बेशक 8 मार्च 2021 को विश्व महिला दिवस मनाया जा रहा है। भारत में जब तक महिलाएं सुरक्षित नहीं होगी तब तक इन दिवसों की सार्थकता नहीं होगी। प्रतिदिन हैवानियत की हदें लांघी जा रही हैं। महिलाओं की अस्मिता का जनाजा निकाला जा रहा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक मंहिलाएं असुरक्षित हैं। आज हर जगह दुशासन महिलाओं की इज्जत नीलाम कर रहे हैं। विश्व गुरु कहलाने वाले भारत में महिलाओं पर जुल्मों की सूची लंबी होती जा रही है।
जब देश की राष्ट्रीय राजधानी ही सुरक्षित नहीं है तो महानगरों व छोटे कस्बों का क्या हाल होगा इससे अदांजा लगाया जा सकता है। 2020 में लाॅकडाउन के समय महिलाएं सुरक्षित थीं मगर ज्यों ही लाॅकडाउन खुल गया हैवानों ने हैवानियत शुरू कर दी है। आज महिला दिवस पर ऐसे आयोजन केवल मात्र औपचारिकता भर रह गए हैं क्योंकि हर वर्ष एक संकल्प लिया जाता है कि महिलाओं को अत्याचारों से मुक्ति दिलाई जाएगी। अत्याचारों का खात्मा किया जाएगा सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, मगर धरातल की सच्चाईयां बेहद ही खौफनाक तस्वीरें प्रस्तुत कर रही हैं।
आधी दुनिया पर बढ़ते अत्याचार देश के लिए अशुभ संकेत हैं। आज महिलाएं हर क्षेत्र में सफलता की बुलंदियां छू रही हैं। चांद तक अपनी काबलियत का परचम लहरा रही हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए सैंकड़ों कड़े कानून बनाए गए हैं, मगर यह कानून सरकारी फाईलों की धूल चाट रहे हैं। अगर सही तरीके से लागू किए होते तो इन मामलों में इजाफा नहीं होता। आज महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं, चाहे घर हो दफतर हो, बस, सड़क, गली या चौराहा हो महिलाएं हर जगह असुरक्षित ही महसूस कर रही हैं।
वर्ष 2021 में भी हालात सुधर नहीं रहे हैं। देश में बेटियां हर जगह असुरक्षित महसूस कर रही हैं। बेटियों की सुरक्षा के दावे कहां हैं। यह एक यक्ष प्रशन है यह सुलगते सवाल हैं कि बेटियां कब सुरक्षित होंगी। साल के 365 दिन महिलाओं पर अत्याचार होते रहते हैं। आज महिलाओं पर अनगिनत अत्याचार हो रहे हैं मगर सरकारों की कुंभकरणी नींद नहीं टूट रही है। आज कोई भी विश्वास के योग्य नहीं रहा है किस पर विशवास करें, अपने ही हैवान बन रहे हैं।
आज बाबुल की गलियां ही नरक बन गई हैं। अपने रक्षक ही भक्षक बन गए हैं। बहु-बेटियां घर में ही असुरक्षित हैं समय- समय पर ऐसे घिनौने कर्म होंतें है कि कायनात कांप उठती है कि आदमी इतने नीच काम क्यों कर रहा है। महिलाएं कहीं भी महफूज नहीं हैं। महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। देश में प्रतिदिन घटित हो रही वारदातों से महिलाओं की सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगता जा रहा है कि महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं।
इन वारदातों से हर भारतीय उद्वेलित है। सुरक्षा के दावों की पोल खुल गई है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुख्ता इतंजाम करने होगें तभी इन पर रोक लग सकती है। जघन्य व दिल दहला देने वाली दुष्कर्म की घटनाओं से जनमानस खौफजदा है। आखिर कब तक बेटियां दरिंदगी का शिकार होती रहेंगी। ऐसी वारदातें बहुत ही चिंतनीय हैं। बेखौफ दरिदें अराजकता फैला रहे हैं। दरिदों की दरिंदगी की वारदातें कब रुकेंगी, अपराध की तारीख बदल जाती है, मगर तस्वीर नहीं बदलती।
आंकड़ों के अनुसार 12 सितंबर 2018 को हरियाणा के रेवाड़ी में एक 19 साल की मेधावी छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म कर दिया था। 27 जून 2018 को मध्यप्रदेश के मंदसौर में एक सात साल की नाबालिग स्कूली बच्ची से सामूहिक दुष्कर्म की जघन्य घटना से हर भारतीय उद्वेलित हुआ था। यह बच्ची तीसरी में पढ़ती थी। मासूम से हुई दरिदगी व हैवानियत की यह घटना बहुत ही दिल दहलाने वाली थी। दरिदों ने जिस बर्बरता व हैवानियित से घटना को अंजाम दिया था उससे रौगटे खडे़ हो जाते हैं।