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नेहरू बनाम मोदी और चीन-2: सैन्य अफसर और रक्षा मंत्री मेनन, अपमान से भरी वो मुलाकातें

सार

  • रक्षा मंत्री मेनन की बदतमीजियां दिनों दिन बढ़ती जा रही थीं।
  • खुशवंत सिंह ने मेनन को बड़े उत्साह से याद दिलाया कि वे उनसे पहली बार रजनी पटेल के साथ पेरिस यात्रा के दौरान मिले थे।
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चीन से हार के लिए नेहरू जिम्मेदार माने गए- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PTI
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विस्तार
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चीन से हार के लिए नेहरू जिम्मेदार माने गए। नेहरू विरोधी पिछले 60 साल से यही राग आलाप रहे हैं। कोई भी राष्ट्राध्यक्ष गलत फैसला ले सकता है और इसके लिए इतिहास उसे माफ भी कर देता है, लेकिन बात सिर्फ इतने भर से रफा-दफा नहीं हो जाती।

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जब एक नए राष्ट्र के निर्माण की नींंव रखी जा रही हो। जब एक आधुनिक भारत का मंदिर बनाया जा रहा हो। सत्ता के अहंकार, निरंकुशता और हद दर्जे के अड़ियलपन ने पूरे घटनाक्रम को और डरावना बना देता है। इस कहानी को इसी नजरिए से पढ़ना और समझना चाहिए और अपने आसपास के माहौल से उसकी तुलना करनी चाहिए।

लेफ्टिनेंट जनरल बीएम कौल यानी बृजमोहन कौल का सैनिक करियर ऐसा नहीं था कि जिसमें कुछ भी बताने लायक हो सिवाए इसके कि वे नेहरू के दूर के रिश्तेदार थे, उन्होंने अपने करियर का ज्यादा हिस्सा आर्मी सर्विस कोर में बिताया जिसका जमीनी जंग से कोई लेना-देना नहीं था।
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हां, अपने बड़े अफसरों का दिल जीतने में इन साहब का कोई जवाब नहीं था और यही कला उन्हें रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन के करीब ले आई थी। मेनन चाहते थे कि 12 सैन्य अफसरों को फांद कर कौल को लेफ्टिनेंट जनरल बना दिया जाए। मेनन ऐसेे चिड़चिड़े आदमी थे, जिन्हें सेना प्रमुखों को उनके जूनियरों के सामने अपमान करने में मजा आता था।

रक्षा मंत्री मेनन की बदतमीजियां दिनों-दिन बढ़ती जा रही थीं। वे मंत्रालय की बैठक में सैन्य अफसरों को अपमानित करने के लिए ही बुलाते थे। इन बैठकों का न कोई एजेंडा होता न इसके मिनट्स तैयार किए जाते। सेनाध्यक्षों के साथ बातचीत में उनकी अभद्रता साफ दिखाई देती थी।

एक बार किसी सेनाध्यक्ष ने खुफिया टेप लगाकर बैठक की बातें रिकॉर्ड कर लीं। जिसमें बैठक के दौरान एक जनरल के मुंह से निकला- 'मैं सोचता हूं....' मेनन ने बीच में टोकते हुए कहा- 'सोचना सैनिकों की शक्ति के बाहर की चीज है।'

इसी तरह एक बार किसी एडमरिल ने कहा 'जल सेना...' तो मेनन ने आगे का वक्य यह कह कर पूरा किया 'को सागर तल के नीचे होना चाहिए।'  मेनन की मेज पर टेलीफोन की लाइन लगी होती। हर वक्त कोई न कोई घंटी जरूर बज रही होती थी। ये भी सामने बैठने वालों को अपमानित करने के लिए ही था।

'मेनन अपने हर आंगतुक से ऐसा बर्ताव करते जैसा बिल्ली, चूहे से करती है। उनके पास गया कोई व्यक्ति शायद ही बिना अपमानित हुए लौटा हो.' (द अनटोल्ड स्टोरी लेफ्टिनेंट जनरल बीएम कौल-पेज-181)

आपको लग रहा होगा मैं मेनन को कुछ ज्यादा ही बुरे और बदतमीज आदमी के रूप में पेश कर रहा हूं। ऐसा हरगिज नहीं है। मजे की बात यह है कि मेनन के बारे में ये सारे किस्से उस जनरल बीएम कौल ने अपनी चर्चित किताब 'द अनटोल्ड स्टोरी' में लिखे जिन्हें घोषित रूप से उनका करीबी समझा जाता था।

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मेनन अजीबो गरीब बर्ताव के बारे में ऐसी बातें हर उस शख्स ने कहीं न कहीं लिखी है जो उनसे दो मिनट के लिए भी कभी मिला हो...

सेनाध्यक्ष ने नेहरू को इस्तीफा भेज दिया- फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
हो सकता है कि अपने ऊपर से मेनन का करीबी होने का कलंक मिटाने के लिए जनरल कौल ने यह सब बाद में लिखा हो। इस किताब की मानेंं तो मेनन साहब कौल के साथ भी बदतमीजी से नहीं चूकते थे। देखिए कौल 'द अनटोल्ड स्टोरी' में क्या लिखते हैं- 'मेनन ने मुझे कमरे में बुलाया, मैं उनकी सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। मेरे बैठते ही मेनन ने कहा- 'जनरल ये दिल्ली है अम्बाला नहीं.' मैं चौंक गया। अम्बाला मेरी पिछली पोस्टिंग थीं। 

'मैं समझा नहीं सर.' मैंने कहा. 'आप गलत कुर्सी पर बैठे हैं।' मेनन ने कुटिल मुस्कान में मुस्कुराते हुए कहा। मैंने घूमकर देखा वह ऊंची पीठ वाली कुर्सी थी। वहां रखी बाकी कुर्सी से अलग। उनकी तीखी बातें सुनकर मुझे गुस्सा आ गया- 'मैंने कहा कुर्सी ही तो है सिंहासन तो नहीं।' 

मैंने तुरंत गलत कुर्सी छोड़ दी और वह कमरा भी छोड़ दिया। मेनन मुझे बुलाते रहे मैं नहीं आया। फिर मेनन का बुलावे का पत्र आया। मैंने जवाब लिखा- 'मेरे इमीडिएट बाॅॅस जनरल थिम्मैया हैं, आप नहीं।' बाद में उन्होंने हम दोनों को बुलाया। फिर एक दिन एकान्त में बोले-'तुम तो बहुत जल्दी नाराज हो जाते हो। मजाक भी नहीं समझते।'

मैंने उनसे कहा हंसी-मजाक तक ठीक है, लेकिन अपमान मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता।'  (द अनटोल्ड स्टोरी लेफ्टिनेंट जनरल बीएम कौल पेज 180)

मेनन अजीबो-गरीब बर्ताव के बारे में ऐसी बातें हर उस शख्स ने कहीं न कहीं लिखी है जो उनसे दो मिनट के लिए भी कभी मिला हो। मुझे पक्का यकीन है ये दो मिनट वह आदमी जिन्दगी भर नहीं भूल सकता। मेनन पर रिसर्च करते वक्त मैं खुशवंत सिंह की जीवनी दोबारा पढ़ रहा था।

जिसमें खुशवंत सिंह ने उनसे अपनी दूसरी मुलाकात का जिक्र किया है। खुशवंत सिंह इनफाॅॅरमेशन अफसर बनकर लंदन गए थे। तब मेनन हाई कमिश्नर थे। दफ्तर की कुछ अंदरूनी राजनीति के चलते खुशवंत सिंह ज्वाइन करने के चार दिन बाद उनसे मिलने उनके कमरे में पहुंचे।

खुशवंत सिंह ने मेनन को बड़े उत्साह से याद दिलाया कि वे उनसे पहली बार रजनी पटेल के साथ पेरिस यात्रा के दौरान मिले थे। मेनन ने उन्हें झिड़कते हुए कहा था- 'सरदार भारत में तुम्हें तमीज नहीं सिखाई गई। चार दिन हो गए तुम्हें ये दफ्तर ज्चाइन किए हुए। अब शक्ल दिखा रहे हो। तुम्हें मालूम है कि मैं हाई कमीश्नर हूं।'  (Truth, Love and a Little Malice by Khushwant Singh पेज 184)"

सेनाध्यक्ष थिम्मैया कब तक ऐसे आदमी को बर्दाश्त कर सकते। सो सेनाध्यक्ष ने नेहरू को इस्तीफा भेज दिया। सेनाध्यक्ष के इस्तीफे की खबर से देश में हडकंप मच गया....

जारी....


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): 
यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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