6 जुलाई, 2002 को जब मैं कार्यालय से वापस घर आ कर रात लगभग 9 बजे थोड़ा विश्राम कर टीवी देख रहा था तभी अचानक “ब्रेकिंग न्यूज” आने लगी कि श्री धीरूभाई अम्बानी जी का देर शाम निधन हो गया। मेरा मन पुनः मेरे बचपन के दौर में मेरी माँ की उक्त बहुमूल्य शिक्षा पर चला गया जब उन्होंने कहा था कि “इस दुनिया में सब कुछ अस्थाई है, सिवाय तुम्हारे कर्मों के”।
अगले दिन उनका अंतिम दर्शन एवं अंतिम संस्कार का कार्यक्रम था। मैंने लोखंडवाला, अंधेरी से प्रातः ही उनके निवास कफ परेड पर जा कर उनके अंतिम दर्शन किए और वापस घर आ गया। टीवी पर उनकी अंतिम यात्रा का सजीव प्रसारण हो रहा था।
एक अजीब सा, लेकिन बड़ा सवाल
मैं लगातार इस प्रसारण को देख रहा था कि तभी मेरे अघोर मूर्ति आध्यात्मिक गुरु जी का प्रयागराज (तत्कालीन इलाहबाद) से फोन आया और वो मुझसे धीरूभाई अम्बानी के अंतिम संस्कार एवं श्मशान स्थल के दृश्य के बारे में पूछने लगे। उन्होंने कुछ ऐसी बातें भी पूछीं जो उस समय थोड़ा समझ कम आ रहीं थी, अटपटी सी लग रही थीं, लेकिन उनकी उन बातों का अंतर्मन में जब विश्लेषण एवं चिंतन-मनन करने लगा तो मुझे जीवन की बहुत बड़ी शिक्षा मिली। पर एक प्रश्न भी था-
मृत्यु तो सभी की होनी है, जो आया है उसे जाना भी होगा तो क्या धन न कमाया जाए? बड़ा उद्योगपति, व्यापारी, राजनीतिक व्यक्ति, प्रशासक, वैज्ञानिक, कलाकार, लेखक आदि न बना जाए? इस ओर कुछ भी प्रयास न किए जाएं?
तो उत्तर हमारे धर्म ग्रंथों में सपष्ट है कि शुभेक्षा, सद्भावना, सच्चरित्रता के साथ पुरुषार्थ अवश्य किया जाए एवं अर्थ भी अर्जित किया जाए परन्तु इस अर्थ के संग्रहण में “निर्लिप्तता” के भाव से। लेकिन क्या वर्तमान कलियुग में ऐसा करना संभव है? उत्तर है कि “निश्चित ही संभव है यदि आप अपने मन-मष्तिष्क एवं आत्मा में यह भाव बैठा लें कि यह सब कुछ अस्थाई है”।
लेकिन माया का स्वभाव ही ऐसा है कि वह आपको विचार के इस उच्चतम अघोर स्थिति तक पहुंचने ही नहीं देती और आपके आस-पास असत्य के धुएं की ऐसी परत का निर्माण कर देती है कि आपको भौतिक रूप में सर्वरूप से साधन सम्पन्न होते हुए भी इस निशुल्क अमूल्य आध्यात्मिक ज्ञान का आभास तक नहीं होता और इस प्रकार से नाना प्रकार के भ्रम जाल में मकड़ी की ही तरह उलझते चले जाते हैं।
साथ जाते हैं सिर्फ आपके कर्म
स्वर्गीय धीरूभाई अम्बानी एवं स्वर्गीय राकेश झुनझुनवाला अपने जीवन में अकूत धन अर्जित करने के बाद सब कुछ यहीं छोड़ कर अनंत की यात्रा पर निकल गए। उनके साथ केवल इस अकूत धन को अर्जित करने के लिए किए प्रयास हेतप कर्म ही उनके साथ गए हैं, जो अगले जन्म में उनका प्रारब्ध बनेंगे।
ऐसा नहीं है कि यह सब इन बड़े लोगों के साथ ही होगा, हम सब भी उसी कतार में हैं, हमारे साथ भी केवल हमारे कर्म ही साथ जाएंगे और एक तिनका भी नहीं, इसलिए पुरुषार्थ करते हुए, धन अर्जित करते हुए निर्लिप्त रहें। पवित्रता, सच्चरित्रता एवं सुसाधन से धनार्जन तो करें परन्तु इससे भी अधिक जीवन भर सत्कर्मों के अक्षय धन का अर्जन एवं संग्रहण करें।
यह सत्य है कि इस विश्व में आप दूसरों से बहुत कुछ सीख सकते हैं, यह भी सत्य है कि किसी-किसी की मृत्यु भी हमें बहुत कुछ सोचने पर विवश कर जाती है, अनेकों अच्छी शिक्षाओं का पाठ पढ़ाती है पर क्या हम सच में इस पाठ को पढ़ने के लिए मन से तैयार हैं? शायद नहीं।
इस जीवन का अंतिम यात्रा स्थल श्मशान है, इसे सर्वदा अपने ध्यान में रखना चाहिए फिर पुरुषार्थ करें, विश्व-विख्यात व्यक्तित्व भी बनें एवं सच्चे अर्थों में धर्म,अर्थ, काम एवं मोक्ष की प्राप्ति करें।
मेरे बाबा गुरु परम पूज्य अघोरेश्वर अवधूत श्री भगवान राम जी का एक वचनामृत है-
श्मशान से पवित्र मंदिर कोई नहीं है, जहां आकर इंसान महामाया की माया से दूर हो जाता है। यहीं पर आकर इंसान पवित्र, अपवित्रता से दूर हो जाता है, सांसारिक नियम, वस्तुएं, सब बेकार लगने लगतीं हैं क्योंकि श्मशान इंसान को सत्य दिखता है। जीवन अल्प है, अमूल्य है इसलिए आत्म बुद्धि के साथ जीवन जिएं। मृत्यु ही इस वसुधरा का एक मात्र निर्विवादित सत्य है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।