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आजादी का अमृत महोत्सव: हर घर तिरंगे को लेकर उत्साह, स्वाधीनता आन्दोलन को याद रखना भी जरूरी

सार

हमारा यह जोशोखरोश भी तब तक बेमानी है जब तक कि हम अंग्रेजों की 'बांटो और राज करो' वाली नीति को ध्यान में नहीं रखते, क्योंकि इस राष्ट्र की एकता, अखण्डता और समृद्धि के लिए राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता है। 
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भारत मना रहा है आजादी का अमृत महोत्सव - फोटो : amritmahotsav.nic.in
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विस्तार
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आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर मनाए जा रहे अमृत महोत्सव के तहत आज सारा राष्ट्र तिरंगामय है। आजादी के बाद भारत की आन, बान और शान के प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज के प्रति इतना जोशोखरोश पहली बार नजर आ रहा है। हालांकि इस अभियान में दिखावा भी काफी हो रहा है, लेकिन तिरंगे के प्रति यह उत्साह तब तक अर्थहीन है जब तक कि हम स्वाधीनता आन्दोलन के उस संघर्ष को याद नहीं करते जिसके फलस्वरूप हम आजादी का सुख भोग रहे हैं।

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हमारा यह जोशोखरोश भी तब तक बेमानी है जब तक कि हम अंग्रेजों की 'बांटो और राज करो' वाली नीति को ध्यान में नहीं रखते, क्योंकि इस राष्ट्र की एकता, अखण्डता और समृद्धि के लिए राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता है। भारत के 75 वें स्वतंत्रता दिवस पर, आइए एक नजर डालते हैं आजादी के संघर्ष के उस घटनाक्रम पर।

अंग्रेजों के खिलाफ 1857 में पहला विद्रोह 

विदित ही है कि अंग्रेजों ने बांटो और राज करो नीति के तहत  सन् 1757 में मीर जाफर की मदद से शिराजुद्दौला को हरा कर प्लासी का युद्ध जीता और उसके बाद 1764 में बक्सर का युद्ध जीतने के साथ ही ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1765 में बंगाल प्रेसिडेंसी की स्थापना कर भारत की सरजमीं कब्जानी शुरू की। सन् 1857 तक कंपनी की कलकत्ता, मद्रास और बम्बई, तीन प्रसिडेंसियों के साथ ही एक फ्रण्टियर प्रान्त भी था। कंपनी शासन की ज्याततियों के खिलाफ 1857 में सैन्य विद्रोह हुआ।

ईस्ट इंडिया कंपनी के सेवारत भारतीय सैनिकों द्वारा मेरठ में शुरू हुआ यह विद्रोह दिल्ली, आगरा, कानपुर और लखनऊ तक फैल गया। 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उदय

स्वाधीनता आन्दोलन को नतृत्व देने वाली कांग्रेस की स्थापना सन् 1885 में हुई जिसका श्रेय एलन ऑक्टेवियन ह्यूम को जाता है, अन्य संस्थापकों में दादाभाई नरोजी और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी आदि थे। एलेन ह्यूम 1857 की गदर के समय इटावा के कलक्टर थे, लेकिन उन्होंने ब्रिटिश सरकार की भारत नीति के खिलाफ 1882 में पद त्याग कर कांग्रेस यूनियन का गठन किया। उन्हीं की अगुआई में बॉम्बे में पार्टी की पहली बैठक हुई जिसमें व्योमेश चंद्र बनर्जी पहले अध्यक्ष बने। कांग्रेस के उदय के बाद भारत में मुस्लिम लीग के अलावा दूसरा राजनीतिक दल बन गया।

दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने के बाद 1915 में मोहनदास करमचन्द गांधी की भारत वापसी हुई। उन्होंने यहां के किसानों, श्रमिकों और नगरीय श्रमिकों को अत्यधिक भूमि कर और भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए एकजुट किया। 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बागडोर संभालने के साथ ही उन्होंने स्वाधीनता आन्दोलन की बागडोर भी संभाली ली।

दिसम्बर 1916 में लखनऊ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच एक समझौता हुआ जिसमें दोनों समुदायों द्वारा मिल कर सुशासन के लिए ब्रिटिश हुकूमत पर दबाव बनाने पर सहमति हुए लेकिन साथ ही मुस्लिम लीग की धार्मिक आधार पर प्रान्तीय असेंबलियों में प्रतिनिधित्व की बात मान ली गई, इसमें मोहम्मद अली जिन्ना की प्रमुख भूमिका थी। 

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1920 में, महात्मा गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली और असहयोग आंदोलन शुरू किया। - फोटो : facebook

नील किसानों का आन्दोलन बंगाल में 1859 से चल रहा था। बिहार के बेतिया और मोतिहारी में 1905-08 तक उग्र विद्रोह हुआ। 1917 में गांधीजी ने चंपारण के किसानों के विद्रोह का नेतृत्व किया।  किसानों कोें नील उगाने के लिए मजबूर किया जा रहा था और उन्हें इसके लिए पर्याप्त मुआवजा भी नहीं दिया जा रहा था। गांधीजी ने चंपारण के किसानों की दयनीय परिस्थितियों से शासन को अवगत कराकर किसानों का शोषण और उत्पीड़न रुकवाया।

जलियांवाला बाग नरसंहार

बैशाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश शासन की निषेधाज्ञा से अनजान हजारों भारतीय अमृतसर के जलियांवाला बाग में जश्न मनाने के लिए जमा हुए थे। ब्रिगेडियर-जनरल डायर ने सैनिकों को बुलाया और उन्हें सामूहिक सभा में 10 मिनट तक गोलियां चलाने का आदेश दिया। सैनिकों ने मुख्य द्वार को भी बंद कर दिया था ताकि कोई भाग न सके। कई लोग खुद को बचाने के लिए कुएं में कूद गए। अंग्रेजों के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, नरसंहार में 350 लोग मारे गए, लेकिन कांग्रेस का दावा था कि यह संख्या 1,000 लोगों के बराबर थी। यह वह घटना थी जिसने असहयोग आंदोलन को प्रेरित किया।

1920 में, महात्मा गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली और असहयोग आंदोलन शुरू किया। आंदोलन अहिंसक था और लोगों ने ब्रिटिश सामान नहीं खरीदा, स्थानीय कारीगरों और हस्तशिल्प का समर्थन किया और शराब की दुकानों पर धरना दिया। जगह-जगह अंग्रेजी कपड़ों की होली जलाई गई। सन् 1922 में चैरी-चैरा पुलिस स्टेशन में विरोध हिंसक होने पर गांधीजी ने आन्दोलन रोक दिया।

सुभाष चंद्र बोस की भारत वापसी

सन् 1921 में सुभाष चंद्र बोस ने इंग्लैंड में आइसीएस की प्रतीष्ठित नौकरी छोड़ दी और लंदन से वापसी के कुछ समय बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्हें 1925 में जेल भेज दिया गया और 1927 में रिहा किया गया। वह 1938 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने और 1939 में पुनः अध्यक्ष चुने गए। मगर आन्दोलन के तरीके को लेकर कांग्रेस नेतृत्व से मतभेद के कारण उन्होंने कांग्रेस छोड़ कर अलग राह अपना ली। वह 1941 में नाजी जर्मनी गए और 1943 में उन्होंने जपान के सहयोग से आजाद हिन्द फौज की स्थापना की। 18 अगस्त 1945 को एक कथित हवाई दुर्घटना में उनकी मृत्यु होने का दावा किया गया जिस पर आज तक भारतवारियों को विश्वास नहीं हुआ।

राष्ट्र ध्वज और 26 जनवरी को पूर्ण स्वराज

31 दिसम्बर 1929 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन तत्कालीन पंजाब प्रांत की राजधानी लाहौर में हुआ। इस ऐतिहासिक अधिवेशन में कांग्रेस के ‘पूर्ण स्वराज’ का घोषणा-पत्र तैयार किया तथा ’पूर्ण स्वराज’ को कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य घोषित किया गया। जवाहरलाल नेहरू, इस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गए। इसी दिन नेहरू ने आधिकारिक तिरंगा झंडा फहराया। उसी दिन देशभर में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और आम लोगों ने राष्ट्रध्वज फहराया। कांग्रेस ने भारत की जनता से छब्बीस जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने की अपील की। 

1930 का दांडी मार्च

दांडी यात्रा या नमक सत्याग्रह, महात्मा गांधी के नेतृत्व में औपनिवेशिक भारत में अहिंसक सविनय अवज्ञा आन्दोलन था। चैबीस दिवसीय मार्च 12 मार्च 1930 से 6 अप्रैल 1930 तक ब्रिटिश नमक एकाधिकार के खिलाफ कर प्रतिरोध और अहिंसक विरोध के प्रत्यक्ष कार्रवाई अभियान के रूप में साबरमती आश्रम से दांडी समुद्र तट तक चला।

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ब्रिटिश संसद द्वारा पारित भारत स्वतंत्रता अधिनियम 18 जुलाई 1947 को पारित किया गया। - फोटो : Social Media

भारत सरकार अधिनियम 1935

आन्दोलनों के जरिए भारतवासियों के मूड को भांप कर भारत शासन अधिनियम 1935 बना जोकि एक तरह से भारत के वर्तमान संविधान का प्रमुख स्रोत है। भारत में सर्वप्रथम संघीय शासन प्रणाली की नींव रखी गई। संघ की दो इकाइयाँ थीं - ब्रिटिश भारतीय प्रांत तथा देशी रियासतें। संघीय व्यवस्था कभी अस्तित्व में नहीं आई क्योंकि देसी रियासतों ने इसमें शामिल होने से मना कर दिया।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने ब्रिटिश शासन के खिला सशस्त्र संघर्ष चलाने के लिए 1943 में रंगून में आजाद हिंद फौज का गठन किया। इस फौज के पास करीब 45,000 सैनिक थे, जिनमें आधे से अधिक गढ़वाली और कुमाऊनी सैनिक थे। इस अभियान में उत्तराखण्ड के 85 सैनिक शहीद हुए थे। अक्टूबर 1943 में, बोस ने एक अस्थाई सरकार बनाई। 

1942 की अगस्त क्रांति

14 जुलाई 1942 को वर्धा में कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक के निर्णय के अनुसार 8 अगस्त को मुंबई  के गोवालिया टैंक मैदान में हुई कांग्रेस की कार्यसमिति की ऐतिहासिक बैठक में भारत छोड़ो का प्रस्ताव पारित कर दिया गया। ’भारत छोड़ों’ नारे ने सम्पूर्ण भारत में लोगों को उद्वेलित किया और वे अंग्रेजों के खिलाफ अंतिम लड़ाई में कूद पड़े। आंदोलन की तीव्रता को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने गांधी, नेहरू, पटेल और आजाद सहित सभी प्रमुख नेताओं को जेल में डाल दिया, लेकिन आन्दोलन और अधिक उग्र हो गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इसमें लगभग 940 से ज्यादा लोग मारे गए जबकि लगभग 60,229 गिरफ्तार किए गए। 

भारत स्वाधीनता अधिनियम 1947

हमारे स्वाधीनता सेनानियों के त्याग, बलिदान और समर्पण के फलस्वरूप अंग्रेज भारत छोड़ने को तो तैयार हो गए मगर जाते-जाते ‘‘बांटो और राज करो’’ की चाल एक बार फिर चल गए और धर्म के आधार पर भारत वर्ष 14 अगस्त 1947 को टूट गया। ब्रिटिश संसद द्वारा पारित भारत स्वतंत्रता अधिनियम 18 जुलाई 1947 को पारित किया गया जिसमें भारत और पाकिस्तान को सत्ता हस्तान्तरण के लिए 15 अगस्त 1947 का दिन नियत किया गया।

अधिनियम के अनुसार 14 और 15 अगस्त की मध्य रात्रि से पहले पाकिस्तान नाम के एक नए राष्ट्र का भी उदय हो गया। स्वतंत्रता के समय भारत में 565 छोटी और बड़ी रियासतें थीं। भारत के एकीकरण अभियान के तहत 15 अगस्त 1947 तक जम्मू कश्मीर, जूनागढ़ व हैदराबाद जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर सभी रियासतों ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे। गोवा पर पुर्तगालियों से 1962 में छुड़ाया गया।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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