अचानक इस दशक के शुरू होते ही ऐसा क्या हुआ कि अमेरिका, चीन, रूस और हमारा देश भारत चांद पर जाने के लिए कई स्ट्रैटेजिक मिशन्स प्लान कर रहा है। अमेरिका तो अपने आर्टेमिस प्रोग्राम के जरिए साल 2026 में दोबारा इंसानों को चांद पर उतारने जा रहा है। आप में से कई लोग सोच रहे होंगे कि इन मिशन्स के जरिए वैज्ञानिक खोजें, रिसर्च और स्पेस एक्स्प्लोरेशन किया जाएगा। लेकिन ऐसा है नहीं। इन सब से कहीं ज्यादा इसके पीछे एक बहुत बड़ा जियोपॉलिटिकल एंगल छिपा है। आने वाले भविष्य में चांद एक बहुत बड़ा सेलेस्टियल चॉक पॉइंट बनने जा रहा है, जो स्पेस रेस और मॉडर्न वारफेयर की परिभाषा को ही बदल के रख देगा। 

साल 2019 में नाटो स्पेस को एक ऑपरेशनल डोमेन डिक्लेअर करता है। इस निर्णय के ठीक बाद अमेरिका दुनिया की पहली डेडिकेटेड स्पेस फोर्स को लॉन्च करता है। यही नहीं फ्रांस इसके बाद अपनी एयर फोर्स का नाम बदलकर एयर एंड स्पेस फोर्स कर देता है। इनके साथ-साथ दुनिया की स्पेस प्रोग्राम रन करने वाले कई देश भी इस निर्णय के ठीक बाद स्पेस में अपने वर्चस्व को लेकर कई रणनीतिक कदम उठाते हैं। 
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आप समझ रहे हैं यहां पर क्या हो रहा है? स्पेस शायद अब एक नया जंग का मैदान बनने जा रहा है। स्पेस रेस का उद्देश्य अब वैज्ञानिक खोजों और स्पेस एक्सप्लोरेशन से कहीं ज्यादा युद्ध जैसी परिस्थितियों में स्पेस के मेजर चॉक पॉइंट्स पर अपना वर्चस्व स्थापित करना है। इसी को देखते हुए रूस और चीन अपना खुद का स्पेस स्टेशन बना रहे हैं। वहीं हमारा भारत भी इसमें पीछे नहीं है। 

भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का बेसिक मॉडल साल 2028 तक धरती ऑर्बिट में सेट कर दिया जाएगा। वहीं इसे पूरा बनाने का लक्ष्य साल 2035 तक रखा गया है। आप में से कई लोग सोच रहे होंगे कि आखिर स्पेस कैसे वॉर का एक नया फ्रंटियर बन रहा है? स्पेस तो अंतहीन है। फिर यहां पर लड़ाई करके दुनिया को क्या मिलेगा। आइए समझते हैं इसे विस्तार से - 

अगर वॉर के ट्रेंड को देखेंगे, तो शुरुआत में लड़ाई जमीन को लेकर होती थी। उसके बाद ब्रिटिशर्स और फ्रेंच ने महासागरों का इस्तेमाल करके बड़े-बड़े जहाजों के जरिए दुनियाभर में शासन किया। इसके बाद दोनों विश्व युद्ध में एयर एक नया वॉर का फ्रंटियर बन कर उभरा, जब बड़े बड़े एयरक्राफ्ट के जरिए एक देश दूसरे देशों के स्ट्रैटेजिक पॉइंट पर हमला कर रहे थे। जापान द्वारा अमेरिका के पर्ल हार्बर पर किया गया ऐतिहासिक हमला इनमें से एक था। 

साइबर स्पेस और स्पेस बन रहे वारफेयर के नए फ्रंटियर

अब हम एक नए युग में प्रवेश कर रहे हैं जहां साइबर स्पेस और स्पेस,  वारफेयर के एक नए फ्रंटियर के रूप में उभर रहे हैं। अमेरिका को यह पता है कि जिस तरह फ्रेंच और ब्रिटिशर्स ने ओसियंस को कैपिटलाइज करके दुनियाभर में अपना शासन किया था। ठीक उसी तरह अगर स्पेस को कैपिटालाइज कर लिया जाए, तो पूरी दुनिया पर अपनी बादशाहत बनाई जा सकती है। और ये बात रूस, चीन के साथ साथ हमारा देश भारत भी जानता है।

धरती के ऑर्बिट जोन्स हैं महत्वपूर्ण

हमारे पृथ्वी के आसपास ऐसे कई जरूरी चॉक पॉइंट्स हैं, जहां पर अगर कोई देश कंट्रोल पा ले, तो उस देश को 21वीं सदी के स्पेस रेस में पीछे करना काफी मुश्किल है। इसमें पहली कैटेगरी में अर्थ के तीनों ऑर्बिट जोन्स, लो अर्थ ऑर्बिट, मिडिल अर्थ ऑर्बिट और जियो स्टेशनरी ऑर्बिट शामिल हैं। इन तीनों ऑर्बिट में सैटेलाइट को उनकी जरूरतों को देखकर इंस्टॉल किया जाता है। यही सैटेलाइट दुनियाभर में इंटरनेट, कम्यूनिकेशन, जीपीएस, अर्थ की ऑब्जर्वेशन, वेदर फॉरकास्टिंग से लेकर स्पाई और सर्विलांस करने के लिए इस्तेमाल में आ रहे हैं। विश्व के कई देश इन सैटेलाइट कम्यूनिकेशन नेटवर्क पर आश्रित हैं। और हमारा इंडिया भी इनमें से एक है।  

आज के समय कई जरूरी सी रूट्स जैसे स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज, मलक्का स्ट्रेट, स्वेज कैनाल ग्लोबल इकोनॉमी को पम्प करने में एक इंपोर्टेंट रोल प्ले कर रहे हैं। ठीक इसी तरह धरती के ऑर्बिट जोन में मौजूद ये सैटेलाइटें भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए ईंधन की भूमिका निभा रही हैं। ऐसे में स्ट्रैट ऑफ हार्मूज, मलक्का स्ट्रेट, स्वेज कैनाल की तरह ही धरती का ऑर्बाइटल जोन भी काफी स्ट्रैटेजिक है। 

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स्पेस रेस - फोटो : .
स्पेस में जिस तेजी से अमेरिका, चीन और रूस की मौजूदगी बढ़ रही है। उससे हमारे सैटेलाइट नेटवर्क पर भी थ्रेट्स आ रहे हैं। कल को अगर युद्ध या किसी जियोपॉलिटिकल एजेंडा को पूरा करने के लिए कोई देश हमारे सेटेलाइट नेटवर्क के साथ जरा भी छेड़छाड़ करता है। ऐसे में हमारे देश का कम्यूनिकेशन नेटवर्क और इकोनॉमी तबाह हो सकती। इन्हीं खतरों को काउंटर करने के लिए हमारा देश साल 2028 तक इंडियन स्पेस स्टेशन का एक बेसिक मॉडल अर्थ के ऑर्बिट में लॉन्च कर देगा। सैटेलाइट नेटवर्क को प्रोटेक्ट करने के साथ साथ आने वाले समय में इंडिया का यह स्पेस स्टेशन कई जियोपॉलिटिकल एजेंडा को पूरा करने में भी मदद करेगा। 

चंद्रमा और स्पेस रेेस

स्पेस में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण चॉक पॉइंट चंद्रमा है। चांद पर ऐसे बेशकीमती संसाधनों का भंडार है, जिस पर अगर किसी भी देश का हाथ लग गया, तो उसकी बादशाहत को कोई नहीं रोक सकता है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर बड़ी मात्रा में क्रिस्टल वॉटर आइस है, जिसके बारे में चंद्रयान वन के इम्पैक्ट लैंडिंग के जरिए पता चला था। भविष्य में इस क्रिस्टल वॉटर आइस को आसानी से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़कर चांद पर बनी कॉलोनीज में सांस लेने के लिए ऑक्सीजन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यही नहीं चांद के क्रिस्टालाइज वॉटर का इस्तेमाल डीप स्पेस मिशन्स के लिए रॉकेट फ्यूल बनाने में भी किया जा सकता है। 

चांद पर दूसरा सबसे वैल्यूएबल रिसोर्स है हीलियम 3। हीलियम 3 एक ऐसा गेम चेंजिंग संसाधन है, जो स्पेस रेस के पूरे डाइनामिक्स को ही बदल के रख देगा। हिलियम 3 नॉन रेडियो एक्टिव क्लीन एनर्जी का एक बहुत बड़ा स्रोत है। हिलियम 3 के न्यूक्लियर एनर्जी का इस्तेमाल करने पर किसी भी तरह का रेडियोएक्टिव वेस्ट नहीं निकलता है। चांद पर इतनी ज्यादा मात्रा में हीलियम 3 है कि इसकी मदद से पृथ्वी की दस हजार सालों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सकता है।  यही नहीं, हिलियम 3 का उपयोग भविष्य में एडवांस रॉकेट के प्रॉपल्जन सिस्टम में ईंधन के रूप में भी किया जा सकता है। 

आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि जहां आज की करंट टेक्नोलॉजी की मदद से हमें मार्स तक जाने में महीनों का समय लगता है। वहीं हिलियम 3 फ्यूजन रॉकेट की मदद से महज कुछ दिनों में मंगल ग्रह तक का सफर पूरा किया जा सकता है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं है कि हीलियम 3 डीपर मैन्ड मिशन्स के रास्तों को खोल देगा। इसकी मदद से बेहद कम खर्च में एस्ट्रोनॉट को आसानी से जुपिटर, सैटर्न के यूरोपा और टाइटन जैसे महत्वपूर्ण चंद्र मिशनों पर बेहद कम समय में भेजा जा सकेगा। हालांकि, आज की हमारी करंट टैक्नोलॉजी के जरिए हिलियम थ्री को एक्स्ट्रैक्ट करना काफी मुश्किल काम है। लेकिन आने वाले वक्तों में जो देश इसको क्रैक कर लेता है, उसके लिए अंतरिक्ष की दौड़ में आगे बने रहने के लिए कई नए आयाम खुल जाएंगे। 

चांद के दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद वॉटर आइस और हिलियम थ्री के जरिए कई देश उन एस्टेरॉयड पर डीपर स्पेस मिशन भेज सकेंगे, जो अपने भीतर ट्रिलियंस ऑफ डॉलर की वर्थ को छुपाकर रखे हैं। मतलब चांद पर जिस देश का भी वर्चस्व होता है। उसके पास ट्रिलियंस ऑफ डॉलर की वर्थ को कैप्चर करने के रास्ते खुल जाएंगे। आप में से जिस किसी ने भी अवतार फिल्म देखी है। उसमें आपने देखा होगा कि हमारी धरती से एक मिशन पेंडोरा नाम के मून पर जाता है। वहां ये मिशन यूनोबटेनियम नाम के एक बेहद ही रेयर अर्थ रिसोर्स की खोज करता है। 

इस एक किलो यूनोबटेनियम की कीमत धरती पर करीब 20 मिलियन डॉलर होती है। खैर ये तो फिल्म की कहानी थी लेकिन आने वाले भविष्य में इस तरह के जो डीपर स्पेस मिशन्स संसाधनों की खोज में दूसरे एस्टेरॉयड पर निकलेंगे। चांद इन सभी मिशनों के लिए लॉन्चिंग पैड के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि मून से रॉकेट को लॉन्च करना धरती की तुलना में काफी ज्यादा कॉस्ट इफेक्टिव है क्योंकि मून का गुरुत्वाकर्षण काफी कम है। कम ग्रैविटी होने के कारण मून से रॉकेट को लॉन्च करने में काफी कम खर्च आएगा और फ्यूलिंग भी यहीं से होगी। इन सभी बातों के बारे में हर देश को पता है। अब सवाल है कि इन सब में अपना इंडिया क्या कर रहा है? आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से -

भारत ने हाल ही में आर्टेमिस अकोर्ड पर साइन किया है। ये भारत का एक स्ट्रैटेजिक मूव था। इससे हमें आने वाले फ्यूचर में नासा और दूसरी स्पेस एजेंसी के सहयोग से ऐसी तकनीक और स्पेस से जुड़े उपकरण मिलेंगे, जिनकी मदद से हम मून से जुड़े अपने फ्यूचर मिशन्स को पूरा कर सकेंगे। चंद्रयान सीरीज और बाकि स्पेस मिशनों से जो नई चीजें हमें जानने को मिल रही हैं। उन्हें हम आर्टेमिस अकोर्ड से जुड़े बाकि देशों के साथ साझा करेंगे और इसी साझेदारी के साथ ये देश स्पेस रेस में ग्रोथ करेंगे। लेकिन लेकिन लेकिन ये कॉलेबोरेशन हो रहा है या स्पेस रेस में हम एलाइज बन रहे हैं। 

शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत यूनियन कई देशों को एलाइज बनाकर एक दूसरे को काउंटर कर रहे थे। क्या यही चीज हमें स्पेस रेस में भी देखने को मिलेगी। क्योंकि चीन और रूस मिलकर चांद पर इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन को बनाने की योजना बना रहे हैं और इसको लेकर दुनिया के कई देशों को अपने साथ जुड़ने का खुला निमंत्रण दिया है। विशेषज्ञों की मानें तो ये अमेरिका के आर्टेमिस प्रोग्राम का काउंटर है। तो क्या स्पेस अब जंग के नए मैदान के रूप में तैयार हो रहा है? इसका फैसला तो भविष्य करेगा। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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