जुलाई 20, 1969 नील आर्मस्ट्रांग चांद पर अपना पहला कदम रखते हैं। ये इंसानों की अंतरिक्ष में एक विशाल छलांग थी। इसके बाद नासा ने अपोलो 14, 15, 16 कई मैन्ड मिशन्स चांद पर भेजे। हालांकि, साल 1972 में अपोलो 17 के बाद चांद पर भेजे जा रहे मानव मिशन्स का कारवां थम गया। यूजीन सेरनन वह आखिरी इंसान थे जिन्होंने चांद पर अपना कदम रखा था। तब से लेकर अब तक 50 सालों से भी ज्यादा का वक्त बीत चुका है पर कोई इंसान वहां पर नहीं गया।
अचानक इस दशक के शुरू होते ही ऐसा क्या हुआ कि अमेरिका, चीन, रूस और हमारा देश भारत चांद पर जाने के लिए कई स्ट्रैटेजिक मिशन्स प्लान कर रहा है। अमेरिका तो अपने आर्टेमिस प्रोग्राम के जरिए साल 2026 में दोबारा इंसानों को चांद पर उतारने जा रहा है। आप में से कई लोग सोच रहे होंगे कि इन मिशन्स के जरिए वैज्ञानिक खोजें, रिसर्च और स्पेस एक्स्प्लोरेशन किया जाएगा। लेकिन ऐसा है नहीं। इन सब से कहीं ज्यादा इसके पीछे एक बहुत बड़ा जियोपॉलिटिकल एंगल छिपा है। आने वाले भविष्य में चांद एक बहुत बड़ा सेलेस्टियल चॉक पॉइंट बनने जा रहा है, जो स्पेस रेस और मॉडर्न वारफेयर की परिभाषा को ही बदल के रख देगा।
साल 2019 में नाटो स्पेस को एक ऑपरेशनल डोमेन डिक्लेअर करता है। इस निर्णय के ठीक बाद अमेरिका दुनिया की पहली डेडिकेटेड स्पेस फोर्स को लॉन्च करता है। यही नहीं फ्रांस इसके बाद अपनी एयर फोर्स का नाम बदलकर एयर एंड स्पेस फोर्स कर देता है। इनके साथ-साथ दुनिया की स्पेस प्रोग्राम रन करने वाले कई देश भी इस निर्णय के ठीक बाद स्पेस में अपने वर्चस्व को लेकर कई रणनीतिक कदम उठाते हैं।
आप समझ रहे हैं यहां पर क्या हो रहा है? स्पेस शायद अब एक नया जंग का मैदान बनने जा रहा है। स्पेस रेस का उद्देश्य अब वैज्ञानिक खोजों और स्पेस एक्सप्लोरेशन से कहीं ज्यादा युद्ध जैसी परिस्थितियों में स्पेस के मेजर चॉक पॉइंट्स पर अपना वर्चस्व स्थापित करना है। इसी को देखते हुए रूस और चीन अपना खुद का स्पेस स्टेशन बना रहे हैं। वहीं हमारा भारत भी इसमें पीछे नहीं है।
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का बेसिक मॉडल साल 2028 तक धरती ऑर्बिट में सेट कर दिया जाएगा। वहीं इसे पूरा बनाने का लक्ष्य साल 2035 तक रखा गया है। आप में से कई लोग सोच रहे होंगे कि आखिर स्पेस कैसे वॉर का एक नया फ्रंटियर बन रहा है? स्पेस तो अंतहीन है। फिर यहां पर लड़ाई करके दुनिया को क्या मिलेगा। आइए समझते हैं इसे विस्तार से -
अगर वॉर के ट्रेंड को देखेंगे, तो शुरुआत में लड़ाई जमीन को लेकर होती थी। उसके बाद ब्रिटिशर्स और फ्रेंच ने महासागरों का इस्तेमाल करके बड़े-बड़े जहाजों के जरिए दुनियाभर में शासन किया। इसके बाद दोनों विश्व युद्ध में एयर एक नया वॉर का फ्रंटियर बन कर उभरा, जब बड़े बड़े एयरक्राफ्ट के जरिए एक देश दूसरे देशों के स्ट्रैटेजिक पॉइंट पर हमला कर रहे थे। जापान द्वारा अमेरिका के पर्ल हार्बर पर किया गया ऐतिहासिक हमला इनमें से एक था।
साइबर स्पेस और स्पेस बन रहे वारफेयर के नए फ्रंटियर
अब हम एक नए युग में प्रवेश कर रहे हैं जहां साइबर स्पेस और स्पेस, वारफेयर के एक नए फ्रंटियर के रूप में उभर रहे हैं। अमेरिका को यह पता है कि जिस तरह फ्रेंच और ब्रिटिशर्स ने ओसियंस को कैपिटलाइज करके दुनियाभर में अपना शासन किया था। ठीक उसी तरह अगर स्पेस को कैपिटालाइज कर लिया जाए, तो पूरी दुनिया पर अपनी बादशाहत बनाई जा सकती है। और ये बात रूस, चीन के साथ साथ हमारा देश भारत भी जानता है।
धरती के ऑर्बिट जोन्स हैं महत्वपूर्ण
हमारे पृथ्वी के आसपास ऐसे कई जरूरी चॉक पॉइंट्स हैं, जहां पर अगर कोई देश कंट्रोल पा ले, तो उस देश को 21वीं सदी के स्पेस रेस में पीछे करना काफी मुश्किल है। इसमें पहली कैटेगरी में अर्थ के तीनों ऑर्बिट जोन्स, लो अर्थ ऑर्बिट, मिडिल अर्थ ऑर्बिट और जियो स्टेशनरी ऑर्बिट शामिल हैं। इन तीनों ऑर्बिट में सैटेलाइट को उनकी जरूरतों को देखकर इंस्टॉल किया जाता है। यही सैटेलाइट दुनियाभर में इंटरनेट, कम्यूनिकेशन, जीपीएस, अर्थ की ऑब्जर्वेशन, वेदर फॉरकास्टिंग से लेकर स्पाई और सर्विलांस करने के लिए इस्तेमाल में आ रहे हैं। विश्व के कई देश इन सैटेलाइट कम्यूनिकेशन नेटवर्क पर आश्रित हैं। और हमारा इंडिया भी इनमें से एक है।
आज के समय कई जरूरी सी रूट्स जैसे स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज, मलक्का स्ट्रेट, स्वेज कैनाल ग्लोबल इकोनॉमी को पम्प करने में एक इंपोर्टेंट रोल प्ले कर रहे हैं। ठीक इसी तरह धरती के ऑर्बिट जोन में मौजूद ये सैटेलाइटें भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए ईंधन की भूमिका निभा रही हैं। ऐसे में स्ट्रैट ऑफ हार्मूज, मलक्का स्ट्रेट, स्वेज कैनाल की तरह ही धरती का ऑर्बाइटल जोन भी काफी स्ट्रैटेजिक है।