कोरोना महामारी के संकट ने पूरे विश्व को कई तरह की चुनौतियों से भर दिया है। ये चुनौतियां ऐसी रही हैं, जिसके चलते हर वर्ग-विशेष पर एक अलग तरह का संकट सामने आया है। सबसे बड़ा संकट जान बचाने का है। कोरोना ने न केवल मनुष्य के प्राणों को संकट में डाला है, अपितु उसके जनजीवन को भी अस्त-व्यस्त किया है। कोरोना से पहले पूरे विश्व समुदाय का जीवन सरल-सहज और उतना ही सामाजिक था, जितना कि इस समय एकाकी हो गया है।
कोरोना महामारी के इस डेढ़ साल में विश्व समुदाय ने लॉकडाउन के जैसी स्थितियां झेलीं और इसने उसे दिखाया कि मानवीय रिश्तों की तुलना न धन-संपदा, वैभव से की जा सकती है और न अकूत संसाधनों से। संसाधन होने के बाद भी मनुष्य प्राण बचाने के संकट के सामने असहाय है। प्राणों से बड़ी चीज इस संसार में शायद ही कोई हो। चाहे कोई सेठ हो या गरीब से गरीब मनुष्य, प्राणों को लेकर सब एक बराबर ही रहे।
कोरोना संकट में कई ऐसी कहानियां सामने आईं, जिसमें मनुष्य अपने जीवनभर की कमाई को सामने रख कर भी अपने प्राणों को बचा नहीं पाया। गांव-देहातों और दूसरे कस्बों से कई समाचार ऐसे भी सामने आए कि कई लोग झोले में पैसा लेकर निकले और अस्पतालों में डॉक्टर के सामने रख दिए। लेकिन न तो पैसा काम आया और न ही रसूख।
कोरोना की दूसरी लहर में तो त्रासदियां भयावह थीं। मनुष्य सबसे ज्यादा लाचार दिखा, उसके सारे संसाधन, उसके सारे पैसे, उसके सारे संपर्क, सारी पॉवर, बेकार साबित हुईं। देश की राजधानी दिल्ली में भी पैसा, पॉवर और सत्ता के इर्द-गिर्द रहने वाले लोग प्राणवायु सिलेंडर की आस में भटकते हुए दिखाई दिए।
कोरोना संकट ने हमें यह तो बता दिया कि पैसा ही सबकुछ नहीं है। पैसा तभी काम आ सकता है, जब मनुष्य अपने प्राणों को बचा सके। बिना प्राण के न पैसा किसी काम का है, न संसाधन किसी काम के हैं।
कोरोना ने मनुष्य सभ्यता को जो दिया
जो दुनिया में पैसे को ही सब कुछ बस मान ही चुके थे, उनको कोरोना ने याद दिला दिया कि ऐसा नहीं है। सवाल यह नहीं है कि हर व्यक्ति जो मर गया उसके पास पैसा नहीं था, वो तो हो सकता है किसी और कमी से मरा या अब उसका समय हो चला हो या ये भी हो सकता है कि उसका मनोबल कमजोर पड़ गया हो और वो कोरोना से लड़ाई हार गया? बल्कि सवाल तो ये है कि जो अमीर था क्या वो नहीं मरा या जो गरीब था, क्या वो जिंदा नहीं बचा? वास्तव में इस बीमारी ने हमें बहुत कुछ महत्वपूर्ण सिखा दिया है जिन सीखों के बदले में किसी के अपने तो किसी के सपने दांव पर लगे हैं।
इस पूरी महामारी में एक अति महत्वपूर्ण सीख है जो उभर कर सामने आई है कि पैसा बहुत कुछ हो सकता है किन्तु सब कुछ नहीं। क्योंकि जरा सोचिए क्या पैसा इच्छा शक्ति या निडरता दे सकता है? क्या पैसा रिश्ते निभवा सकता है? क्या पैसा मानवता खरीद सकता है? क्या पैसा कोरोना काल में आपको निश्चिंत होकर लोगों के बीच बेफिक्र घूमने के लिए काम आ सकता है?