भारतीय क्रिकेट टीम के समर्थक निराश।
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मीडिया का अजीबो-गरीब प्रस्तुतिकरण
एक बड़े न्यूज चैनल ने भारतीय टीम की जीत का श्रेय प्रधानमंत्री को देने तक की तैयारी कर ली थी तो कुछ ने क्रिकेट वर्ल्ड कप की जीत को भारत के विश्व गुरू बनने और इस जीत के राजनीतिक समीकरणों को बताने का खाका भी तैयार कर लिया था, दुर्भाग्य से वैसी नौबत ही नहीं आई।
कुछ अखबारों ने इस क्रिकेट मैच को ‘धर्मयुद्ध’ और ‘विश्व विजय’ की संज्ञा तक दे डाली (बावजूद इस सच्चाई के कि दुनिया में क्रिकेट सिर्फ एक दर्जन देश ही खेलते हैं और फुटबाल 195 देशों में खेला जाता है, जिसमें विश्वस्तर पर हम कहीं नहीं हैं)। मीडिया के लगभग हर फार्मेट में ऑस्ट्रेलिया से बदला लेने के लिए भारतीय टीम को उसी तरह उकसाया जा रहा था, जैसे कि आंतकी हमले का बदला पाकिस्तान को सबक सिखाने के रूप में लेने की बात की जाती है।
टीवी चैनलों की हर संभव कोशिश यही थी कि दर्शक की उंगली रिमोट के उसी बटन पर रहे, जो उस चैनल का नंबर है। सोशल मीडिया इस मामले में सबसे आगे था। कुछ अति उत्साही यूजरों ने यह सिद्ध करने की भी कोशिश की कि वर्ल्ड कप में भारतीय क्रिकेट टीम की जीत का दिल्ली में सत्तासीन राजनीतिक दल का कैसे सीधा सम्बन्ध है। इसमें वो साल गिनाए गए, जब भारत आईसीसी टूर्नामेंट जीता और उस वक्त दिल्ली में किस पार्टी की सरकार थी। राजनीतिक विचारधारा और सत्तासीनता का क्रिेकेट में भारत के परफार्मेंस से कोई सीधा रिश्ता हो।
दरअसल इस तरह का उन्माद पैदा करना और जमीनी हकीकत को दरकिनार करना झूठ के स्वर्ग में जीने की कोशिश करना भी एक तरह सामूहिक मानसिक रोग है। इसकी एक झलक फाइनल मैच में भी उस वक्त दिखाई दी जब विराट कोहली दर्शकों को और जोर से हल्ला मचाने के लिए उकसाते दिखे। विराट जैसे महान खिलाड़ी को इस बात पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए था कि हमारे खिलाड़ी अपना स्वाभाविक खेल कैसे खेलें और ऑस्ट्रेलिया के जाल से बाहर कैसे निकलें, न कि दर्शकों को ज्यादा हल्ला करने के लिए उकसाना। इसी से साबित हो गया था कि हमारे खिलाड़ियों का ध्यान खेल से ज्यादा कहीं और है तथा उन्हें जीत के लिए खुद के खेल से ज्यादा भरोसा दूसरे कारकों पर है।
फियर ऑफ फेल्योर का शिकार हुई टीम
मनोविश्लेषकों का कहना है कि भारतीय क्रिकेट टीम एक बार फिर 'फियर ऑफ फेल्योर' (हार के डर) का शिकार हुई। ऐसी मनोस्थिति में इंसान का सही रास्ते पर चलते हुए भी अपने आप पर विश्वास डगमगाने लगता है। हमारे बल्लेबाजों ने जिस लापरवाह ढंग से अपने विकेट गंवाए, फील्डरों ने बहुत सुविधाजनक फील्डिंग की, हालांकि गेंदबाजों की गेंदबाजी में कसर नहीं थी, लेकिन विकेट को पढ़ने में जो गलती शुरू में नेतृत्व से हो गई थी, उसका कोई तोड़ बाॅलरों के पास नहीं था।
साफ झलक रहा था कि लगभग पूरी टीम एक अदृश्य दबाव में खेल रही है, खिलाड़ी गलती पर गलती किए जा रहे हैं और अपने विश्वविजेता होने के काल्पनिक मायाजाल में भटक रहे हैं। कहा यह भी जा रहा है कि फाइनल के दिन किस्मत भारत का साथ छोड़ चुकी थी, लेकिन इतना तो हो ही सकता था कि जीत को लेकर गैरजरूरी और हद तक घातक ‘हाइप’ को रोका ही जा सकता था।
क्रिकेट टीम की इस मार्मिक हार से मीडिया को इतना आत्ममंथन तो करना ही चाहिए कि वह अपनी भूमिका को खेल को खेल भावना से ही खेलने देने तक ही तक ही सीमित रखे, उसे युद्धोन्माद में तब्दील करने में ईंधन का काम न करे।
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