महिलाओं को सामाजिक सम्मान आर्थिक रूप से बराबरी व उनके काम के प्रति समाज के सकारात्मक रवैये से ही संभव है। अन्यथा दिन और दिवसों का क्या है? वह तो अपने क्रम से आएंगे और अपनी गति से आगे भी बढ़ जाएंगे। पीछे रह जाएगी फिर आने वाली तारीख और दिवस। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि दिवस और तिथि के फेर में पड़ने की अपेक्षा हम हर दिन को महिलाओं के सम्मान का दिन मानें। जब हम सम्मान देना सीखेंगे तो हम समानाधिकार देना भी सीखेंगे और इस तरह हम समाज में समता और समानता ला सकेंगे।
क्योंकि समाज में जितनी भी टकराहट और अस्मिता की लड़ाइयां है सभी सम्मान से जुड़ी हैं। हमने अपने समाज को कई खांचों में बांट दिया है और फिर उनके कार्यों की निंदा और अपने कार्यों को श्रेष्ठ साबित करने की जुगत में लग गए। हम भूल गए कि समाज में कोई भी कार्य छोटा और बड़ा नहीं होता। सभी कार्य एक दूसरे के पूरक हैं। हम विदेशों से खुद की तुलना तो करते हैं, लेकिन प्रत्येक कार्य के प्रति उनके नजरिए को नहीं अपनाते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में पहले व्यक्ति श्रम व कार्यों के आधार पर जातियां बनी तो आज वहीं वर्ग बन रहे हैं।
दोनों ही स्थितियों में सामाजिक सम्मान का भाव केंद्र बना। जिसके लिए आज तक संघर्ष जारी है। वर्तमान समय में महिलाओं का भी अपना एक वर्ग है जो समाज की लैंगिक विभेद की दृष्टि से जूझ रहा है। यह वर्ग श्रम तो करता है लेकिन श्रम में समान हिस्सेदार नहीं है। वर्ग के भीतर महिलाओं के भी कई वर्ग हैं। इनमें एक वर्ग महिला किसानों का भी है। यह वर्ग खेती-बाड़ी के तमाम काम करता है लेकिन सामाजिक पहचान में उन्हें किसान नहीं कहा जाता है क्योंकि जमीन पर उनका अधिकार नहीं होता है।
किसान समस्याओं की ओर देखें तो आज भी सबसे अधिक किसान आत्महत्याएं हो रही हैं। किसान आत्महत्या के बाद उनके परिवार की महिलाएं या तो खुद भी आत्महत्या कर लेती हैं अन्यथा वह मजदूरी या वैश्यावृति को अपने जीवनयापन का माध्यम बना लेती हैं क्योंकि पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के कारण कृषि भूमि पर उसे अधिकार नहीं मिलता है। वह अधिकार स्वत: ही परिवार के अन्य पुरुष सदस्य को हस्तांतरित हो जाता है और वह पुन: मजदूर की भूमिका में आ जाती है।
हमारे आसपास किसान जीवन और उनकी समस्याओं पर तो व्यापक साहित्य उपलब्ध है। क्या कभी किसी ने सोचा कि महिलाएं भी किसान हो सकती हैं? प्रायः हमारे मस्तिष्क में छवियां पूर्व निर्मित होती हैं जिनका बोध उस छवि से जुड़े शब्द व अर्थ के प्रकटीकरण के साथ होता है और हम अपनी पूर्व निर्मित छवियों के आधार पर फिर उसे नाम देते हैं। यह प्रक्रिया स्वतः नहीं बल्कि हमारी सामाजिक निर्मिती का एक हिस्सा है।
सोचनीय है कि ऐसा क्यों है कि जब भी किसान शब्द का जिक्र होता है तो हम ‘पुरुष’ छवि को ही बिम्ब रूप में गढ़ते भी हैं। विद्यालयी पाठ्यक्रम के अंतर्गत तो एक हल चलाता पुरुष ही किसान के रूप में देखा जाता है। जबकि सभी जानते है किसानी में खेती के अधिकांश काम बीज बोने से लेकर निराई, कटाई, छटाई और फ़सल काटने तक के कार्यो में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। केवल हल व ट्रेक्टर न चला पाने के कारण समाज उन्हें किसान मानने से इनकार कर देता है।
यहां प्रशिक्षण का अभाव और सामाजिक बंदिशें उन्हें इन कामों से रोकती हैं। आज भी कई राज्य व गांव ऐसे है जहां महिलाएं ही किसानी का काम करती हैं। हल चलाने से लेकर बाजार में मोल-भाव तक वह करती हैं। पूर्वोतर राज्यों की महिलाएं, दक्षिण भारत की महिलाएं और उत्तर भारत भी इस से अछूता नही है बल्कि पहाड़ की ओर जाए तो वहां श्रम में सबसे अधिक हिस्सेदारी केवल महिलाओं की है। पुरुष अधिकांशतः रोजगार के सिलसिले में शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं।
ऐसे में यही महिलाएं खेती के जरिए जीविका का निर्वाह करती हैं व स्वयं ही खेतों को जोतती है व अन्य सभी कामों के साथ-साथ उसका मोल-भाव भी करती हैं। महिलाएं प्रकृति के सबसे करीब मानी जाती है वह जीवन देती है और उसका भरण-पोषण करती हैं या कहें कि प्रकृति अपने स्वभाव में फेमिन होती हैं। एक महिला के समान वह भी उत्पादन क्रम से जुड़ी होती है। प्रकृति और स्त्री के बीच का यही तादात्म्य उसे अधिक करीब लाता है। मगर साहित्य और समाज में इन्हें महत्व नहीं दिया गया।
साहित्य में इनके लिए आज भी शून्यता ही मिलती है। किसान जीवन का इतना समृद्ध साहित्य होने के बावजूद इनकी छवि आज भी श्रमिक या कामगार महिला तक सीमित है। इतना ही नहीं आज भी साहित्य का किसान होरी ही है, धनिया नहीं? इक्कीसवीं सदी के इस दौर में महिलाओं के प्रति इस सोच में थोड़ा बदलाव आया है यह बदलाव बीते कुछ समय से देश के सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री के कारण आया है। जिसने हमारी पहचान उन महिलाओं से करवाई जिन्होंने खेती और किसानी से न केवल अपना बल्कि अपने आसपास के लोगों की भी सहायता की।