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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: डॉल्टन ट्रंबो- जीवन के उतार-चढ़ाव

सार

गुमनामी में डॉल्टन ट्रंबो ने ‘रोमन होलीडे’ (1853) का स्क्रीनप्ले लिखा, 40 साल बाद सुधार कर 1993 में जब उन्हें ऑस्कर दिया गया पर वे उसे ग्रहण करने के लिए जीवित न थे। 16 साल पहले वे इस दुनिया से जा चुके थे। एक साक्षात्कार में उनसे पूछा गया वे ऑस्कर मिलने पर क्या करेंगे? उनका उत्तर था वे उसे अपनी बेटी को देंगे।
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dalton trumbo - फोटो : Twitter
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विस्तार
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हम फिल्मों, फिल्म निर्देशकों, अभिनेताओं की बात खूब करते हैं पर स्क्रीनराइटर पर शायद ही बात होती है। आज एक स्क्रीनराइटर की बात। यह स्क्रीनराइटर कमाल का व्यक्ति था, मगर उसे जिंदगी ने खूब रंग दिखाए। यह व्यक्ति पढ़ते समय सोच रहा था, उसे तो लेखक बनना है मगर बना स्क्रीनराइटर।

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9 दिसम्बर 1905 को अमेरिका के कोलोराडो में जन्मे डॉल्टन का पूरा नाम जेम्स डॉल्टन ट्रंबो था। जूते के स्टोर में काम करने वाले व्यक्ति के इस बच्चे ने आगे चल कर स्क्रीनप्ले की मौलिकता के लिए ऑस्कर जीता। 

इस प्रतिभाशाली का नाम लोग एक और कारण से याद रखते हैं। उसका नाम उन लोगों की सूची में आता है, जिन्हें हॉलीवुड में प्रतिबंधित कर दिया गया था। कारण उसका लिखा कोई स्क्रीनप्ले नहीं था बल्कि उसका कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य होना था। न केवल उसे ब्लैकलिस्टेड (हॉलीवुड के दस लोगों को ब्लैकलिस्टेड किया गया था) किया गया बल्कि गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।
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अमेरिका में यदि आपका कम्युनिस्ट पार्टी से किसी तरह का संबंध है, अगर आप उस बिल्डिंग में जाते हैं, जहां पार्टी का दफ्तर है, तो भी आप सत्ता के कोप से बच नहीं सकते हैं। यह तो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का समय था। अमेरिका में कम्युनिस्ट होने का मतलब एक गाली था, सत्ता का दुश्मन होना माना जाता था।

अमेरिकी सरकार ने कम्युनिस्टों की धरपकड़ के लिए एक समिति बना, उनकी गिरफ्तारी करनी शुरू की। समिति का नाम था, ‘हाउस कमिटी ऑन अन-अमेरिकन एक्टिविटीज’। इस चक्कर में कई लेखक, बुद्धिजीवी, कलाकार की तलाश कर उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।   


सबसे मंहगे स्क्रीनराइटर के जीवन का उतार-चढ़ाव

हॉलीवुड के सबसे मंहगे स्क्रीनराइटर ट्रंबो को देशद्रोही मान कर जेल हुई और जेल से छूटने के बाद भी उसके साथ काम करने को कोई फिल्म कंपनी तैयार न थी। ट्रंबो डॉल्टन ने लिखना नहीं छोड़ा। अब उसके लेखन पर फिल्म बन रही थी, मगर क्रेडिट में उसका नाम न होता। बेनामी के दौरान उसने ‘रोमन होलीडे’ तथा ‘द ब्रेव वन’ (1956) जैसी फिल्मों का स्क्रीनप्ले लिखा और इन फिल्मों को ऑस्कर मिला।

1958 में ‘द ब्रेव वन’ स्क्रीनप्ले ऑस्कर के लिए जिस व्यक्ति का नाम पुकारा गया, वह वहां नहीं था, जिस व्यक्ति का नाम पुकारा गया, वह फिल्म के प्रड्यूसर का भतीजा था। उस आदमी के दिए व्यक्तव्यों से बात खुलनी शुरू हुई। पता चला कि लेखक तो ट्रंबो है। कम्युनिस्ट होने के बावजूद तेजी से लिखने वाले इस विश्वसनीय एवं कई जॉनर में लिखने वाले कुशल स्क्रिप्टराइटर ने कभी अपने लेखन में पार्टी प्रोपेगंडा शामिल नहीं किया। उनके यहां सत्ता से व्यक्तिगत विरोध खूब मिलता है।

ब्लैकलिस्टेड होने के बाद उनका परिवार मैक्सिको चला गया। बाद में कर्क डगलस, स्टैनली कुबरिक, ऑटो प्रिमिन्गर जैसे सिने-निर्देशकों ने हिम्मत और जिद करके ट्रंबो का नाम क्रेडिट में देना शुरू किया। ऑटो ने ‘एक्जोडस’ के लिए उसे घोषणा के साथ रखा, दूसरी ओर कर्क डगलस उसे ‘स्पार्टकस’ केलिए साथ ले रहे थे।

पहले ऑटो प्रिमिन्गर ने घोषणा की लेकिन कर्क की फिल्म पहले रिलीज हुई एक महीने बाद ऑटो की फिल्म परदे पर आई और दोनों को ऑस्कर पुरस्कार (ट्रंबो को नहीं) मिला। यह भी जानना जरूरी है कि जब कम्युनिस्ट विचारों के लोगों के खिलाफ हॉलीवुड में अभियान चला था तो इन लोगों ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किया था अत: उन पर कोई बंधन नहीं था, मगार जोखिम था।

बहुमत के विरुद्ध जाने के लिए साहस चाहिए, यह साहस इन लोगों ने दिखाया। ये फिल्में ट्रंबो का रास्ता एक बार फिर खोल गईं। इसके बाद ही यह बात खुल कर सामने आई कि ‘द ब्रेव वन’ का स्क्रीनप्ले उसी ने लिखा था और उसे 19 अक्टूबर 1975 में उसके लिए ऑस्कर दिया गया।

यह भी उल्लेखनीय है कि 10 सितम्बर 1976 को हार्ट अटैक से उसकी मृत्यु हो गई।

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dalton trumbo - फोटो : Twitter
फिल्म लाइन में आने से पहले ट्रंबो ने पिता के बागीचे की सब्जियों को घूम-घूम कर बेचा, अखबार बेचा, वह कु क्लक्स क्लान में शामिल होना चाहता था, मगर उसके पास इसकी फीस देने के पांच डॉलर नहीं थे। लिख तो वो स्कूल काल से रहा था। तब वह द डेली सेंटिनल का रिपोर्टर था। बाद में ह्यूमर मैगजीन तथा ईयरबुक में भी लिखा।

वे कहानियां लिख रहे थे और ये कहानियां वैनिटी फेयर, वोग, हॉलीवुड स्पेक्टेटर जैसी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं। बौल्डर डेली कैमरा के लिए भी काम किया। पिता का काम छूट जाने पर परिवार लॉस एंजलस आ गया। मगर जब ट्रंबो इक्कीस साल के थे उनके पिता की मृत्यु हो गई अत: मां और दो बहनों की जिम्मेदारी उन पर आ गई। इस समय उन्होंने तरह-तरह के तमाम काम किए।

एक बेकरी में दस साल रात की ड्यूटी की। उन्होंने अपना पहला उपन्यास हॉलीवुड स्पेक्टेटर के लिए ‘एक्ल्पिस’ नाम से लिखा। इसमें अपने एक मुख्य किरदार जॉन एबोट को उन्होंने अपने पिता की तर्ज पर गढ़ा। वे हॉलीवुड स्पेक्टेटर के लेखक, आलोचक तथा एडीटर भी थे। 

वार्नर्स, कोलम्बिया, पैरामाउंट, एमजीएम तथा 20th सेंचुरी जैसे सिनेमा हाउस के साथ डॉल्टन ट्रंबो ने 74 फिल्मों के स्क्रीनप्ले लिखे जिसमें अधिकांश प्रसिद्ध हुईं। उन्होंने जिन फिल्मों के स्क्रीनप्ले लिखे उनमें से कुछ के नाम हैं, ‘पेपिओन’, ‘रोमन होलीडे’, ‘द होर्समैन’, ‘लोनली आर द ब्रेव’, ‘एक्जोडस’, ‘स्पार्टकस’, ‘द ब्रेव वन’, ‘गन क्रेजी’, ‘द लॉरेटा यंग शो’, ‘ही रैन ऑल द वे’, ‘थर्टी सेकेंड्स ओवर टोकियो’, ‘ए गाई नेम्ड जो’, ‘फाइव केम बैक’ आदि।

अधिकांश में पहले उसका नाम क्रेडिट में नहीं था, बाद में क्रेडिट में नाम लिखा गया। ट्रंबो के साथ यह हुआ। अफसोस की बात है, कितने ही लोग फिल्मी दुनिया में जीवन भर काम करते हैं और बेनाम रह जाते हैं। 


1993 में मिला ऑस्कर

गुमनामी में ‘रोमन होलीडे’ (1853) का स्क्रीनप्ले लिखा, 40 साल बाद सुधार कर 1993 में जब उन्हें ऑस्कर दिया गया वे उसे ग्रहण करने के लिए जीवित न थे। 16 साल पहले वे इस दुनिया से जा चुके थे। एक साक्षात्कार में उनसे पूछा गया वे ऑस्कर मिलने पर क्या करेंगे? उनका उत्तर था वे उसे अपनी बेटी को देंगे।

असल में गुमनामी के दौरान वे जिस भी फिल्म का स्क्रीनप्ले लिख रहे थे, उसका नाम बेटी को बताते थे। वह तब बहुत छोटी थी। इस इंटरव्यू के समय वह 13 साल की थी। वह चाह कर भी यह बात किसी से साझा नहीं कर पाती थी। अपनी इसी राजदार बेटी को वे अपना ऑस्कर देना चाहते थे। 

जय रॉच ने 2015 में ‘ट्रंबो’ नाम से उन पर बायोपिक बनाई है। इसे ऑस्कार का नामांकन मिला। इस फिल्म में ब्रायन क्रैन्स्टन के अलावा डायने लेन तथा हेलेन मिरेन ने भी अभिनय किया है। उनके बेटे क्रिस्टोफर ट्रंबो ने ‘ट्रंबो’ नाम से उन पर एक नाटक लिखा है।


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